आस्था की प्रकृति-3


1-कर्म जीवन का अंग है-

क-                        इस जगत में कोई भी जीव हो, चाहे उनमें वह  सन्यासी  हो
यागृहस्थी सबको अपने-अपने क्षेत्र में परिश्रम करना होता है ।कर्म को हमें जीवन
की साधना के रूप में स्वीकार कर लेना होता है ।धोखा या चालवाजी  से कोई  चीज
प्राप्त नहीं हो सकती है,इससे तो आदमी स्वयं को गढ्ढे में गिराने के  समान है।   वैसे
कहा जाता है कि भगवान की कृपा सन्यासियों की अपेक्षा गृहस्थियों पर अधिक रहती है।
क्योंकि सन्यासी लोग तो भगवान का नाम लेने के लिए ही घर  छोडकर आये हैं , यदि  वे
भगवान को न पुकारें तो उनके लिए वह महॉ पाप माना जाता है ।लेकिन निष्ठावान गृहस्थी
भक्त सिर पर भारी बोझ लादे हुये भी भगवान की कृपा याचना करके उसके दर्शन कर सकते
हैं ।

ख-                हमारे धार्मिक ग्रन्थों की अवधारणॉ को हमें नहीं भूलना होगा कि
जीवन में कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता है,और न नष्ट होता है । उसका प्रतिफल या
कुफल अवश्य मिलता है । इसीलिए जो भी सत्कर्म हो, जिस अवस्था में हो करना चाहिए।
और यदि पूर्व में कोई कुकर्म किया हो तो इस पाप राशि से मुक्ति का उपाय भी यही मूल धर्म
के कार्य है ।

ग-                         कर्मयोग के द्वारा चित्त शुद्धि होती है,आत्म ज्ञान होता है । कर्म
तो सभी करते हैं मगर कर्मयोग की साधना सभी नहीं करपाते हैं,क्योंकि कर्मों के बन्धन
में उन्हैं दुख का भोग करना होता हैं ।  भगवान  श्री  कृष्ण  गीता में कहते हैं कि कर्म करना
तुम्हारा अधिकार है,कर्मफल नहीं । कर्मफल की आशा से कर्म करने वाले तो दीन,दुर्वल और
निम्न श्रेणी के लोग होते हैं । कर्म करो,किन्तु निस्वार्थ भाव से करो,यही परमानन्द को प्राप्ति
का मार्ग है ।

घ-                   अधिकॉश लोगों की धारणॉ है कि यदि निष्काम होकर कर्म किया
जाय तो फिर कर्म के प्रति आकर्षण और प्रेरणॉ कैसे उत्पन्न होगी,किसी भी काम को
मन लगाकर कैसे किया जाय,यदि खुद को फायदा न हो  तो  मैं  कर्म  करने क्यों जाऊं ?
यह भावना सही नहीं है । अगर सुख के लिए ही लोग कर्म करते हैं,तो सुख मिलता कितना
है ? पहली बात तो यही है कि अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को सुखों से वंचित और उन्हैं दुखी
करना होता है । और इससे जो भी सुख मिलता है वह अस्थाई होता है । स्थाई सुख के लिए तो
निस्वार्थ कर्म आवश्यक है । हमारे महॉन पुरुषों की यही अवधारणॉ है ।

ड.-                          ईश्वर के दर्शन सबके भाग्य में इसी जन्म में नहीं होता है
 बल्कि कुछ लोग जन्म जन्मॉतर से उन्हैं पाने के लिए कठोर तपस्या,साधन भजन
करते चले आरहे हैं,और पूर्व जन्म के कर्म के अनुसार,और साधना के प्रभाव से इस जन्म
की अनुकूल साधना से बचे हुये कार्य को सहज ही पूरा कर देते हैं। और जन्म-मरण के बन्धन
से मुक्त हो जाते हैं ।

च-                     सत्कर्मों का फल अक्षय माना जाता है,जितना संचय उसका
किया जाय,भविष्य में,इस जन्म में,या अगले जन्म में अवश्य मिलता है।   विपत्ति,
घात-प्रतिघात,भयप्रलोभन,या अन्धकार या निराशा के समय समय यह फल काम आता है।
सत्कर्मों की संचित सम्पति स्थाई मानी जाती है । यह देखा गया है कि सत्कर्मों को पैदा करने
में दुख,रक्षा करने में दुख,नष्ट होने में दुख व कष्ट होता है । इसलिए सत्कर्मों के संचय का प्रतिफल
हमें सुख के रूप में प्राप्त होता है ।

2- कच्चे मन का स्वभाव

क-                    कच्चा मन एक महॉमायावी के समान होता है।
यह हमें कब,किस तरह से कुमार्ग में ले जाकर मायावी जाल में   फंसा
देगा,यह समझ पाना कठिन है । कच्चे मन की पहचान है- देह और इन्द्रियों
के सुखों को ढूडते रहना,स्त्री,पुत्र,परिवार को अपना समझकर उसकी माया    में
मोहग्रस्त होना, धन-जन,यश-प्रतिष्ठा और प्रभुत्व को जीवन की एकमात्र कामयाब
वस्तु को समझना । इस स्थिति में वह सुख चाहने की लालसा में उसे पग-पग धक्का
खाकर और दुख पाकर भी चैतन्य का लाभ नहीं होता है । चारों ओर लोग मरते हैं लेकिन
कच्चे मन वाला मनुष्य यह कभी नहीं सोचता कि मुझे भी कब किस क्षण सबकुछ छोडकर
चले जाना पडेगा । बस वह यही सोचता है कि कैसे धोखा देकर,चालाकी से,या किसी भी उपाय
से अपना काम बन जाय,चाहे उससे दूसरे को नुकसान पहुंचे या दुख मिले इसकी उसे कोई परवाह
नहीं होती है । अपना सुख ही उसका सर्वस्व संसार होता है ।

ख-                      अगर मन को हम एक फल के रूप में देखें तो उपयुक्त
होगा ,कि जब वह कच्चा होता है तो उसमें खट्टापन,कसैला और बेस्वाद  होता
है और जिसे खाने पर रोग उत्पन्न करता है,लेकिन पक जाने पर अच्छा स्वाद और
उपकारी होता है, मन की दशा भी इसी प्रकार की मानी जाती है।

ग-                        कच्चे मन से किया गया कार्य चाहे वह देश या जगत के
कल्याण के लिए किया जाता हो उनका उद्देश्य महान होते हुये भी उनके द्वारा
संसार का हित के बजाय अहित ही देखा गया है । अपने आदर्शों में वे अधिक समय
तक अटूट रूप से नहीं टिक पाते हैं । नाम यश प्रतिष्ठा और दूसरों पर प्रभुत्व करने की
लालसा उनकी बलवती हो जाती है । शीघ्र उनपर हिंसा,द्वेष,संकीर्णता और स्वार्थपरता का
भूत सवार हो जाता है,जिससे उनके सारे कार्य विफल हो जाते हैं । वे अपने भीतर के विष को
समाज में फैलाकर जन मानस को कलुषित कर देते हैं । यहॉ तक कि वे धर्म के प्रति अविश्वास
और अश्रद्धा के भाव भी पैदा करते हैं ।

घ-                  अगर देखें तो सभी कुछ मन का खेल है,मन के ऊपर
ही सब नर्भर है । मन में बन्धन है,मन ही मुक्ति है । कहते हैं जैसी मति
वैसी गति । यदि कठोर तपस्या करके भी कोई अपने अन्तःनिहित वासना के
वशीभूत होकर विषयसुख और नाम यज्ञ के प्रति आकृष्ट हो तो उसका सारी तपस्या
भस्म हो जाती है ,लेकिन जो लोग ईश्वर के शरणॉगत हो जाते हैं तो वे इस दुख से बच
जाते हैं ।

3-ईश्वर में आस्था का स्वभाव

क-                        यह देखा जाता है कि हम बात-बात में भगवान की
मर्जी कहकर ईश्वर की दुहाई देते रहते हैं,यह तो सार शून्य है,सिर्फ    आवाज
मात्र है,जैसे कि छोटे-छोटे बालक बालिका कहते रहते हैं,भगवान कसम,राम दुहाई
आदि,जैसे अंग्रेजी में कहते हैं Thank God या My God लेकिन इन शब्दों का प्रयोग
वहीं कर सकता है जिसे ईश्वर का पूरा ज्ञान हो,जिसने ईश्वर को आत्मसमर्पण कर दिया
हो,जिसे पक्का ज्ञान है । ये शब्द आत्मा की आवाज है जो उसकी आत्मा से निकलकर सत्य
की परख के लिए प्रयुक्त होते हैं । लेकिन आज एक परम्परा बन गई है कि ईश्वर के सम्बन्ध
में कोई ज्ञान नहीं है,और आत्म समर्पण भी नहीं है लेकिन इन शब्दों का प्रयोग करते हैं, ताकि
शीघ्र विश्वास दिलाया जा सकें ।

ख-                     हमारे वेद कहते हैं कि जो पूर्ण है वह चिरकाल में भी
सदा पूर्ण ही रहता है,इसमें क्षय नहीं होता । पूर्ण से पूर्ण का विनिमय करने
पर ही हम पूर्णता के प्राप्त कर सकते हैं ।  वह परमात्मा स्वयं में पूर्ण है,     इसे
प्राप्त करने के लिए इस शरीर का सम्पूर्ण सामर्थ्य और मन ,प्राण,अन्तःकरण को
समर्पित करना होता है तभी हमें पूर्णता की प्राप्ति हो सकती है ।

ग-                   एस दुनियॉ में उस परमात्मा को प्राप्त करने की सामर्थ्य
हर एक में अलग-अलग होती है, उनमें कुछ लोग शरीर से बहुत दुर्वल  होते  हैं
या जिन्दगी भर रोगग्रस्त होते हैं,जोकि उस साधना को सम्पन्न करने में असमर्थ
होते हैं । इसका मतलव वे लोग तूफान के समय समुद्र में पडी  छोटी  नाव के  समान
पछाड खाते हुये पडे रहेंगे ?क्या वे कीडे मकोडों की तरह पिसते रहेंगे ?  नहीं ईश्वर  के
राजस्व में यह कभी नहीं हो सकता ।,यदि उनके मन मेंअटूट श्रद्धा भक्ति और प्रेम है तो
उन लोगों की ह्दय विदारक आवाज उस प्रभू कानों में अवश्य पहुंचती है । चाहे उनके  आस
पास की परिस्थितियॉ कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हो। इस लिए इस जीवन में सिर्फ उस परमात्मा
से प्रेम करें,उसकी अपार कृपा तभी प्राप्त हो सकती है ।वे लोग इसी जीवन में शॉति के अधिकारी होते
हैं,और अन्त में परम पद का लाभ प्राप्त कर सकते हैं ।

सत्य में विश्वास करने का साहस करो-7


1-आत्मा में विकास की प्रक्रिया नहीं है-

                        आत्मा में जो कुछ भी है वह पहले जैसे है,
इसमें क्रमिक विकास की प्रक्रियायें नहीं हैं,आत्मा हमेशा अपने
मूल स्वरूप में रहता है। विकास की प्रक्रिया तो प्रकृति में है।  जैसे-
जैसे प्रकृति का विकास उच्चत्तर से उच्चत्तर की ओर अग्रसर होता है,
वैसे ही आत्मा की गरिमा अपने आपको अधिकाधिक व्यक्त करती है। जैसे
कल्पना कर सकते हैं कि एक पर्दा है ,इस पर्दे के पीछे आश्चर्यजनक  दृश्य है।
पर्दे में एक छोटा सा छेद है,जिसके द्वारा हम पीछे के दृश्य का एक छोटा सा अंश
मात्र देख सकते हैं। अब कल्पना कीजिए कि उस छेद का आकार बढता जाता है,छेद
बढने से पीछे के दृश्य का अधिक क्षेत्र बढता जाता है। और जब पूरा पर्दा विलुप्त हो
जाता है तो हम उस सम्पूर्ण दृश्य को देख सकते हैं।  तो यह    पर्दा मनुष्य का  मन  है,
और उसके पीछे आत्मा की गरिमा ,पूर्णतः और अनन्त शक्ति है।   और जैसे- जैसे यह
मन निर्मल होता जाता है,उस आत्मा की गरिमा भी स्वयं को अधिकाधिक व्यक्त करती
है। आत्मा परिवर्तित नहीं होती  है,  बल्कि  परिवर्तन  तो  पर्दे  में  होता  है ।  आत्मा  तो
अपरिवर्तनशील है ।

2-बीती बात भुला देना श्रेयष्कर है—

यदि में यह उपदेश दूं कि तुमने कुछ भूलें की हैं,
इसलिए अब तुम अपना जीवन केवल पाश्चाताप करने तथा रोने-
धोने में ही विताओ! तो इससे तुम्हारा कोई भी उपकार नहीं  होगा ।
बल्कि तुम और भी दुर्वल हो जाओगे। यह तो असत्पथ है। यदि हजारों
साल कमरे में अंधेरा रहे, और तुम कमरे में आकर हाय  बडा अंधेरा है!
बडा अंधेरा है! कहकर रोते रहो, तो क्या अंधेरा चला जायेगा? कभी नहीं।
और एक दियासलाई जलाते ही कमरा प्रकाशित हो उठता है। यदि यह कहते
रहें कि जीवनभर मैने बहुत दोष किये,मैंने अन्याय किया है,यह सोचने से क्या
तुम्हारा कुछ उपकार हो सकेगा? यह तो किसी से बतलाना नहीं पडता। ज्ञानाग्नि
प्रज्वलित करो,फिर देखोगे कि क्षणभर में सब अशुभ चला जायेगा। हमें अपने प्रकृत्त
रूप को पहचानना है, मैं को प्रकाशित करो!-और जिस व्यक्ति से मिलो उसकी आत्मा
को भी जगाओ।

3-जीवित ईश्वर हमारे भीतर रहते हैं—

                        यह एक सत्य है कि जीवित ईश्वर हमारे-तुम्हारे भीतर
रहते हैं,फिर हम मन्दिर,मस्जिद,गिराजाघर बनाकर उनमें ईश्वर की तलाश
करते हैं। और सब प्रकार की झूठी काल्पनिक चीजों में विश्वास करते हैं। मनुश्य
के शरीर में स्थित मानव आत्मा ही एक मात्र ईश्वर है। पशु भी भगवान के मंदिर हैं,
लेकिन मनुष्य सर्व श्रेष्ठ मंदिर है-बस ताजमहल जैसा मंदिर। अगर मैं उस मंदिर की
उपालसना न कर सका तो,अन्य किसी भी मंदिर से कुछ भी उपकार नहीं हो सकेगा। और
यह भी सत्य है कि जिस क्षण मुझे प्रत्येक मनुष्य देह मंदिर में दिखेगा और उसमें ईश्वर देख
सकूंगा,जिस क्षण मेरे अन्दर यह भाव आयेगा,उसी क्षण में समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाऊंगा।
मुझे बॉधने वाले सारे पदार्थ हट जायेंगे।

4-भावना करो ईश्वर तुम्हारा है-

                   क्या तुमने कभी दूसरे के लिए अपने ह्दय से   अनुभव
किया? अगर किया है तो एकत्व के भाव से, और  यदि  नहीं  किया है तो
तुम कुछ नहीं कर सकोगे, केवल शुष्क बुद्धि है और बनी रहेगी। यदि तुम ह्दय
से अनुभव करते हो तो,एक भी पुस्तक न पढने पर,और कोई भाषा न जानने पर भी
तुम ठीक रास्ते पर चल सकते हो,ईश्वर तो तुम्हारा है। अगर विश्व के इतिहास को देखते
हैं, तो क्या तुम यह नहीं जानते कि पैगम्बरों की शक्ति कहॉ निहित थी?   बुद्धि में? क्या वे
दर्शन सम्बन्धी सुन्दर पुस्तक छोड के गये? किसी ने ऐसा नहीं किया ।वे तो केवल कुछ थोडी
वातें कह गये थे। बस ईसा की तरह भावना करो,बुद्ध की तरह भावना करो तो बुद्ध बन जाओगे।
भावना ही तो जीवन है,भावना ही बल है,तेज है। ध्यान रखें भावना के विना कितनी ही बुद्धि क्यों
न लगाओ ईश्वर प्राप्त नहीं हो सकेगा ।ह्दय के द्वारा ही ईश्वर से साक्षात्कार होता है,बुद्धि के द्वारा
नहीं ।

5-संसार अच्छा या बुरा नहीं है—

                    अगर इस संसार में सभी नर-नारियों को एक शुभ सूचना
सुनाई जाय कि,तुम सभी एक जीवंत ईश्वर हो,तो आधे घण्टे के अन्दर ही
सारे जगत का परिवर्तन हो जायेगा। चारों ओर के लोग  यह अनुभव करेंगे कि,
सभी वही हैं,तो फिर सबके भीतर अशुभ न रहकर शुभ ही शुभ महशूस होगा। अगर
आपके भीतर चोर न हो तो तुम किस प्रकार चोर देखोगे?  यदि  तुम  खूनी नहीं हो तो
किस प्रकार खूनी देखोगे? यदि साधु हो जाओ तो असाधुभाव  तुम्हारे  अन्दर  से एकदम
चला जायेगा। सारा जगत ही परिवर्तित हो जायेगा। लेकिन देखनी वाली बात यह है कि-हम
समस्त वाह्य परिवेश पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते। छोटी मछली जल में रहने वाली बडी
मछलियों से अपनी क्षा करना चाहती हैं। अगर देखें तो वह किस  प्रकार  कार्य  करती  है? अपने
पंख विसकित करके पक्षी की तरह भागती है। इस  मछली  ने  जल या वायु में कोई परिवर्तन नहीं
किया-जो कुछ भी परिवर्तन हुआ वह अपने ही अन्दर हुआ।परिवर्तन तो हमेशा अपने ही अन्दर होता
है। समस्त क्रमिक विकास में यही देखा जा सकता है कि कि प्राणीं में परिवर्तन  होने  से  ही  प्रकृति पर
विजय पाय़ी जा सकती है।अशुभ पर जय अपने भीतर परिवर्तन के द्वारा ही सम्भव है। इसलिए मनुष्य
के आत्मपरक पक्ष से ही वह सम्पूर्ण शक्ति प्राप्त करता है।  अशुभ  या  दुख की बात कहना एक भूल है
क्योंकिइनका बहिर्जगत में कोई स्तित्व नहीं है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य  भी  है,  कि  यह  भौतिक और
आध्यात्मिक दोनों दिशाओं में मेल ही नहीं खाता,बल्कि उनसे भी आगे जाता है,इसीलिय़े यहआधुनिक
वैज्ञानिको को अधिक भाता है।

6-आत्मा की उपमॉ-

               आत्मा के सम्बन्ध में एक अच्छी उपमा दी गई है,कि आत्मा
एक रथी है और शरीर रथ,बुद्धि को सारथी कहा गया है   तथा मन लगाम है।
हमारी इन इन्द्रियों को अश्वों की उपमा दी गई है। जिस रथ के  घोडे  अच्छी  तरह
प्रशिक्षित होंगे,और लगाम मजबूत होगी और उसे सारथी द्वारा मजबूती से पकडी गई
होगी वह रथी तो विष्णु के उस परम पद पर पहुंच सकता है। लेकिन जिस रथ के इन्द्रिय
रूपी घोडे डृढ भाव में संयत नहीं होंगे,और मन रूपी लगाम मजबूती से नहीं पकडी हुई होगी,
वह रथी तो विनाश को ही प्राप्त होता है।

7-सत्य में विश्वास करने का साहस करो-

                         आज पूरे विश्व में एक समस्या बनती जा रही है,
एक दूसरे के प्रति विश्वास घटता जा रहा है। देश में स्वाधीनता संग्राम
चल रहा था,एक मुसलमान    सिपाही  ने एक महात्मा को बुरी तरह घायल
कर दिया था। हिन्दू क्रॉतिकारियों ने यह देखा और उसे पकडकर उस सन्यासी
के पास लेजाकर कहा महात्मा जी,अगर आप कहें तो इसका वध कर दें! सन्यासी
ने देखा और कहा, भाई तुम्हीं वह हो और   तुम्हीं  वह हो-  तत्वमसि। यह कहते हुये
सन्यासी ने अपना शरीर छोड दिया। सभी विश्व के लोगो  सत्य  में  विश्वास  करने  का
साहस करो,सत्य के अभ्यास का साहस करो,इस संसार साहसी नर-नारियों की आवश्यकता
है। अपने में वह साहस लाओ जो सत्य को जान सके,जो जीवन में निहित सत्य को दिखा सके,
और मृत्यु से डरे नहीं। जो मनुष्य यह ज्ञान कर दे कि वह आत्मा है,और  इस  संसार में कोई भी
ऐसी वस्तु नहीं है,जो उसका विनाश कर सके। तो फिर तुम अपनी वास्तविक आत्मा को न लोगे।
तब तुम मुक्त हो जाओगे ।।

चोप्ता और तुंगनाथ की यात्रा-2


1-चोप्ता की यात्रा-

               अगर आप चोप्ता पहुंचते हैं तो थोडा रुकें
चाय पीते हैं तो पिएं, फिर अपनी योजना बनाएं  क्योंकि
वहॉ पर पर्यटक और धार्मिक दोनों स्थान हैं ।  अच्छा  होता
आप उस दिन वहीं ठहरें शाम के समय घूमने निकलें खुला क्षेत्र
है, जगह-जगह टूरिस्ट मिलेंगे हो सकता है विदेशी अधिक मिलेंगे,
पर्यटक निगम,जडीबूटी संस्थान,पन्तनगर शोधसंस्थान के केन्द् होंगे,
साथ ही प्राकृतिक सौन्दर्य जो विखरा मिलेगा, जिसमें ऊंचे देवदार,सुराही
के वृक्ष और उनके बीच खुला बुग्याल,सामने मनमोहक बर्फीली पहाडियॉ ।
शाम को वहीं हाल्ट करें, ठहरने के लिए होटल हैं,छोटे बडे ।

2-तुंगनाथ की यात्रा-

                 सुबह उठकर चलें तुंगनाथ की  ओर  जी  हॉ
चढाई है जंगल से होकर चलना है,  घबडायें नहीं  कठिनाई
तो होगी ही मनर आप स्वर्ग की और बढ रहे हैं रहे हैं, निश्चित
तौर पर स्वर्ग है । एशिया में  सबसे ऊंचे  स्थान पर स्थित  मन्दिर,
काफी भीड होगी चलते समय,रास्ते से ही आपको बुग्याल मिल जायेगा
अर्थात अधिक ऊंचाई पर मिलने वाली महीन घास ।रास्ते में अमूल्य जडी
बूटी मिलेगी कडो,अतीस आदि फिर दिखाई देगा तुंगनाथ वहॉ भी होटल हैं,
खाने पीने की पूरी व्यवस्था है, शुद्ध  दूध  मिलेगा ,होटल  छोटे  पुराने मकान,
देखकर अपने पुराने समय के घर की याद आ सकता है आपको के। बातकरके
एक कमरे में अपना सामान रख दें  और  ताला  लगा  दें  अब  मन्दिर  में  जॉय
आगर सावन- भादो के  महीने  की  बात  है  तो मन्दिर में जाने से पहले सामने
झरने होंगे स्नान कर लें, ध्यान  रखें  यहॉ  जून  के  महीने  में  भी  ठंड  रहती है ।
मन्दिर में जाकर पूजा कर लें बाहर कई मन्दिर हैं छोचे-छोटे देखें  । वापस  कमरे
में आकर भोजन करें । फिर आप पनी योजना बना सकते हैं ।यदि आप थके नहीं
हैं,क्योंकि आपको शाम का ठहराव चोप्ता में करना है,वापस भी जाना है, समय को
देख लें ।अगर 1 भी बज रहा हो तो काफी समय है ।आप चन्द्रशिला जाने की योजना
बना सकते हैं,वहॉ से 3 की.मी. दूर  ऊंचाई  पर  वहॉ कोई  मन्दि र नहीं  है, बस  सिर्फ
दुनियॉ दिखती है प्रकृति का अजूबा आनन्द मिलता है मानो आप एव्रेस्ट पर पहुंच गये
हों,सचमुच स्वर्ग का आनन्द मिलता  है, बहुत  ऊंचाई  पर  है,  वहॉ  फौज की टुकडी भी
रहती है,आप जाते हैं तो वे स्वागत करेंगे आपका ।चन्दर्रशिला गगन चुम्बी चोटी चारों
ओर मानो सारी दुनियॉ दिख रही हो।अपने यादगार में लोग पत्थरों पर कुछ लिख देते हैं,
मैं हर एक दो साल में यहॉ जाना नहीं  भूलता । कुछ  देर  देखें,   परखें,  टहलॆं,  आराम करें
और फिर वापस लौटें । तुंगनाथ में चाय पियें फिर अपना सामान है तो लेकर  चलें  चोप्ता,
शाम को अच्छी नींद आयेगी। क्रमशः आगे बताया जायेगा।चोप्ता से सुबह चलें, यदि अपना
वाहन है तो ठीक है वरना लोकल वाहन मिलेंगे अथवा गुप्तकाशी या गौरीकुण्ड से आने वाले
वाहन में बैठें ,घने जंगल से मार्ग, आगे बढने  पर  खुले  तप्पडों  में  बाहरी  लोगों के टेण्ट लगे
दिखेंगे खाना बना रहे होंगे,उनके बच्चे खेल रहे होंगे कोई टहल रहे होंगे  जोर- जोर  से  हंस रहे
होंगे या कुछ बोल रहे होंगे 5 कि.मी की दूरी पर मिलेगा धोती धार वहॉ  पर  एक  होटल  मिलेगा
आगे फिर आरक्षित बहुत घना जंगल जिसमें बहुत ऊंचे पेड दिखाई देंगे सुनसान,जंगल में जंगली
जानवर भी दिखाई देगा ।इसी जंगल में मिलेगा राष्टीय स्तूरा  मृग  विहार  पार्क  वहॉ पर रुकें और
पार्क में इन मृगों को देखें,निहारें ,यही पर एक मचान बना है जिसमें जाकर यह  नजारा  देखा   जा
सकता है ।20 कि.मी की दूरी पर मिलेगा आपको उत्तराखण्ड जडी-बूटी  निदेशालय  चाहें  तो आप
रुकें देखें ।यहॉ पर जडी- बूटियों से दवाई बनाने के लिए मशीनें लगी  हैं  तथा  शोध  कार्य  और जडी-
बूटियों का उत्पादन होता है ।यहॉ पर उत्तराखण्ड जडू-बूटी निदेशक का कार्यालय है । फिर आगे बढे
अब आपको खुली चौरस घाटी दिखेगी,मण्डल घाटी ।

स्वयं को पहचानिए-12


1-                     आपका जीवन तो प्रकृति की अनुपम  भेंट  है।
यह सृष्टि की एक ऐसी कृति है,जो दुर्लभ है।प्रत्येक  मानव को यह
जीवन गुजारना ही पडता है,अब चाहे वह इसे रोकर गुजारें या हंसकर।
रहना तो यहीं पडता है।और जब रहना इसी संसार में है और वह भी गिने-
चुने दिनों तक,तो फिर इन थोडे से दिनों को रो-रोकर ही क्यों  गुजारा  जाय।
हंसकर क्यों नहीं।जीवन के उतार-चढावों में प्रशन्नता का अपना एक अलग ही
विशिष्ट महत्वहै।संसार में शायद ही कोई ऐसा मनुष्य  होगा, जिसके जीवन में
विभिन्न कठिनाइयॉ, समस्यायें,पीडाएं अथवा तरह- तरह  के  मोड  न  आए  हों ।
इन सबका सामना करने,स्वयं को प्रशन्नचित्त बनाये रखने और मानसिक द्वंद्व
से बचने का यह हंसना-मुस्कराना ही एक मात्र  उपाय  है।  हंसने  के  कारण  मनुष्य
कठिन से कठिन समस्याओं का हल सुगमता से निकाल लेता है।यदि आप जीवन के
इन क्षणों को उलझनों में उलझाये रखेंगे तो निसंदेह विक्षिप्त हो सकते हैं। हंसने वाला
मनुष्य तो जीवन की बडी-बडी कठिनाइयों और समस्याओं का सामना भली प्रकार कर
सकता है और जीवन संघर्ष में, हंसी के साथ विजय प्राप्त कर सकता है ।

                   महॉपुरुषों के निरंतर कार्य करने,संघर्षपूर्ण जीवन
जीने और सफलता पाते रहने का रहस्य  तो  उनके मुस्कराहट भरे
जीवन दर्शन में छिपा है।जिन लोगों ने महॉपुरुषों के सानिध्य का लाभ
प्राप्त किया है वे जानते हैं कि महॉपुरुष कितने विनोदी और प्रिय स्वभाव
के होते हैं।इसी में इनके संघर्षमय,कर्तव्य प्रधानता  तथा  कठोर जीवन की
सफलता का रहस्य छिपा रहता है। हंसने से तो मन की गॉठें सरलता से खुल
जाती हैं।रवीन्द्रनाथ टैगौर ने कहा है कि जब में अपने आप में हंसता हूं तो मेरा
बोझ हल्का हो जाता है।हंसना मानव जीवन का एक उज्वल पक्ष है ,हंसी यौवन
का आनंद है।हंसी यौवन का सौदर्य और  श्रृंगार  है, जो  व्यक्ति  इस  सौदर्य और
श्रृंगार को धारण नहीं कर सकता,उसका यौवन भी नहीं ठहरता ।इसमें कोई संदेह
नहीं कि मुस्कराहट के संपर्क से कठिनाइयॉ, परेशानियॉ  तो  हल  होती  हैं  साथ ही
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका प्रभाव पडता है ।कोशिश करें आपको
कब और कहॉ किन लोगों के साथ और कैसे कार्यों से सच्ची खुशी,सच्चा  आनंद   प्राप्त
होता है,अपनी खुशी को आपस में बॉटकर उसका लुफ्त उठाइए ।हास्य जीवन का  सौरभ
है ।सदा जवान और ताजा रहने के लिए खूब हंसिए,बिना किसी व्यवधान के हंसिए,क्योंकि
हंसी तो ईश्वर की विशेश देन है ।जितना चाहो उतना हंसिए,अपने बचपन की  गहराइयों  में
उतरकर,अपनी शैतानियों पर ठहाका लगाइए। फिर देखना जिंन्दगी किस तरह खिल उठती है।।

2-           कभी-कभी हम अपने ऊपर अति विश्वास के कारण
किसी कार्य को सम्पादित करते समय , उसके सभी कारणों की
कोई सूची भू नहीं बनाते हैं ।अधिकॉश लोग यह  मानकर चलते हैं
कि हम अपने सभी उद्देश्यों को जानते हैं,परंतु इसी के साथ  हम  यह
भी भूल जाते हैं कि अकसर हमारे कुछ उद्देश्य यह भी होते  हैं,जिनके बारे
में कभी सोचा तक नहीं है,और ऐसे ही न मालूम यह उद्देश्य अकसर   हमारी
राह के रोडे बनकर खडे हो जाते हैं।यह हमारी राह के बाधक बनते हैं,तभी हमारा
ध्यान इनकी ओर जाता है।अगर लक्ष्यों को मूल समझलिया जाए,तो हम सहज ही
समस्याओं के सर्जनात्मक समाधान पर पहुंचने में सफल सिद्ध हो सकते है ।

3-        स्वयं को पहचानिए,अपनी शक्तियों को पूर्णतः जागृत
कीजिए । आपकी सुप्त  पडी  प्रतिभा  आपसे वह सबकुछ करा देगी
,जिसे आप अभी तक कल्पनाओं में सोचते रहे हैं।आपकी क्षमताओं के
जागृत होते ही आप स्वयं कहने लगेंगे कि मैं भी कुछ कर सकता हूं ।।

4-         आप क्यों परेशान हैं ?ऐसे कौन से कारण
हैं ,जिन्होंने आपको परेशान कर रखा है ? यह  बेचैनी
सी क्यों है ?शायद यह किसी परेशानी के कारण है।आखिर
यह परेशानी क्या है ?कौन है इसका जिम्मेदार ?कहॉ से प्रारम्भ
होता है इसका सूत्र ?क्या परेशानी के समय इन प्रश्नों  पर  आपने
कभी गौर किया है।कभी सोचा है।अगर नहीं सोचा तो आइये इन  प्रश्नों
प्रश्नों पर गम्भीरता के साथ मंथन करें ।शायद आपकी परेशानी का वास्तविक
कारण कुछ और ही हो।कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हमारी जो समस्या होती
है उसके मूल में ही उसका समाधान होता है और हम विमूढता में पडकर इधर-उधर
हाथ पैर पटकते रहते हैं ,जिसका नतीजा शून्य निकलता है यही हमारी परेशानी का सबब है ।।

5-            मैं अपने मित्र के साथ वैडमिंन्टन खेलता हूं,
वह  प्रतिदिन  ही  आमतौर  पर  इसलिए  हार  जाता  है  कि
वह हमेशा ही बहुत तेजी के साथ शॉट मार  कर शटल  कॉक  को
दबा देने का प्रयत्न करता है और फिर होता यह है कि उसकी शीघ्रता
और शक्ति से शटल जाल में फंसकर रहजाती है ।वास्तव में एक अन्य
उद्देश्य के कारण वह बहक जाता है,कि वह अन्य लोगों को वेहद दम-खम
तेज तर्रार खिलाडी दिखाई दे।जिससे वह विफल हो जाता है।इसलिए अगर
लक्ष्य को मूल समझ लिया जाय तो हम सहज ही समस्याओं के सर्जनात्मक
समाधानपर पहुंचने में सफल सिद्ध हो सकते हैं।

6-             हमारे अंदर की निराशा हमारी सोच का ही
दुष्परिणॉम है ।अकसर जिंदगी  में ऐसा होता है कि आप
किसी भी कार्य ,किसी बात,घटना,अथवा व्यक्ति  के संबंध में
अपनी बनाई धारणॉ को विपरीत पाते हैं।इसका मुख्य कारण आपकी
असंगत सोच ही है,जबकि आप सोचते कुछ हैं और  होता  कुछ और है।
अतः इन सब कारकों से स्वयं को दूर रखने तथा मन में आशा की ज्योंति
जगाकर,निराशा के अंधकार को हमेशा के लिए नष्ट करने के लिए,ऊपर दिये
गये सुझावों पर अमल कीजिए फिर देखिए आपका मस्तिष्क निराशा को भूल ही जायेगा ।

7-             वैसे उत्थान और पतन में किसी  का भी  चयन
कर लो अपनी मर्जी की बात है। और यह    भी सच है कि  अपने
विचार में तो प्रत्येक व्यक्ति  सुख देने  वाले कार्य करना  चाहते हैं, किन्तु
जिस प्रकार अज्ञानता के कारण बच्चे सॉप-बिच्छू,ढिपकली जैसे भयंकर प्राणियों
को भी खिलौना समझकर पकडने के लिए हाथ बढा देते हैं,ठीक उसी प्रकार उपयुक्त
जानकारी के अभाव में वह ऐसा नहीं करता।कभी क्षणिक लाभ कभी जल्दबाजी  में  ऐसा
निर्णय ले लेता है ,जो भविष्य में  उसके  लिए  दुखदायक होते हैं। सही का  चुनाव  करना  ही
बुद्धिमता की सबसे बडी कसौटी है।जीवन जैसी महान संपदा को किस प्रयोजन के लिए नियोजित
किया जाय.इसका चुनाव जो कर सकें,उन्हीं को बुद्धिमान कहा  जायेगा  और  यह सब निर्भर करता
है हमारे सोचने की क्षमता पर,हमारे उत्कृष्ट विचारों पर ।हम अपने सोचने  की  क्षमता में सुधार कर
स्वयं को निराशा उत्पन्न करने वाली स्थिति से उबार सकते हैं।मन में गहरे रूप  में बैठ  गई  शंका  को
उखाड फेंक दीजिए और अपने सोचने के तरीके को बदल डालिए ।फिर देखिए निराशा आपको दबर-दूर तक
नजरनहीं आयेगा ।सभी कार्य त्वरित गति से पूर्ण होते चले जायेंगे।तो आइए आप भी हॉ-हॉ आपके लिए ही
है,आज से ही इस मंत्र को अपने जीवन में उतार लीजिए और अपनी सोच को एक नईं दिशा दीजिए ।सबकुछ
अच्छा ही अच्छा होगा ।।

8-                   निराशा से बचने के लिए तो सच्चाई को
स्वीकर रना होगा भ्रामक धारणाओं से बचना होगा,क्योंकि
भ्रॉतियॉ स्वयं में अनेक विपत्तियों को को जन्म देती हैं ।रस्सी
को सॉप और झाडी को भूत समझकर कई बार लोग इतने व्याकुल
हो जाते हैं कि भयभीत और कर्तव्यविमूढ होकर प्राण तक गंवा बैठते
हैं।मछलियों और चिडियॉ चारा देखते ही उस पर लपकती हैं वे यह नहीं
समझ पाती कि यह प्रपंच उन्हैं जाल में फंसाने वाले बहेलिए ने रचा है,यह
भ्रम है ।वे कंटीली झाडियों वाले भटकाव में बुरी तरह भटकता है और ठोकरं
से निरंतर आहत करता है।किसी ने सच कहा है कि मनुष्य अपने भाग्य का
निर्माता स्वयं है,उसकी तो एक मुठ्ठी स्वर्ग में और दूसरी नर्क में संजोया हुआ है ।।

9-             असफलता पर पश्चाताप अवश्य कीजिए।  उसका
कारण भी तलाशिए,परतु  निराशा  को  अपने  पास मत  फटकने
दीजिए।निराशा तो आपको बहुत कुंठित कर सकती है।विचार श्रृंखला
में परिवर्तन निराशा दूर करने में आपकी सहायता करेगी,क्योंकि आपके
विचार ही आपकी निराशा के मुख्य कारण हैं।निराशा आपके विचारों की उपज
है ।अतः इसके मूल में निहित विचारों को बदलिए।निराशा खुद ही आपसे दूर
भागेगी ।।

10-           निराशा तो आपके मन के विचारों की उपज होती  है।
अगर आप अपने विचारों की  दिशा  ही  परिवर्तित कर दें,तो निराशा
दूर तक नजर नहीं आयेगी ।    किसी भी असफलता  पर निराश होना हर
साधारण मनुष्य की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है,इसमें असाधारण कुछ भी नहीं है।
हॉ अगर गलत है तो वह है अपनी असफलता का रोना लेकर बैठ जाना और निराशा
को सीधे-सीधे आमंत्रण देना।यह नहीं होना चाहिए ।।

11-        यदि आप अपने लक्ष्य को साकार होना देखना
चाहते हैं,  तो लक्ष्य पर  हमेशा  ध्यान रखिए। उद्देश्य  पूर्ति
हेतु लगन के साथ कर्म कीजिए।वैसे ही साधन अपनाइए,आपके
स्वप्न अवश्य पूरे होंगे ।आपकी सोच वास्तविकता  का  बाना धारण
कर लेगी ।आपका कर्म लगन के साथ मिलकर सपनों को साकार कर देगा।

12-                सफलता प्राप्त करने के लिए जवर्दस्त
सतत् प्रयत्न करो ।प्रयत्नशील आत्मा कहती है कि मैं चाहूं
तो समुद्र पी जाऊंगी, मेरी  इच्छा  से पर्वत  के  टुकडे- टुकडे हो
जायेंगे इस प्रकार की शक्ति एवं इच्छा रखो, कडा  परिश्रम  करो,
तुम अपने उद्देश्य को निश्चित पा सकते हो

सहजयोग के आधार तत्व-19


1-शरीर की महॉनतम् शक्ति

            हमारे शरीर में कुण्डलिनी महॉनतम् शक्ति है।
जिस साधक ने कुण्डलिनी का उत्थान कर दिया उस साधक
का शरीर तेजोमय हो उठता है।इसके कारण शरीर के दोष एवं
अवॉच्छित चर्वी समाप्त हो जाती है।अचानक साधक का शरीर अत्यन्त
संतुलित एवं आकर्षक दिखाई देने लगता है।आंखें चमकदार और पुतलियॉ
तेजोमय दिखाई देती हैं। संत ज्ञानेश्वर जी ने कहा है कि सुषुम्ना में उठती
हुई कुण्डलिनी द्वारा बाहर छिडका गया जल अमृत का रूप धारण करके
उस प्राणवायु की रक्षा करताहै जो “उठती हैं,अन्दर तथा बाहर शीतलता
का अनुभव प्रदान करती है” ।।

2-सहजयोग का ज्ञान

              ऐसे लोग देखे गये हैं जो गीता पर लगातार
घण्टों भाषण देते हैं परन्तु अनके दिमाग पूरी तरह बन्द हैं।
यही कहा जाता है कि उन्होंने कुण्डलिनी के बारे में कुछ नहीं कहा।
और इसीलिए ज्ञानेश्वर जी ने बारहवीं शताब्दी में अपने गुरु की आज्ञा
मॉगी कि कमसे कम मुझे कुण्डलिनी के विषय में कुछ कहने की तो आज्ञा
दो, तो फिर इसके बारे में थोडा बहुत पता चला .इससे पूर्व आदि शंकराचार्य
और मार्कण्डेय जैसे लोग हुये लेकिन अन्होंने केवल कुण्डलिनी की बात की,प्रशंसा
की लेकिन ये किस प्रकार अठेगी कुछ नहीं बताया। सहज योग के ज्ञान का वर्णन
तो ज्ञानेश्वर जी ने ही किया। उन्होंने पायदान में ठीक प्रकार से बताया कि क्या
घटित होगा,और कितने लोगों को आत्म साक्षात्कार मिलेगा ।

3-कृष्ण एक मस्तिष्क हैं,वे विराट हैं

             श्री कृष्ण बहुत थोडे समय के लिए आये,
थोडे समय में उन्होंने बहुत से राक्षसों का वध किया था,
पॉण्डवों की ओर से युद्ध किया,श्री कृष्ण ने कहा कि उन्हैोंने
कौरवों का वध नहीं किया परन्तु उन्होंने ऐसा किया।एक ओर तो
कृष्ण मधु की तरह मधुर हैं,इसी कारण से उन्हैं माधव कहा जाता है।
जो लोग उनकी कृपा चाहते हैं,उनके लिए वे माधव हैं।परन्तु आसुरी प्रवृत्ति
के लोगों के लिए वे भयानक अवतरण हैं।निसंदेह शिव भी ऐसा ही करते हैं।
शिव और देवी ने भी बहुत से राक्षसों का वध किया,बहुत से वाद-विवाद किये
परन्तु कृष्ण ने कभी वाद-विवाद नहीं किया ,क्योंकि वे जानते थे कि एक-एक
करके इनसे किस प्रकार छुटकारा पाना है।उन्होंने असुरों से बहुत सी चालाकियॉ
भी की।एक दुष्ट राक्षस था, जो लोगों को सता रहा था।युद्ध करते हुये कृष्ण ने
उससे चालाकी की दौडकर कृष्ण एक गुफा में घुस गये, जहॉ एक संत सोया
हुआ था। सन्त को शिव से वर प्राप्त था कि उसकी नींद भंग करने वाला
व्यक्ति भस्म हो जायेगा।कृष्ण ने अपनी शाल धीरे से उस संत पर डाल
दी और स्वयं छिप गए।उनके पीछे -पीछे दौडता राक्षस गुफा में आया
और सोये हुये सन्त को श्री कृष्ण समझकर उसे लात मारी।वह संत
उठ बैठा और ज्यों ही अपनी तीसरी आंख से उस राक्षस को ओर
देखा वह रात्रस भस्म हो गया।यह श्रीकृष्ण की चालाकी थी ।
श्री कृष्ण ज्ञानवान और चतुर थे क्योंकि वे मस्तिष्क हैं,
विराट हैं उनकी छाया, प्रेम,करुणॉ और सौन्दर्य
उनके गोप-गोपियों के लिए था।।

4-जीवन का सौन्दर्य

             सारे संसार में जितना सुख और मजा है,
सारे संसार का जितना आकर्षण और सौन्दर्य है,वैभव है,
सबकुछ जोभी है,जिसे आप नॉलेज कहते हैं,जिसे आप ज्ञान
कहते हैं,उन सबका स्रोत परमात्मा(आदिशक्ति) है।यह जानता
भी है,प्यार भी करता है ।यह हम लोगों का निर्माता है,हमारा रक्षक
है,जिसकी यह इच्छा है कि हम लोगों का अस्तित्व बना रहे।जो स्वयं
हमारा अस्तित्व है वह सर्वशक्तिमान ईश्वर है।परमात्मा ने इस विश्व
की,ब्रह्माण्ड की,सृष्टि की रचना की है,केवल इसलिए कि वे आपसे
प्रेम करते हैं,और अपने प्रेम के कारण वे आप पर आशीर्वाद की
वर्षा करना चाहते हैं ।।

5-परमात्मा आपको साम्राज्य देना चाहते हैं

परमात्मा अत्यन्त करुणॉमय है,प्रेममय और
दयालु है। उन्होंने हमें आत्मज्ञान प्राप्त करने की स्वतंत्रता दी है।
परमात्मा ने हमें अमीबा से इस मानव स्थिति तक विकसित किया है।
परमात्मा यह साम्राज्य आपको अर्पित करना चाहते हैं,आपको इस साम्राज्य
का राजकुमार बनाना चाहते है । सिर्फ इन्तजार है आपके चाहने की ।।

6- सहज योग एक महॉयोग है

              जब एक बार आप सहजयोग के सर्वोच्च बिन्दु
को प्राप्त कर लेते हैं तो आपको कुछ अन्य करने की आवस्यकता
नहीं रहेगी।जिसअवस्था को प्राप्त करने के लिए लोगों को हजारों वर्षों
तक कार्य करना पडा था वो आपको सहज ही प्राप्त हो गया, यह एक
जीवन्त प्रक्रिया है,पूर्णतः जीवन्त प्रक्रिया ।जो भी चीज है जीवन्त है,वह
हमारे अन्दर बहुत ही जटिल संस्थाओं के साथ मिलकर स्वतःही कार्यरत है ।।

7-सहजयोग व्यावहारिक प्रक्रिया है

            सहजयोग में आपको नंगे पॉव नहीं चलना
पडता,न भूखा रहना पडता,न गृहस्थ जीवन का त्याग
करना पडता,बल्कि सहजयोग अति व्यावहारिक है,क्योंकि यह
पूर्णतः सत्य है।अतः अपनी सारी शक्तियॉ,सूझ-बूझ और करुणॉमय
प्रेम के साथ आपको अपने विषय में आश्वस्त होना है,और जानना है
कि हर समय परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति उन्नत होने में आपकी
सहायता,रक्षा मार्गदर्शन,पोषण तथा देखभाल कर रही है ।आप कैसे
भी हैं आपके तरीके कुछ भी हैं,चाहे आप गलत रास्ते पर हों,कुछ
भी करते हों,पर सहजयोग में आपकी कुण्डलिनी जगाने का कार्य
होता है,यह स्वयं आपको करना है,फिर आप स्वयं अपने आप
ठीक हो जायेंगे ।मॉ को कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है,
क्योंकि आप खुद ही देखते हैं कि यह चीज क्या है ।।

8-आदिशक्ति की घोषणा

               मैं घोषणा करती हूं कि मैं ही मानवता की रक्षा
के लिए अवतरित हुई हूं। मैं घोषणॉ करती हूं कि मैं ही आदिशक्ति
हूं जो सब माताओं में परम है,जो आदि मॉ है।मैं शक्ति हूं जो कि परमात्मा
की शुद्ध इच्छा है,शक्ति,जो स्वयं अपने अस्तित्व को अर्थ प्रदान करने के लिए
अवतरित हुई है,और मुझे पूर्ण विश्वास है कि अपने धर्म,प्रेम,धैर्यतथा अपनी
शक्तियों द्वारा मैं इस लक्ष्य को प्राप्त कर लूंगी। मैं ही वह शक्ति हूं जो
बार-बार अवतरित हुई ।परन्तु अब मैं अपनी पूर्ण कलाओं और पूरी
शक्तियों के साथ आयी हूं।पृथ्वी पर मैं केवल मानव का उद्धार
करने और उसे मुक्त करने के लिए ही नहीं आई हूं,मैं तो
मानव को स्वर्ग का साम्राज्य, आनन्द और आशीष देने
के लिए आई, हूं जो आपके परपिता (परमात्मा,
अल्लाह,सदाशिव) आप पर बरसाना चाहते हैं ।।

9- प्रेम की सर्वव्यापी शक्ति

              प्रेम की सर्वव्यापी शक्ति क्या है?क्या
यह हमारे चारों ओर प्रवाहित कोई ऊर्जा है या किसी
प्रकार की नदी या आकाश? यह वास्तविकता की सम्पूंर्णता
है,बाकी चीजें असत्य हैं। और वास्तविकता इतनी कार्यकुशलता
है कि यह कभी असफल नहीं होती।

10-परमात्मा से जुडने की स्थिति

               यदि आप मौन हो जॉय तो समझ लें कि आप
परमात्मा से जुड गये,आप परमात्मा के साम्राज्य में बैठे हैं।
यह मौन इस बात की निशानी है कि निःसंदेह अब आप परमात्मा
से जुड गये,आप अब शॉत हैं क्योंकि अब परमात्मा आपके हर कार्य
को सम्भालेंगे।आपको कुछ नहीं करना है।केवल निर्विचार रहना होगा,मजबूरन
नहीं किसी समस्या के उथल-पुथल के आते ही आपका चित्त मौन पर चला
जाता है और ऐसे होते ही आप सर्वव्यापक शक्ति से जुड जायेंगे ।।

11-आत्म संतुलन की स्थिति

             आपको सबसे पहले अपना आत्म संतुलन बनाये
रखना है।और एक बार संतुलन में आने के बाद एक गुरु का
कार्य अन्य को संतुलन देना है। जववायु,प्रकृति, वातावरण ,मनुष्यों
और पूरे समाज को संतुलित करता है।यह संतुलन भी गुरुत्व से आता है।
राजा हो या भिखारी पर यदि वह गुरु है तो हर हाल में यह सम्पूंर्ण संतुलन
में होगा कोई चीज उसे ललचा नहीं सकती ।प्रर्लोभन,लालच,और वासना से परे
की अवस्था में जब आप पहुंचते हैं तो समस्यायें समाप्त हो जाती हैं।फिर ये
तपस्विता तो आपके अन्दर है,।।

12-परमात्मा पर विश्वास रखने वाला स्वयं परमात्मा है

               विश्वास रखें आपकी एकाकारिता उस महान
शक्ति के साथ है जो सर्वशक्तिमान है। परमात्मा के विषय
में वाद-विवाद करने की आपमें बुद्धि है?परमात्मा में आपका विश्वास
अडिग होना चाहिए।जिस व्यक्ति को परमात्मा पर विश्वास है वह तो स्वयं
परमात्मा है, और जब आपमें यह विश्वास पूर्णतया दृढ हो जाता है,तो आप उस
स्थिति को प्राप्त करें कि जो गुरु का है, जहॉ भी आप हैं,किसी भी पद पर आप हैं,
कुछ भी करें,सर्वशक्तिमान के प्रति दृढ विश्वास है तो आप परमात्मा की तरह कार्य करेंगे

13- आदिशक्ति आपकी रक्षा करती है

           आदिशक्ति का पहला कार्य आपको आत्म साक्षात्कार
देना है,दूसरा कार्य आपको सुखद जीवन प्रदान करना है। यदि
आपको शारीरिक व्याधियॉ हैं तो उसका ध्यान रखेगी।आपकी समस्यायें
दूर होंगी।यह शक्ति आराम दायिनी है जो कि आपकी रक्षा करती है। वह
सब चक्रों का कार्य जानती है,उन्हैं मानव जाति में आकर मानव रूप में अवतरण
लेना पडा।जिससे कि वे समझ सकें कि मानव में क्या-क्या दोष है ।और उन दोषों
को निकालने के लिए क्या करना चाहिए ।क्योंकि इन दोषों को रहते हुये कुण्डलिनी
कैसे जागृत होगी ।

14-चैतन्य लहरियॉ सिर्फ देवी प्रेम है

             चैतन्य लहरियॉ दैवी प्रेम के अतिरिक्त कुछ भी
नहीं है।आपका प्रेम मेरे ह्दय में इस देवी प्रेम की चमक तथा
सुन्दरता को गुंजित करता है मैं वर्णन नहीं कर सकता कि यह अनुभव
क्या सृजन करता है,सर्व प्रथम ये मेरी आंखों में आंसुओं का सृजन करता है,
क्योंकि यह करुणॉ ही देवी प्रेम की शुरुआत है ।।

15आदिशक्ति से तीन शक्तियॉ निकली हैं

                 आदि शक्ति से तीन शक्तियॉ निकली हैं महॉकाली,
महॉलक्ष्मी,महॉसरस्वती और ये शक्तियां पुनः उसी में समाहित होती हैं।
आदि शक्ति के सिवाय यह कार्य हो नहीं सकता,क्योंकि सारे चक्रों में उनका
प्रभुत्त्व है,और वे ही हैं जो हर तरह से चक्रों के आपसी सम्बन्ध को सम्भालती हैं।
इसे त्रयसंयोग कहते हैं ।आदिशक्ति आप सबको सिंहासन पर बैठे अपनी शक्तियों का
आंनन्द लेते हुये देखना चाहती है, इसलिए हर आवश्यक कार्य अति सावधानी पूर्वक
किया गया है ।।

16-पहली बार आदिशक्ति ने आत्म साक्षात्कार दिया

                अब तक कोई भी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ
जिसने कि आत्म साक्षात्कार दिया हो अधिकतर लोगों ने तपस्या
के द्वारा ही आत्म साक्षात्कार दिया प्राप्त किया ।महॉत्मा बुद्धको तपस्या
द्वारा आत्म साक्षात्कार प्राप्त हुआ, प्राचीनकाल में आत्म साक्षात्कार का साधन
तपस्या ही था । सारा अनुभव व्यक्तिगत होता था,क्यों कि जिन लोगों ने आत्म
साक्षात्कार प्राप्त किया वे उसी में विलीन हो गये थे ।लेकिन अब यही चीज सामूहिक
रूप से मिल रही है।

17-सहजयोग बन्धन से मुक्ति है

             सहजयोग में आने पर आप कई बन्धनों से मुक्त
हो जाते है,परन्तु इसमें भी समय लगता है। एक जीवन काल में
आप आत्म साक्षात्कार प्राप्त करना चाहते हैं तो तभी इस जीवन में यह
स्थिति प्राप्त करना आपके लिए सम्भव होगा ।और इस जीवन में आप आधे
अंधेरे में रहे तो यह उपलब्धि प्राप्त करने के लिए आपको पुनः जन्म लेना पडेगा।
सदैव मध्य में रहेंअपनी उन्नति के बारे में चिन्तित नहों,एक बार जब आप मध्य
में आयेंगे तो स्वतः उन्नति होने लगेगी,इसके लिए आपको आदिशक्ति माता जी
को अपने ह्दय में विठाना होगा अनुभूति करें अन्तःकरण की शुद्धि के लिए
आवस्यक है।।

18-आपका जन्म महॉमानव बनने के लिए हुआ है

          नहीं हुआ है,बल्कि महॉमानव बनने के लिए हुआ है,
आपको आंनन्द लेना होगा ।आपका जीवन आंनन्द लेने के
लिए योग्य होना चाहिए ।सुबह से शाम तक इस विषय में चिन्ता
उस विषय में चिन्ता करते हैं।परमात्मा ने मानव की सृष्टि इसलिए
नहीं की कि लडाई झगडे करें,रक्षा के लिए हर समय चिन्ता करें।
परमात्माने मानव की सृष्टि इसलिए की है कि आप पूर्ण आनन्द
के साथ जीवन व्यतीत करें ।।

19-कुण्डलिनी उठती है तो जीवन्त क्रिया शुरू हो जाती है

               जव हमारी कुण्डलिनी उठती है तो मानवीय
चेतना में एक जीवन्त क्रिया शुरू हो जाती है जिसका परिणाम
आध्यात्मिक उत्क्रॉति है।आध्यात्मिक जीवन का यह विकास एक
नईं अवस्था है,जिसमें मनुष्य अपने अन्तर्जात देवत्व में उन्नति करने
लगता है।यह उसके शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक तथा आध्यात्मिक
अस्तित्व का पोषण करता है और इसे प्रकाशित करता है ।।

सफलता का मानदण्ड व्यक्ति का आत्मविश्वास है-1


             अपने आप में विश्वास का अर्थ ईश्वर
में विश्वास,यही सफलता का रहस्य है ।यदि आप
छत्तीस करोण देवी देवताओं में विश्वास करते हों और
अपने आप में विश्वास नहीं तो सफलता नहीं मिल सकती
है,अपने आप में विश्वास करो ,उस पर स्थिर  रहो  और  फिर
शक्तिशाली बनों। आत्म विश्वार कम हुआ नहीं कि,व्यक्ति की
एक मंजिल थम जाती है,फिर  विखराव  और  टूटन  से  बोझिल
वातावरण।काम छोटा हो या बडा उसकी सफलता का मानदण्ड
व्यक्ति का आत्मविश्वास है।

कीचड से दुश्मनी न करें अन्यथा कमल पैदा ही न होगा-1


              कीचड से कमल पैदा होता है।  आपके
शरीर में भी कीचड है,  और  उस  कीचड से  आत्मा
का कमल पैदा होता है,इसलिए  कीचड से  दुश्मनी  मत
करना नहीं तो कमल पैदा नहीं होगा।कमल और कीचड में
कितना हीं विरोध क्यों न दिखाई पडे लेकिन भीतर गहरा
संयोग होता है।कीचड से कमल पैदा होता है इसका अर्थ
हुआ कि कीचड की गहराई में कमल है,अन्यथा कमल
पैदा ही न होता ।