अंगारा भरी राहों पर चलना सीखें-7


1-अंगार भरी राह पर चलना सीखें-

जो लोग अंगारा बनकर अपने मन की
चिन्ताओं,भय और दुख को जला डालते हैं
उनको तो जीवन में सफलता पानेसे कोई नहीं
रोक सकता है।और जो लोग अंगार भरी राहों पर
चलने से डरते हैं वे तो कायर पुरुष कहलाते हैं,वैसे
दुश्मन को कभी भी छोटा नहीं समझन चाहिए क्योंकि
एक छोटी सी चिंगारी भी दहकता अंगारा बन जाता है ।

2-मन की बात-

मन सदैव ही अनेक प्रकार के विषय ग्रहण
कर रहा है,सब प्रकार की वस्तुओं में जा रहा है ।
लेकिन उसके बाद मन की एक ऐसी भी उच्चत्तर अवस्था
है,जब वह केवल एक ही वस्तु को ग्रहण करके अन्य अन्य सब
वस्तुओं को छोड दे सकता है ।इस एक वस्तु को ग्रहण करने का
फल ही समाधि है ।।

3-ध्यान क्या है-

मन किसी एक विषय को सोचने का प्रयत्न
करता है,जैसे मस्तिष्क के ऊपर या ह्दय आदि में
अपने को पकड रखने का प्रयत्न किया जाता है ।और उस
अंश को संवेदनाओं द्वारा ग्रहण करने में समर्त होता है तो उसका
नाम है धारणॉ, या जब मन शरीर के भीतर या उसके बाहर किसी
वस्तु के साथ संलग्न होता है और कुछ समय तक उसी तरह रहता है
तो उसे धारणा कहते हैं । और जब हम कुछ समयतक अपने को उसी अवस्था
में रखने में समर्थ होते हैं,तो उसका नाम है ध्यान ।

4-समाधि क्या है-

जब हम ध्यान में बैठते हैं तो वस्तु का रूप या
बाहरी दुनियॉ से हम हट जाते हैं,तो यह समाधि अवस्था
मानी जाती है ।जैसे मान लो एक पुस्तक के बारे में ध्यान कर
रहा हूं और मैं उसमें चित्त संयम करने में सफल हो गया ।तब विना
किसी रूप में प्रकाशित इस पुस्तक की संवेदनाएं मेरे ज्ञान में आने लगती
हैं,तो ध्यान की इस अवस्था को ही समाधि कहते हैं ।।

5-संयम क्या है-

जब हम अपने मन को किसी निर्धारित वस्तु की ओर
लेजाकर उस वस्तु में कुछ समय तक के लिए धारण कर
सकते हैं,और उसके बाद उसके अन्तर्भाग को उसके बाहरी भाग
से अगल करके काफी समय तक उसी स्थिति को बनाये रखते हैं
तो यह संयम कहलाता है।उस स्थिति में बाहरी आकार अचानक न जाने
कहॉ चला जाता है यह पता ही नहीं चलता । हममें तो केवल इसका अर्थ
मात्र भाषित होता है ।।

6-संयम में सफल होना ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करना है-

यदि हम इस संयम को साधन के रूप में अपनाने में सफल
हो जाते हैं तो सारी शक्तियॉ हमारे हाथ में आ जाती हैं ।यही संयम
योगी का प्रधान स्वरूप है।ज्ञान के विषय तो अनन्त हैं ।जैसे स्थूल,स्थूलतम्
सूक्ष्म,सूक्ष्मतम् आदि कई विभागों में विभक्त हैं।संयम का प्रयोग पहले स्थूल
वस्तु पर करना चाहिए,और जब स्थूल ज्ञान प्राप्त होने लगे,तब थोडा-थोडा करके
सूक्ष्मतम् वस्तु पर प्रयोग करना चाहिए ।

7-समाधि की पहली अवस्था-

समाधि की पहली अवस्था में मन की समस्त वृतियॉ
अवश्य हट जाती हैं, मगर मगर पूर्ण रूप से नही,क्योंकि
ऐसा होने से कोई वृत्ति ही नहीं रह जाती।मान लो कि योगी के
मन में एक ऐसी वृति उठ रही है जो मन को इन्द्रिय की ओर ले
जा रही है,और योगी उस वृत्ति को संयत करने का प्रयास करता है,तो
उस स्थिति में उस वृत्ति को भी एक वृत्ति कहना पडेगा ।एक लहर को
दूसरी लहर को रोका गया है,तो समाधि नहीं है।लेकिन फिर भी जिस अवस्था
में मन तरंग के बाद तरंग उठती रहती है,उसकी अपेक्षा यह निरंतर उच्च समाधि
की ओर बढता जाता है जो कि समाधि के एकदम समीप है ।।

Advertisements

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s