अंधेरे के बाद सबेरा-6


1-व्यक्ति और बुद्धि दोनों भिन्न हैं-

अगर देखें अभिन्न समझता है,और उसी से अपने आप को सुखी या
दुखी तो व्यक्ति और बुद्धि दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं,लेकिन होता यह है
कि व्यक्ति बुद्धि में प्रतिबिम्बित होकर बुद्धि के साथ अपने को अनुभव करता है
।बुद्धि के सारे भोग अपने लिए नहीं बल्कि व्यक्ति के लिए होते हैं बुद्धि की दूसरी
वह अन्तर्मुखी होकर केवल व्यक्ति का अवलम्बन करती है।इस अवस्था स्वार्थ है। जब
बुद्धि निर्मल होती है और उसमें व्यक्ति विशेष रूप से प्रतिविम्बित होता है,तब स्वार्थ
में संयम करने से व्यक्ति का ज्ञान होता है ।

2-देह प्रवेश सम्भव है-

एक योगी एक शरीर में क्रियाशील रहते हुये अन्य दूसरे मृत
देह में प्रवेश कर उसे गतिशील कर सकते हैं।अथवा किसी जीवित
शरीर में प्रवेश कर उस व्यक्ति के मन और इन्द्रियों को नियन्त्रित कर
सकते हैं,और तबतक चाहें उस शरीर के माध्यम से कार्य कर सकते हैं ।
यह सिद्धि संयम के प्रयोग से ही सम्भव है।योगी जनों के अनुसार आत्मा के
साथ मन भी सर्वव्यापी है,मन सर्वव्यापी मन का एक अंश मात्र है । वह अभी
इस शरीर के स्नायुओं के माध्यम से ही कार्य कर सकता है,लेकिन जब योगी इन
स्नायविक प्रवाहों से अपने को मुक्त कर लेते हैं,तब वे दूसरे शरीर के द्वारा भी कार्य
ले सकता है ।

3-हम देह से कार्य करते हैं यह हमारा भ्रम है-

अज्ञानतावशः हम सोचते हैं कि हम इस देह से कार्य कर रहे
है। क्योंकि जब यह मन सर्वव्यापी है,हम तो केवल एक ही प्रकार
के स्नायुंओं द्वारा क्यों बंधे हैं,इस अहं को एक ही शरीर में सीमाबद्ध
करक क्यों रखे हुये हैं ? योगी लोग इस अहं भाव को जहॉ कहीं इच्छा हो,
वहॉ अनुभव करना चाहते हैं ।इस अहं भाव के चले जाने पर,इस देह में जो
मानसिक तरंग उठती है, उसमें संयम करने में जब सफल हो जाते हैं,तब प्रकाश
के सारे आवरण नष्ट हो जाते हैं और समस्त अंधकार एवं अज्ञान नष्ट हो जाने के
कारण उन्हैं सबकुछ चैतन्यमय प्रतीत होता है ।

4- इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करें –

हमें वाह्य वस्तु की अनुभूति के समय, इन्द्रियॉ मन से वाहर
जाकर विषय की ओर दौडती हैं,तब ज्ञान होता है।जब एक योगी
इनमें संयम का प्रयोग करते हैं,तब वे इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर
लेता है ।जैसे एक पुस्तक को लेकर उसमें संयम का प्रयोग करें, और
फिर पुस्तक के रूप में जो ज्ञान है उसमें भी संयम करें तो जिस अहम् भाव
के द्वारा उस पुस्तक का दर्शन होता है,उसमें भी संयम करें ।इस अभ्यास से
समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त हो जाती हैं ।

5-दुःख का कारण सत्य और असत्य का विवेक है-

हम जो भी दुख भोगते हैं,वह सत्य और असत्य के विवेक से
उत्पन्न होता है।हम सभी बुरे को भला समझते हैं और स्वप्न को
वास्तविक। मात्र आत्मा ही सत्य है,एक लेकिन हम भूल जाते हैं कि शरीर
एक मिथ्या स्वप्न मात्र है। हम सोचते हैं कि हम शरीर हैं। यह अविवेक ही दुःख
का कारण है। यह अविवेक अविद्या से उत्पन्न होता है। विवेक के आने से बल आता
है, और तब हम स्वर्ग, देवता, आदि कल्पनाओं को त्यागने में समर्थ होते हैं। जाति,लक्षण,
और स्थान के द्वारा हम वस्तुओं में विभेद करते हैं-जैसे गाय और कुत्ते में भेद जातिगत है ।
इसी प्रकार दो गायों में भेद हम लक्षण के द्वारा करते हैं ।इसी प्रकार दो समान वस्तुओं में भेद
करते हैं स्थानगत मिन्नता के आधार पर ।लेकिन अगर भेद करने के सारे आधार काम न आये
तो उपरोक्त साधन प्रणाली के अभ्यास से अपने विवेक द्वारा उन्हैं पृथक कर सकते हैं ।योगियों
का उच्चतम दर्शन इस सत्य पर आधारित है कि पुरुष शुद्ध स्वभाव एवं नित्य पूर्ण स्वरूप है।
शरीर और मन तो यौगिक वस्तुएं हैं, फिर भी हम सदैव अपने आपको उनके साथ मिला
देते हैं और सबसे बडी गलती यही है कि पृथक का ज्ञान नष्ट हो गया है। विवेक शक्ति
प्राप्त होने से मनुष्य देख पाता है कि जगत की सारी वस्तुएं चाहे बाहरी जगत की हैं
या आन्तरिक जगत की सब यौगिक पदार्थ हैं ।

6-अन्धकार कितना ही घना क्यों न हो प्रभात अवश्य आयेगा –

अन्धकार चाहे कितना ही घना क्यों
नहो,और अन्धकार रूपी राक्षश कितना ही अट्टहास
क्यों न कर रहा हो,लेकिन उसके बाद प्रभात को तो
आना ही है।और सूर्योंदय के प्रकाश के साथ ही अन्धकार
का सबकुछ शून्य में मिल जायेगा।उसी प्रकार मनुष्य के दुखों
की रात्रि जैसी भी हो सूर्यलोक उसके समस्त अन्धकार को दूर
कर देगा।और मनुष्य के जीवन में उजाला आयेगा।

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