अंधेरे से उजाले की ओर


 

             स्वयं को जानकर
और समझकर ही मनुष्य
ऊंचाई की मंजिलों की तरफ
बढ़ सकता है। ऐसा इसलिए,
क्योंकि हम एक परमपिता परमेश्वर
की संतान हैं, उसके अंश हैं, परंतु आज
हर व्यक्ति भाग रहा है, एक जगह से दूसरे
जगह की ओर। व्यक्ति शायद स्वयं को खोज
रहा है, क्योंकि उसने स्वयं को खो दिया है।

               स्वयं के साथ संबंधों
को तोड़ लिया है और अब उसे
ही खोज रहा है। यदि आप अपने
आस-पास के हर व्यक्ति की तरफ
ध्यान देंगे, तो सबमें यही बात नजर
आएगी। हर व्यक्ति स्वयं को भूलकर एक
व्यर्थ की दौड़ में भागता जा रहा है। वह स्वयं
को भूल गया है कि आखिर वह है कौन? क्या
खोज रहा है, कहां खोज रहा है? उसे स्वयं पता
नहीं, परंतु फिर भी हरेक से पूछ रहा है, हरेक के
बारे में पूछ रहा है।

               आज आवश्यकता
इस झंझावात से निकलने
और स्वयं के अस्तित्व को
समझने की है। यात्रा हो, परंतु
शून्य से महाशून्य की ओर, परिधि
से केंद्र की, अज्ञान से ज्ञान की ओर,
अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से
सत्य की ओर। स्वयं के अस्तित्व को तलाश
कर ही हम जीवन के सही मूल्यों को समझ
सकेंगे।

            हम प्राय: ही अपना
जीवन कंकड़-पत्थर बटोरने
में गंवा देते हैं। सत्ता, संपत्ति, सत्कार
आदि सब कुछ पाकर भी अंतत: शून्य ही
हाथ लगता है। तो हम क्यों न आज ही जाग
जाएं, उठ खड़े हों। स्वयं की खोज करके अपनी
अंतरात्मा को प्रकाशित करें। हम बहिमरुखी हैं,
अंतमरुखी नहीं। बस, यही हम सबको समझना है।
स्वयं को समझकर ही हम उस एक परमात्म तत्व में
विलीन हो सकते हैं। परमपिता परमेश्वर के प्रति हम
कृतज्ञता तक ज्ञापित नहीं करते, जिसने अपनी परम
कृपा से हमें अपना ही अंश बनाकर इस धरा पर मनुष्य
रूप में भेजा है।

                  यदि हम स्वयं के
प्रति थोड़ा-सा सचेत हो जाएं,
तो बात बनते देर नहीं लगेगी।
आइंस्टीन जैसा महान वैज्ञानिक
ही नहीं, बल्कि तमाम ऐसे लोग
जिन्होंने जीवन में कुछ गौरवशाली
कार्य किए हैं, वे सभी स्वयं के अंदर
निहित अथाह सागर को समझने और
मापने की बात करते हैं। जो कृत्रिमता से
कोसों दूर हो, जहां हो एक गहन शांति। शांति
मिलती है, कामनाओं को शांत करने से। जीवन
मात्र चलते रहने का नाम नहीं है, बल्कि जीवन में
कुछ अच्छा कर गुजरने का नाम जिंदगी है। इसे जान-
कर ही आगे बढ़ना सही अर्थो में जीवन की सार्थकता है।

 

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