अज्ञानी की सेवा का फल-8


1-कृष्ण को देवताओं ने कैसे भगवान मान लिया था-

जब ब्रह्मा जी ने देखा कि वृन्दावन में एक बालक को
भगवान माना जा रहा है, और वह असामान्य कार्य कर
रहा है,तो ब्रह्मा जी ने उस बालक की परीक्षा लेने के लिए
कृष्ण के बछणों और संगियों को चुराकर छिपा लिया था। एक
साल बाद जब ब्रह्मा जी वृन्दावन लौटे तो देखा कि वे बछडे और
संगी वहीं खेल रहे हैं। फिर वे समझ गये कि कृष्ण भगवान हैं। वे
भी कृष्ण की शरण में आकर स्तुति करने लगे थे। इसी तरह वृन्दावन
में लम्बे समय से वर्षा नहीं हुई तो इन्द्र के लिए यज्ञ करना था। कृष्ण
ने अपने पिता नन्द से कहा कि इन्द्र के लिए यज्ञ करने की कोई आवश्यकता
नहीं है,क्योंकि वे भगवान के आदेश के अधीन है। कृष्ण ने नन्द से यह नहीं कहा
कि मैं भगवान हूं, बल्कि यह कहा कि इन्द्र भगवान के आदेश के अधीन हैं,इसलिए
उसे आपके लिए वर्षा करनी ही पडेगी। इसलिए यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं है। यज्ञ
बन्द होने पर इन्द्र क्रोधित हो उठा, और वृन्दावन वासियों को दण्डित करने के लिए सात
दिनों तक मूसलाधार वर्षा कराई,वृन्दावन जल में डूब सा गया–लेकिन सात वर्ष के बालक
कृष्ण ने तुरन्त गोवर्धन पर्वत को उठाकर सारे वृन्दावन वासियों को अपने पशुओं सहित पर्वत
के नीचे शरण लेने को कहा, और सात दिनों तक वृदन्दावन वासियों की रक्षा के लिए उठाये रखा।
फिर इन्द्र की समझ में भी आ गया कि कृष्ण भगवान हैं।।

2-भक्त और अभक्त के मरने में भेद-

एक प्रश्न सामने आता है कि भक्त मरते हैं और अभक्त
भी मरते हैं फिर दोनों में अन्तर क्या है? इसे इस रूप में देख
सकते हैं कि-जैसे चूहा- बिल्ली, बिल्ली चूहे को मुंह में पकडकर ले
जाती है,जबकि उसी मुंह में अपने बच्चों को भी ले जाती है। मुंह वही है,
बिल्ली के बच्चे अपने को सुरक्षित महशूष करते हैं,जबकि चूहा अपने आप को
मृत्यु के जबडे में समझता है। ।इसी प्रकार मृत्यु के समय भक्तजन सीधे वैकुण्ठ
जाते हैं जबकि सामान्य पापी सीधे नरक जाते हैं।

3- शिक्षा की असफलता-

आधुनिक शिक्षा के बारे में हमारे आचार्य अनेक विशयों
के बारे में बातें करते हैं,चर्चा करते हैं लेकिन अगर हम उन्हीं
से पूछते हैं कि आप क्या हैं तो उनके पास कोई उत्तर नहीं रहता
है। विश्वविद्यालय उन स्नातकों को उपाधि प्रदान करते हैं,और फिर
वे सोचते हैं कि मैं पी.एच.डी हूं,एक विद्वान हूं। लेकिन अगर हम उन
विद्वानों से कहें कि वह क्या है, और जीवन का उद्देश्य क्या है तो वह केवल
अपने शारीरिक उपाधियॉ का उल्लेख करेगा कि में अमेरिकन हूं,याभारतीय हूं,मैं
पुरुष हूं,इत्यादि।वह अपनी पहचान शरीर के साथ बतला सकता है,जो कि वह नहीं
होता, इसलिए वह मूर्ख कहा जायेगा। जब सनातन चैतन्य महॉप्रभु के पास उनके शिष्य
बनने पहुंचे तो आत्मसमर्पण करते हुये,कहा हे प्रभो जब मैं मंत्री था तो लोग मुझे विद्वान
कहते थे,जिससे मैं अपने आपको विद्वान समझ बैठा था,लेकिन न मैं विद्वान हूं और न बुद्धिमान,
क्योंकि मैं नहीं जानता कि मैं क्या हूं,और मेरे ज्ञान का यह परिणॉम है कि मैं सब जानता हूं इसके
अतिरिक्त कि मैं क्या हूं,जीवन की इस कष्टप्रद अवस्था से किस तरह छूटा जाय ।

4-हमारी विस्मृति और वैदिक ज्ञान-

हम सभी यही सोचते हैं कि मैं एक शरीर हूं,इस शरीर को ही
अपनी पहचान मान बैठते हैं। किन्तु हम शरीर नहीं हैं,बल्कि शरीर
के स्वामी हैं। जिस तरह कि हम अपना निवास स्थान नहीं बल्कि उस
कमरे के स्वामी या रहने बाले हैं। जब हम अपने शरीर का अध्ययन करते
हैं तो कहते हैं कि यह मेरा हाथ है,मेरा पॉव है। यह शरीर आत्मा के वाहन के
अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। हम भूल चुके हैं कि इससे पूर्व हमारा शरीर कौन सा
था,यहॉ तक कि इस जीवन में भी हमें यह स्मरण नहीं रहता कि हम अपनी माता
की गोद में कभी शिशु थे। न जाने हमारे जीवन में कितनी बातें घटित हुईं, लेकिन हम
इन सबको स्मरण नहीं रख पाते। और यदि हम घटित इस जीवन की बातें स्मरण नहीं रख
पाते तो विगत जीवन को कैसे स्मरण रख सकते हैं? कोई व्यक्ति पाप कर्म में इसलिए रत् रहता
है,क्योंकि वह यह नहीं जानता कि उसने विगत जीवन में क्या किया था! जिससे उसे वर्तमान शरीर
प्राप्त हुऐ है। ऐसे पाप कर्मों से ही तो मनुष्य को दूसरा शरीर प्राप्त होता है। फलस्वरूप उसे कष्ट भोगना
होता है,कि वह अपने वर्तमान शरीर में अपने विगत पापकर्मों के फल भोग रहा होता है। जिस व्यक्ति को
वैदिक ज्ञान नहीं होता है वह सदैव यह भूल कर कर्म करता है कि उसने भूतकाल में क्या किया था,वर्तमान
में क्या कर रहा है,और भविष्य में किस प्रकार कष्ट भोगेगा। वह तो पूर्णतः अन्धकार में रहता है। इसलिए
वैदिक आदेश है –तमसि मा-अन्धकार में मत रहो ।ज्योतिर्गम-प्रकाश में जाने का प्रयास करो। यही प्रकाश
वैदिक ज्ञान है।

5-सेवा से वैदिक ज्ञान-

सेवा के ज्ञान श्रोत गुरु और भगवान माने गये हैं।
यदि आप इनके प्रति श्रद्धा रखते हैं,तो आपको वैदिक
ज्ञान का सारा सार स्वतः प्रकट हो जाता है। वैदों का आदेश
है कि मनुष्य को चाहिए कि गुरु के पास जाये, तभी वेदों का
पूर्ण ज्ञान होता है। और भागवत् बनने के लिए गुरु के निर्देशों का
पालन करें,तभी वेदों का ज्ञान प्रकट होता है।और जब वैदों का ज्ञान
प्रकट हो जाय तो फिर उसे भौतिक अन्धकार में रहने की आवश्यकता
नहीं पडती है।

6-पीडा तथा आन्द की अनुभूति—

इस भौतिक जगत में कोई आनन्द नहीं है। हर एक वस्तु
पीडादायक है,लेकिन हम-आप हैं कि इन्द्रिय कार्यो द्वारा सुखी
बनने का ही प्रयास करते हैं,लेकिन परिणॉम निकलता है दुःख तथा
निराशा। इसी को माया कहते हैं। भगवान बुद्ध ने तो भौतिक आनन्द के
स्वभाव को समझ लिया था। युवा में तो वे राजकुमार थे,खूब ऐश्वर्य और
आनन्द भोग रहे थे,लेकिन उन्होंने इन सबका परित्याग कर दिया। ध्यानमग्न
हो गये और सारे इन्द्रिय कार्यों को बन्द कर दिया,जोकि इस जगत के कष्टों तथा
आनन्दों को दिलाने वाले थे। यह शिक्षा देने के लिए कि इन्द्रिय कार्य हमें मोक्ष प्राप्त
करने में सहायक नहीं होते हैं । अपने राज्य को त्याग दिया। और इस जगत के सुख-दुख
के चंगुल से बाहर निकल गये। इसीलिए बौद्ध मत हमें यह शिक्षा देता है कि मनुष्य जैसे ही
भौतिक शरीर के रूप में भौतिक तत्वों के संयोग को छिन्न-भिन्न कर देता है, वैसे ही सुख-दुख
से भी छुटकारा पा सकता है। बौद्ध मत का लक्ष्य निर्वॉण है अर्थात वह दशा जिसमें मनुष्य भौतिक
संयोग से अपने सम्बन्ध तोडकर प्राप्त करता है। लेकिन बौद्ध मत में अपूर्णता यह देखी गई है कि इसमें
शरीर के स्वामी,आत्मा के विषय में कोई सूचना नहीं दी जाती है । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान
बुद्ध पूर्ण सत्य से अवगत नहीं थे।

7-बौद्धवाद और माया वाद-

धर्म के अन्दर कई वाद देखे गये हैं,जैसे बौद्ध वाद तथा शंकराचार्य
का मायावाद दर्शन, दोनों ही अपने अनुयायियों को इन्द्रिय कार्यों से उत्पन्न
कष्ट तथा आनन्द से मुक्त होने का प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित करते रहे।
बुद्ध ने तो केवल पदार्थ की बात कही कि निर्वॉण प्राप्त करने के लिए मनुष्य को
शरीर के भौतिक संयोग को छिन्न-भिन्न करना चाहिए। अर्थात-शरीर पॉच तत्वों —
पृथ्वी,जल,वायु,अग्नि तथा आकाश का संयोग है,और यही संयोग सुःख-दुःख का कारण
है।यदि इस संयोग को ही छिन्न-भिन्न कर दिया जाय तो फिर सुःख-दुःख नहीं रहेंगे। शंकराचार्य
जी ने बुद्ध का खण्डन किया,क्योंकि यह आत्मा के विषय में कोई सूचना नहीं देता है। शंकराचार्य के
दर्शन में तो अपनी आदि आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त करना है। ब्रह्म का ध्यान करते वक्त मायावादी
समझता है कि मैं ईश्वर बन गया हूं। ,क्योंकि गुंण की दृष्टि से आत्मा ईश्वर के ही समान है।लेकिन यह
भी एक भूल है,इसलिए कि मात्रात्मक दृष्टि से कभी कोई ईश्वर के समान नहीं बन सकता। मायावादियों का
मानना है कि ज्ञान का संचाय करके वे ईश्वर के बराबर हो जाते हैं।इसीलिए वे एक दूसरे को नारायण से पुकारते
हैं।यब उनकी बडी भूल है,इसलिए कि हम भगवान नारायण नहीं बन सकते हैं ।कोई भी विवेकवान व्यक्ति यह दावा
नहीं कर सकता है कि मैं ईश्वर हूं। लेकिन शंकराचार्य की यह बात कि वह अपने को शरीर नहीं बल्कि आत्मा समझें
उपयुक्त है। इसे तो सारे वेद मानते हैं कि मैं यह शरीर नहीं,शुद्ध आत्मा हूं।

8-अज्ञानी की सेवा किसी समय खतरनाक
हो सकती है-

क्योंकि अज्ञानी की सेवा के पीछे भी अज्ञान
खडा रहता है अज्ञानी के भीतर की चेतना तो वहीं की वहीं
रह जाती है उसमें कोई अन्तर नहीं आया अज्ञानी के लोभ जहॉ
खडे थे वहीं हैं।अगर किसी व्यक्ति को पुण्य करने का अवसर मिलता
है तो इसके लिए भी ज्ञान की आवश्यकता होती है अगर बिना ज्ञान के पुण्य
करने लगे तो इस पुण्य के महत्व की गहराई की अनुभूति उसे नहीं हो पाती ।इस
पुण्य का कोई मूल्य नहीं होगा ।इसलिए जीवन के हर क्षेत्र में ज्ञान आवश्यक है ।

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