मन और शरीर का सम्बन्ध-5


1-मन की शक्ति-

मन स्वभावतः बहिर्मुखी होता है,अर्थात बाहरी विषयों पर
अधिक ध्यान रहता है। लेकिन मनोविज्ञान या दर्शन शास्त्र के
अनुसार मन एक ऐसी शक्ति है,जिससे वह अपने अन्दर जो कुछ
भी हो रहा है,उसे देख सकता है। जिसे अन्तः पर्यवेक्षण शक्ति कहते हैं।
मैं तुमसे बात-चीत कर रहा हूं,लेकिन साथ ही मैं मानो एक और व्यक्ति
बाहर खडा हूं,और जो कुछ कह रहा हूं उसे सुन रहा हूं। अर्थात एक ही समय
चिन्तन और काम दोनों हो रहे हैं। तुम्हारे मन का एक अंश मानो बाहर खडे होकर,
जो तुम चिन्तन कर रहे हो उसे देख रहा है। मन की समस्त शक्तियों को एकत्र करके
मन पर ही उसका प्रयोग किया जा रहा है। जिस प्रकार प्रकाश की किरणों के सामने घने
अन्धकार के गुप्त तथ्य भी खुल जाते हैं। उसी प्रकार एकाग्र मन अपने सब अन्तर्मय रहस्य
प्रकासित कर देता है। तभी तो हम विश्वास की सच्ची बुनियाद पर पहुंचते हैं। तभी हमको धर्म
की प्राप्ति होती है,हम आत्मा हैं या नहीं,संसार में ईश्वर है या नहीं। यह हम स्वयं देख सकते हैं।
जितने भी उपदेश दिये जाते हैं, उनका उद्देश्य सबसे पहले मन की एकाग्रता और उसके बाद ज्ञान प्राप्त
करना है।

2-मन और शरीर का सम्बन्ध-

मन और शरीर के सम्बन्ध को देखें तो, हमारा मन एक सूक्ष्म
अवस्था में है। लेकिन वह इस शरीर पर कार्य करता है। और हमें यह
भी स्वीकार करना होगा कि शरीर भी मन पर कार्य करता है। यदि शरीर
अस्वस्थ होता है तो मन भी अस्वस्थ हो जाता है,और शरीर के स्वस्थ होने
पर मन भी स्वस्थ और तेजस्वी होता है। यदि किसी व्यक्ति को क्रोध आता है
तो उसका मन अस्थिर हो जाता है,और मन अस्थिर होने से उसका पूरा शरीर अस्थिर
हो जाता है। कुछ लोगों का मन शरीर के अधीन होता है। उनकी संयम शक्ति पशुओं से
विशेष अधिक नहीं होती है। इस प्रका के मन पर अधिकार पाने के लिए कुछ वाह्य दैहिक
साधनाओं की आवश्यकता होती है,जिसके द्वारा मन को वश में किया जाता है। जब बहुत
कुछ मन वश में हो जाय तब हम इच्छानुसार उससे काम ले सकते हैं।

3-भोजन के सम्बन्ध में सावधानी-

हमें भोजन इस प्रकार करना चाहिए,जिससे हमारा मन पवित्र रहे।
क्योंकि भोजन के साथ जीव का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। यदि हम किसी
आजायबघर में जाकर देखते हैं तो यह सम्बन्ध स्पष्ट दिखता है। हाथी को देखते
हैं,बडा भारी प्रॉणी है,लेकिन उसकी प्रकृति शॉत होती है। और यदि सिंह या बाघ के
पिंजडे की ओर जाते है तो देखोगे कि वे बडे चंचल हैं। इससे समझ में आ जायेगा कि
आहार का सम्बन्ध कितना भयानक परिवर्त कर देता है। हमारे शरीर में जितनी शक्तियॉ
कार्यरत हैं,वे आहार से पैदा हुई हैं,इसे हम प्रति दिन प्रत्यक्ष देखते हैं। यदि हम उपवास करना
आरम्भ करें तो हमारा शरीर दुबला हो जायेगा,दैहिक ह्रास होगा,और कुछ दिन बाद मानसिक शक्तियों
का भी ह्रास होने लगेगा। पहले स्मृति शक्ति जायेगी,फिर धीरे-धीरे सोचने की सामर्थ्य भी जाती रहेगी।
इसलिए साधना की पहली अवस्था में,भोजन के सम्बन्ध में विशेष ध्यान रखना होता है।

4- हमारा शरीर परिवर्तनशील अणुओं से बना है-

इस जगत असुर प्रकृति के लोगों की संख्या अधिक है,लेकिन ऐसा
भी नहीं है कि देवता प्रकृति के लोग नहीं हैं, यदि कोई कहे कि आओ
तुम लोगों को मैं ऐसी विद्या सिखाऊंगा,जिससे तुम्हैं इन्द्रिय सुखों में वृद्धि
हो जाय,तो अनगिनत लोग दौडे चले आयेंगे। लेकिन अगर कोई कहे कि आओ में
तुम्हैं परमात्मा का विषय सिखाऊंगा तो शायद ही उनकी बातों का कोई परवाह भा करेगा।
अर्थात ऊंचे तत्व की धारणॉ करने की शक्ति बहुत कम लोगों में दिखने को मिलती है, और
संसार में ऐसे भी महॉपुरुष भी हैं,जिनकी यह धारणॉ है कि चाहे शरीर हजार वर्ष रहे या लाख वर्ष,
अन्त में परिणॉम एक ही होगा।जिन शक्तियों के बल से देह कायम है,उनके चले जाने से देह नहीं रहेगी।
कोई भी व्यक्ति पल भर के लिए भी शरीर का परिवर्तन रोकने में समर्थ नहीं हो सकता है।क्योंकि यह शरीर कुछ
परिवर्तनशील परमाणुओं से बना है। नदी का उदाहर देखो,पल भर में वह चली गई,और उसकी जगह एक एक नईं
जल राशि आ गई। जो जल राशि आई वह सम्पूर्ण नहीं है,लेकिन देखने में पहले जलराशि की तरह ही है। हमारा यह
शरीर भी ठीक उसी तरह सदैव परिवर्तनशील है। परन्तु इस तरह परिवर्तनशील होने पर भी उसे उसे स्वस्थ और बलिष्ठ
रखना आवश्यक है। क्योंकि शरीर की सहायता से ही हमें ज्ञान की प्राप्ति करनी होती है । यही शरीर तो हमारे पास एक
सर्वोत्तम साधन है ।

5-अज्ञान और दुःख पर्यायवाची हैं-

अज्ञानता के कारण ही दुख आता है, ऎसा नहीं कि दुःख तो है लेकिन मैं ज्ञानी हूं।
मैं अज्ञानी हूं,इसलिए दुख है।मेरा अज्ञान ही मेरा दुःख है। जिस दिन मैं जान लूंगा,उस
दिन दुःख दूर भाग जायेगा।और ऎसा भी नहीं कि यह जानने के बाद ज्ञान की नौका बनाकर
दुःख के भवसागर को पार करूंगा। दुःख का तो कोई भवसागर ही नहीं है,बस मेरा अज्ञान ही मेरा
दुःख है,मेरी पीडाओं का जन्म दाता है,मेरे अज्ञानता के कारण ही मैं उलझ गया हूं, मैं अपने पैरों पर
कुल्हाडी मारने चला था। अपने अज्ञानता के कारण ही मैं अपने को जहर से भरकर अमृत से वंचित हो जाता
हूं,यह तो मेरी ही भूल है सिर्फ भूल ।

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