अनुभूति-5


1-प्रशन्नचित्त होकर जीवन यापन करें

        चित्त के प्रशन्न रहने से सब दुख नष्ट हो जाते हैं।
जिस व्यक्ति को प्रशन्नता प्राप्त हो जाती है,   उसकी  बुद्धि
तुरन्त स्थिर हो जाती है। यदि हम प्रशन्न रहते हैं तो सारी प्रकृति
ही हमारे साथ मुस्कराती प्रतीत होती है । प्रशन्नचित्त व्यक्ति तो कभी
अपने कर्म में असफल नहीं होता। जिसका चित्त प्रशन्न है वह व्यवहार में
उदारता बन जाता है। इस दुनियॉ में प्रशन्न रहने का एक ही उपाय है कि अपनी
आवश्यकताओं को कम करना सीखें ।

2-हमारा विवेक

        विवेक का आशय हमारी उस शक्ति से है
जिसके द्वारा हम कुछ सच  बातों को  भली-भॉति
जानते हैं ,और इतनी अच्छी तरह से  जानते हैं  कि
उन बातों के लिए हमें किसी से कुछ पूछने या समझने
अथवा कहीं पढने सुनने की जरूरत नहीं होती । विवेक तो
प्रभु-प्रदत्त -पथ प्रदर्शक है, यह तो एक गुरु है ।

3-कटु बॉणीं के घाव

       फरसी से कटा हुआ वन तो फिर से अंकुरित हो जाता है,
किन्तु कटु वचन रूपी शस्त्र से किया  हुआ भयंकर घाव कभी
भी भरता नहीं है ।एसलिए किसी के साथ बात चीत में क्रूरता पूर्ण
बात नहीं करनी चाहिए। किसी को नीचा देखना पडे वे शब्द नहीं बोलने
चाहिए वे शब्द जिससे दूसरे को उद्वेग हो पाप लोक में ले जाने बाले हो,
नहीं बोलना चाहिए।बचन रूपी बॉण जब मुंह से निकलते हैं तो उससे घायल
मनुष्य रात-दिन शोकमग्न रहता है ,इसलिए जो बचन सामने वाले को उद्वेग
पहुंचाते हों उन्हैं कदापि नहीं बोलना चाहिए ।

4-मनुष्य को सुख की चाह

           हर मनुष्य को सुख की चाह होती है,इसके लिए वह
चारों ओर दौडता-फिरता है-वह इन्द्रियों  के पीछे भागता रहता
है पागल की तरह जगत में कतार्य करता है।जो लोग अपने जीवन
के संग्राम में सफल हुये हैं,अगर उनसे पूछें तो,उन्हैं यह जगत सत्य
दिखता है,उन्हैं सभी बातें सत्य प्रतीत होती हैं,और वे ही लोग जब अधिक
उम्र के होते हैं और सौभाग्य लक्ष्मी बार-बार उन्हैं धोखा देती है तो,कहते हैं कि
यह किस्मत का खेल है।अर्थात जीवन के अलग-अलग उम्र में अलग-अलग अनुभूतियॉ
होती है,प्रतिक्रिया होती है। हर वस्तु क्षण भर के लिए हैं लेकिन स्थाई लगती हैं। जिससे
विलास,वैभव,शक्ति,दरिद्रता और यहॉ तक कि यह जीवन भी उसे स्थाई लगता है,जबकि
ये क्षणिक होते हैं।

5-हमारा जीवन हमारा शिक्षक है

         हमें इस बात की ओर ध्यान देना होगा कि हमें जन्म
और मृत्यु दोनों प्रशन्नतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए।ईश्वर
के प्रेम में आनन्दित रहना चाहिए।इस शरीर के बन्धन से मुक्ति
का लक्ष्य होना चाहिए।सच तो यह है कि हमें अपने इस शरीर से इतना
प्रेम होता है कि,उसे हम चिरन्तन करना चाहते हैं,सदा के लिए इस शरीर के
साथ चलना चाहते हैं।इससे मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।हमें तो देह
के प्रति आशक्त नहीं होना है,भविष्य में दूसरा शरीर धारण करने की आशा नहीं रखनी है।
न शरीर की इच्छा करो और न उन लोगों के शरीर से प्रेम करो जो हमें प्रिय है। यह जीवन तो
हमारा शिक्षक है,इसकी मृत्यु से नये शरीर धारण करने का अवसर मिलता है।आत्मघात करोगे तो
शिक्षक ही मर जायेगा।और उसका स्थान दूसरा शरीर धारण कर लेगा।इस प्रकार जबतक हमने इस शरीर-
बुद्धि से मुक्त होना नहीं सीखा,तबतक हमें इस शरीर को रखना ही होगा,वरना एक शरीर के खोने पर दूसरा
शरीर प्राप्त होता रहेगा। लक्ष्य हेतु इस शरीर को एक साधन के रूप में देखना चाहिए,जिसके प्राप्त होने पर इसका
पूर्ण उपयोग किया जा सके।

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