अन्धकार और दुख हमारे भाव है- प्रकाश में जीना सीखें-1


      अंधकार एक नकारात्मक भाव है,
जब प्रकाश के अभाव की अनुभूति होती है
तो यह प्रकाश कई बार परिस्थितियों के कारण
भी लुप्त हो जाता है, किन्तु इस प्रकार की स्थिति
में परमात्मा ने मनुष्य को इस प्रकार की क्षमता दे रखी
है कि वह उनका उपयोग कर प्रकाश के अभाव को दूर कर
सकता है। लेकिन अंधकार को देख कर ही जब मनुष्य भयभीत
हो जाता है, परेशान और दुखी हो जाता है, तो उसके लिए अंधकार
से मुक्त होने का कोई उपाय नहीं है।
            इसी प्रकार दुःख भी अंधकार के
समान नकारात्मक भाव है।     उसका भी कोई
अस्तित्व नहीं है। व्यक्ति अपनी भ्रान्तियों, गलतियों
और त्रुटियों की तंग कोठरी में बन्द होकर चारों ओर विखरे
खिले हुए सुख तथा आनंद से वंचित रहे, तो इसमें परमात्मा
का कोई दोष नहीं है।
                      परमात्मां ने तो सृष्टि में चारों
ओर सुख, आनंद तथा प्रफुल्लता का प्रकाश बिखेर
रखा है। मनुष्य की अपनी भ्रान्तियों और त्रुटियों की जो
दीवार है, अपनी समझ और दर्शन के दरवाजे व खिड़कियों
को बंदकर स्वयं ही अंधकार पैदा किया है। प्रायः जो दुःखी, संतप्त,
व्यथित और वेदनाकुल दिखाई देते हैं, उनकी पीड़ा के लिए बाहरी कारण
नहीं, अपनी संकीर्णता की दीवारें उनके लिए उत्तरदायी हैं।
                     परिस्थितिवश कोई समस्या या कठिनाई
उत्पन्न हो जाय, तो उसके लिए शोध करने की आवश्यक
नहीं है। परमात्मा ने अंधकार को दूर भगाने के लिए मनुष्य
को उन समस्याओं तथा कठिनाइयों को सुलझाने की क्षमता दे
रखी है। वह उस क्षमता का उपयोग कर अपने लिए सुख तथा
आनन्द का मार्ग खोज सकता है तथा दुःख रुपी अंधकार को दूर
हटा सकता है।
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