अपनी कमियॉ सुधारें-6


1-अपनी दुर्वलता का दर्शन करें

     हम मोहनिद्रा में पडे होते हैं और
अपने सुधार की ओर कोई ध्यान ही
नहीं देते, इसलिए कि हमें अपनी त्रुटियों
और कमजोरियों का ज्ञान ही नहीं होता है
हम गलत राह पर हैं इसका हमें आभास ही नहीं
होता,जैसे अंधकार में बढते चले जा रहे हों,और अंत
में जब किसी शिला से टकराते हैं तो तब अपनी गलती
का अहसास होता है,तब ज्ञान के चक्षु एकाएक खुल जाते हैं,
यहीं से उन्नत्ति का प्रभात प्रारम्भ हो जाता है । जो अपनी दुर्वलता
का दर्शन करता है,और उसके लिए सच्चा पश्चाताप कर उसे दूर करने
की इच्छा से सतत् प्रयास प्रारम्भ करता है समझो उसका आधा काम हो
गया। अर्थात पहले दुर्वलता के दर्शन, फिर आत्मग्लानि और फिर दुर्वलता
को हटाने की साधना, यही हमारी उन्नत्ति के तत्व हैं ।अगर मन गलत राह
से हटकर सन्मार्ग पर आरूढ हो जाता है आध्यात्मिक सिद्धियॉ मिलनी प्रारम्भ
हो जाती हैं ।हमारे वेदों में मन को कल्याणकारी मार्ग पर ले जाने के लिए प्रार्थनायें
की गईं हैं ।।

2–ध्यान देने योग्य वातें

     अगर दो आदमी बात करते हैं तो उनके बीच में
न बोलें,अपनी दुद्धिमानी दिखाने का प्रयत्न न करें
,ऐसी बात तो बोलो ही मत जिससे उन लोगों की बात
कटे या उन्हैं नीचा देखना पडे,अपनी और अपने वंश की
बढाई न करें,यदि दूसरा कोई करता है तो उसे बुरा न कहें,
चिल्लाकर न बोलें,ऐसी आवाज और ऐेसे भाव से न बोलें,जिससे
सुनने वालों को तुम्हारी हुकूमत या अपना तिरस्कार प्रतीत हैं।

3-मन को विकृत करने वाले आहार

            वे आहार जो मन को विकृत करते हैं इन्हैं
राजसी आहार भी कहते हैं ।कडवा,खट्टा,नमकीन,बहुत
गर्म,तीखा,रूखा,जलन पैदा करने वाला, ऐसे आहार जो
रोग एवं शोक उत्पन्न करने वाले होते हैं,राजसी लोगों को
प्रिय होते हैं।इन आहारों का प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे मन तथा इन्द्रियों
पर पडता है।मन में कुकल्पनायें,वासना की उत्तेजना,और इन्द्रियलोलुपता
उत्पन्न होती है।मनुष्य कामी,क्रोधी,लालची,और पापी बन जाता है,उसके रोग,
शोक,दुःख में अभिवृद्धि होती है।बुद्धि मलिन होती है । इन वस्तुओं में करेला,इमली,
बहुत नमकीन,सोडा,गरम-गरम चीजें,राई,गर्म मशाला,लाल मिर्च,तेल से तले हुये गरिषठ
पदार्थ,बाजार की मिठाइयॉ,पूडी-कचौडी,अधिक मिर्च व मशाले चाय,पान,चूना,तम्बाकू,प्याज
लहसुन आदि चीजों का सेवन करने से दुःख,चिन्ता और रोग पैदा करती हैं।इनसे इन्द्रियॉ कामुक
हो जाती हैं,इनका प्रयोग करने वाले लोग विलीसी,क्रोधी,विक्षुव्ध,तथा उत्तेजनाओं में फंसे होते हैं।
इनके मुंह से गुर्गंध आती है ।वैसे दालों में मसूर की दाल।चटनी,अचार सोंठ भी विकृत करने वाले
पदार्थ हैं ।।

4-तामसी आहार का प्रयोग से बचें

           तामसी आहारों में मॉस आता है।कई प्रकार
के जीवों का मॉस मछली अंण्डों का प्रयोग मात्र स्वाद
मात्र के लिए बढ रहा है ।भॉति-भॉति की शक्तिवर्धक
दवाइयॉ,मछलियों का तेल,आदि ।शराव,कॉफी,कोको,गॉजा,
चरस,अफीम,सिगरेट,बीडी,आदि पदार्थ तामसी हैं ।तामसीआहार
से मनुष्य प्रत्यक्ष राक्षस बन जाता है ।ऐसे लोग हमेशा दुःखी,बुद्धिहीन,
क्रोधी,आलसी,दरिद्री,अधर्मी,पापी और अल्पायु बन जाते हैं। इन चीजों
का प्रयोग करने से बचना चाहिए ।।

5-भोजन में महान ईश्वरीय शक्ति का प्रवेश होता है

           हम जिस भोजन को ग्रहण करते हैं उससे हमारे
शरीर में ईश्वरी शक्ति पहुंचती है।उत्तम से उत्तम भोजन
भी दूषित मनःस्थिति से विकार और विषमय हो सकता है ।क्रोध,
उद्वेग,चिडचिडापन,आवेश आदि की मनःस्थिति में किया भोजन विशैला
हो जाता है ।जिस व्यक्ति के द्वारा भोजन पकाया या परोसा जाता है उसकी
मनोदशा उस भोजन के साथ हमारे शरीर में प्रवेश कर जाती हैं ।भोजन करते
समय अगर क्रोध की दशा में हैं तो भोजन ठीक ढंग से चबाया नहीं जाता,और
न पाचन सही ढंग से होता है ।चिन्तन मनःस्थिति मे भोजन नसों में घाव उत्पन्न
कर देता है,हमारी कोमल पाचन नलिकायें शिथिल हो जाती हैं ।इसलिए भोजन बनाने
वाले तथा भोजन करने वाले की मनोदशा स्वस्थ होनी चाहिए।प्रशन्नचित्त मुद्रा एवं शॉत
मनोदशा में खाया हुआ भोजन शरीर और मन के स्वास्थ्य पर जादू जैसा गुंणकारी प्रभाव
डालता है । अन्तःकरण की शॉत सुखद वृत्ति में किये गये भोजन के साथ-साथ हम प्रशन्नता,
सुख,शॉति,और उत्साह की स्वस्थ भावनायें भी खाते हैं जिससे हमारा शरीर भी वैसा ही बन जाता
है।आनंद और प्रफुल्लता तो ईश्वरीय गुंण है,क्लेश,चिंता,उद्वेग,आसुरी प्रवृत्तियॉ हैं।आपने देखा होगा
हंसता-खेलता हुआ बच्चा दूध और मामूली अन्न से सुडौल और निर्विकीर बनता जाता है । इसीलिए घर
में मॉ के हाथों पकाया और परोसा गया भोजन अधिक पौष्टिक होता है क्योंकि मॉ मन से प्रशन्नचित् भवना
से भोजन वनाती और परोसती है।ध्यान रखें भोजन करते समय घर का माहौल प्रशन्नचित्त बनाने का प्रयास करें ।।

6-विपत्ति आने पर घबराओ नहीं

यदि आपके सामने विपत्ति आती है तो तुम उसके
सहन करने की शक्ति रखते हो,घबराओ नहीं ।अपना बल
लगाकर उसे निकाल दो और यदि तुम्हारी ताकत उसे नाश नहीं
कर सकती तब भी रो नहीं।जरूर एक बार विपत्ति तुम्हैं परेशान
करना चाहेगी,परन्तु फिर स्वतः ही नष्ट हो जायेगी ।।

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