अपने जीवन के नैतिक मूल्य


 

            सदियों से भारत
की संस्कृति नैतिक मूल्यों
व गुणों से परिपूर्ण है। हमारी
संस्कृति नैतिक आचार-विचार
व व्यवहार का पालन करने के
लिए सदैव प्रेरित करती है, परंतु
अफसोस की बात है कि आज
समाज और जीवन के हर
एक क्षेत्र में नैतिक
मूल्यों का ह्वास तेजी
से हो रहा है। कई लोग
यह भी प्रश्न करते हैं कि
आखिर नैतिकता का अभिप्राय
क्या है? लाहिड़ी गुरुजी ने अपने
लेख में लिखा है कि नैतिकता का
आशय है- नीति के अनुसार। यानी
हमारे विचार, कर्म और व्यवहार
सद्गुणों से प्रेरित हों और वे धर्म,
संस्कृति व राष्ट्र के लिए हि-
तकारी हों। आध्यात्मिक
तत्वों व शक्तियों का
संवर्धन करने वाले
ऐसे विचारों, व्यवहारों
व गुणों को नैतिकता कहते
हैं। अत्यंत विकट परिस्थितियों
में भी आध्यात्मिक गुणों का पालन
करते हुए अपने कर्म विशेष के प्रति
जो सदाचरण कायम रख सके, वही
नैतिक है। ऐसा तभी संभव है, जब
मनुष्य अपने भीतर के अहंकार,
स्वार्थ व स्वनिर्मित आत्मघाती
भय से परे उठने की साधना
करे। धर्म, राष्ट्र व संस्कृति
को अपने जीवन की धुरी
बनाए। नैतिक मूल्य हमें
उचित-अनुचित आचार व्यवहार
का ज्ञान कराते हैं। हमारी संस्कृति
महान है। हमारे इतिहास में ऐसे अनेक
ऋषि-मुनियों, महापुरुषों व श्रेष्ठ साधकों
के उदाहरण मिलते हैं, जिन्होंने अपना
संपूर्ण जीवन नैतिक मूल्यों के रक्षार्थ
समर्पित कर दिया और संपूर्ण समाज
को जीवन के प्रति एक नई दिशा
दी।

             मर्यादा पुरुषोत्तम
भगवान श्रीराम नैतिकतामय
जीवन के आदर्श प्रतीक हैं। उन्हीं
के पदचिह्नों पर चलते हुए भक्तिपूर्ण
भाव से अपने आचरण को नैतिक
रखते हुए हनुमानजी ने अमरत्व
प्राप्त कर लिया। नैतिकतापूर्ण
व्यवहार की अभिव्यक्ति हमें
महर्षि वशिष्ठ, महर्षि दधीचि,
स्वामी विवेकानंद, सरदार वल्लभ
भाई पटेल और डॉ. बाबा साहेब अंबे-
डकर जैसे महानतम राष्ट्र साधकों के
जीवन में दिखती है। नैतिकता के बगैर
जीवन में आत्मोन्नति संभव नहीं।
नैतिकतापूर्ण जीवन जीकर,
दूसरों के समक्ष आदर्श
प्रस्तुत करके ही इस
जीवन में सफलता के
सही मार्ग का चयन कर
सकते हैं। वैसे भी दुनिया में
शायद ही कोई ऐसा शख्स हो,
जो विफलता चाहता हो। नैतिकता
से मनुष्य के साथ-साथ समाज और
राष्ट्र का भी उत्थान होता है। जो
समाज नैतिकता से विमुख हो
जाता है, उसकी अवनति
तय है। इसलिए सभी
लोगों को नैतिकता के
मार्ग पर चलना चाहिए।

 

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