आत्मा को विवेक से देखें-9


1-मेघ का पानी सबसे शुद्ध होता है

      वर्षा का जल सबसे अधिक शुद्ध और पवित्र
माना जाता है,क्योंकि इस जल का निर्माण सूर्य के
द्वारा होता है,सूर्य की ऊष्मा से उसके समस्त कीटाणु
नष्ट हो जाते हैं ।

2-अन्न से शरीर का पोषण होता है

      अन्न (शाकाहारी) भोजन शरीर का पोषण
करता हैऔर हमारे शरीर के सभी विकारों को नष्ट
करता है ।जबकि मॉसाहारी भोजन करने में विकार
उत्पन्न होते हैं ।

3-बुद्धिमान कुछ बातों पर चर्चा नहीं करते

           कहते हैं कि जो लोग बुद्धिमान होते हैं वे अपने
आर्थिक नुकसान,मन के दुख,घरेलू समस्याओं,ठगना,और
अपमान,इन बातों के यथा सम्भव गुप्त ही रखना चाहते हैं ।
इसका कारण यह है कि यदि वह इन बातों पर चर्चा करेंगे तो,
जबाव में वे नतो आपके प्रति लहानुभूति रखेंगे,और न ही आपकी
सहायता करेंगे,बल्कि आपका उपहास करेंगे ।वे इन बातों को समाज
में सार्वजनिक भी कर सकता हैजिससे पूरा समाज आपको अयोग्य समझने
लगेगा।और कुछ धूर्त मक्कार लोग तो आपको मूर्ख समझकर आपको ठगने की
भ चेष्ठा करेंगे ।इसलिए इन बातों के सम्बन्ध में किसी से चर्चा न करें क्योंकि
आपकी इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकेगा।

4–अग्नि,गुरु,गाय,वृद्धा,शिशु और कुमारी को पैर से न छुएं

         हमारे वेदों में भी इन आदर्शों का उल्लेख है
कि इन्हैं पैर से नहीं छूने चाहिए ।अग्नि को पैर से छूने
से पैर जल सकता है,वस्त्रोंमें आग लग सकती है।गुरु(शिक्षक)
और ब्राह्मण को को भी पैर से नहीं छूना चाहिए-एक तो वे आदरणीय
होते हैं,और दूसरे वे रुष्ठ हो जायेंगे जिससे आप सही ढंग से ज्ञान प्राप्त
नहीं कर सकेंगे ।गाय को भी पैर से नहीं मारना चाहिए क्योंकि गौ माता, फिर
क्रोधित होकर सींग मार सकती है ।कुमारी ,वृद्धा और छोटे बच्चों को भी पैर से नहीं
मारने चाहिए क्योंकि वे कोमल,नाजुक होते हैं इनको हानि पहुंच गई तो उपचार आपको
ही करना पडेगा ।।

5-आत्मा को विवेक से देखें

         बुद्धिमान मनुष्य को विवेक के द्वारा आत्मा
और परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिए ।इस प्रकृति में
प्रत्येक पदार्थ में कुछ अन्य पदार्थ इस प्रकार से विद्यमान होते
हैं कि-वह अलग से दिखाई नहीं देते हैं लेकिन फिर भी उनका अदृश्य
अस्तित्व तो होता ही है,जैसे फूलों में सुगन्ध होती है लेकिन अलग से नहीं
दिखाई पडती है,बल्कि उसको केवल महसूस किया जा सकता है,तिलों में तेल
होता है मगर प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देता है,लकडी में अग्नि जलने की सहायता देने
वाले तत्व होते हैं ,दूध में घी होता है,गन्ने के रस से गुड बनता है ।ठीक उसी प्रकार
से शरीर मेंआत्मा विद्यमान होती है,और यह आत्मा परमपिता परमात्मा का ही अंश है ।
इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं के अन्दर परमात्मा के उपस्थित मानें और
उनके प्रतिनिधि के रूप मं कार्य करें-ऐसा विचार धारण कर लेने से वह गलत कर्मों से दूर रह
सकेगा ।।

6-संसार-वन्धन से मुक्ति के विचार

         वैसे तो सामान्यतः मनुष्य सदैव मोह माया,लोभ,
क्रोध,हानि,लाभ आदि में ही उलझा रहता है,इसीलिए तो वह
आत्मिक शॉन्ति प्राप्त नहीं कर पाता है ।लेकिन वही मनुष्य जब
किसी धार्मिक स्थान पर जाता है तो उसका मन परमपिता परमात्मा के
चरणों में लगने लगता है या वह किसी मनुष्य की अन्त्येष्टि में सम्मिलित
होने के लिए श्मशान –भूमि में जाता है तो उसे जीवन की क्षणभंगुरता का अहसास
होता है,अथवा किसी रोग से ग्रस्त व्यक्ति विस्तर पर पडे हुये शरीर को देखकर अपने
पाप-पुण्य के विषय में सोचता है और मन ही मन ईश्वर को साक्षी मानकर भविष्य में
गलत कार्य न करने का प्रण करता है ।लेकिन यदि मनुष्य इन तीनों विचारों को सामान्य
स्वस्थ अवस्था में भी अपने मन में स्थिर रखें तो वह आसानी से संसार –बन्धन से मुक्त
हो जायेगा और उसे सच्ची आत्मिक शॉति प्राप्त हो जायेगी ।।

7-परिश्रम से धन कमाएं तो सम्मान मिलेगा

           इस संसार में अगर आपके पास प्रयाप्त धन है तो
सम्मान मिलेगा,जिस मनुष्य के पास बिल्कुल भी धन नहीं है,
उसे बार-बार अपमानित होना पडता है,उसके रिस्तेदार भी उसे कोई
महत्व नहीं देते हैं ।इसलिए प्रत्येक मनुष्य को परिश्रमी बनना चाहिए
और इतना धन तो अवष्य ही कमाना चाहिए जिससे वह अपनी दैनिक
आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके । अपने जीविकोपार्जन के लिए दूसरे पर
निर्भर न रहें धनवान मनुष्य में समाज को सारे गुंण दिखाई देते हैं ।धनहीन
होने पर अपना भाई-बन्धु ,मित्र,नौकर आदि छोडकर चले जाते हैं । लेकिन
यदि वह धन प्राप्त कर लेता है तो जाने वाले पुनः लौटकर वापस आ जाते हैं।
जो मनुष्य इतना भी परिश्रम न कर सके,उसे तो साधु बनकर जंगलों में चले जाना
चाहिए ।

8-गुणवान वही है जिसकी प्रशंसा समाज करे

        सच्चा गुणी वह है जिसकी प्रशंसा समाज के लोग
करते हों,लेकिन समाज प्रशंसा क्यों करेगा ? लोग प्रशंसा
तब करेंगे जब आपके गुणों से समाज को लाभ प्राप्त होगा।
इसलिए अपने गुणों को केवल अपने तक ही सीमित नहीं रखना
चाहिए, बल्कि-उसके द्वारा समाज को भी लाभ पहुंचाना चाहिए।किसी
मनुष्य में कोई गुंण नहीं है लेकिन लोग उसपर विश्वास करते हों तो उसके
मन में भी गुंणी होने की चाह जाग जायेगी,फिर ऐसा मनुष्य अपने गुणों का
विकास करके गुणवान बनने का प्रयास करेगा ।

9-नयें गुंण से गुणों की सुन्दरता बढ जाती है

         वैसे रत्न स्वयं में बहुत अधिक सुन्दर तथा
मूल्यवान होते हैं लेकिन जब उसे सोने के आभूषण से
जड दिया जाता है तो उसकी सुन्दरता में और भी अधिक
वृद्धि हो जाती है ।ठीक इसी प्रकार जब किसी विवेकी मनुष्य
(धर्म-अधर्म,सत्य-असत्य,कर्तव्य-अकर्तव्य आदि को समझने
वाले मनुष्य ) में कोई नयॉ गुंण उत्पन्न होता है तो उसमें पूर्व
विकसित गुंण भी अधिक सार्थक हो जाते हैं ।इसका कारण विवेकी
मनुष्य अपने गुणों का सही प्रयोग करने में सक्षम होते है और वे
उनके द्वारा समाज को लाभ पहुंचाने का प्रयास करते हैं ।

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