आत्म चेतना जाग्रत से जीवन का उद्धार होता है


 

          ‘गीता’ में भगवान
श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट कर
दिया है कि मानव आदि से अब
तक पुन:-पुन: जन्म ले रहा है।
उसे अपनी अवस्था का आभास होता
है। इसलिए वह मुक्ति का अभिलाषी हो
जाता है। स्वयं को ऊपर उठाकर वह
संसार सागर से तरने का प्रयत्‍‌न करता
है।

         संसार सागर
से पार उतरने के लिए
व्यसन तो छोड़ने ही होंगे।
यजुर्वेद में भी लिखा है कि जो
अमंगल है, जो अशिव है, उन्हें छोड़
देना चाहिए। कहने का आशय यह है
कि र्दुव्यवसनों को छोड़े बगैर शिव की
यानी कल्याण की प्राप्ति नहीं हो सकती।
शिव की प्राप्ति अशिव के त्यागने के बगैर
नहीं मिल सकती। अशिव यानी जो बात क-
ल्याणकारी न हो। अशिव को त्यागकर यानी
दुगुर्णे को त्यागकर जब हम संसार रूपी सागर
को पार करने का प्रयास करते हैं, साथ ही इंद्रियों
को वश में करने का दुष्कर प्रयास भी करते हैं तो
इस स्थिति में मानव स्वयं का मित्र बन जाता है।

 

         मानव देह जो
दुर्लभ है उसे पाकर वह
स्वयं का उद्धार कर सकता
है। स्वयं को गिराकर वह किसी
भी तरह अपना भला नहीं कर सकता।
कुपथ पर जाकर वह स्वयं का शत्रु बन
जाता है। स्वयं के उद्धार के लिए इंद्रियों को
अपने अधीन रखने की नितांत आवश्यकता
है। परिजन, समाज और राष्ट्र के प्रति हमारे क-
र्तव्य हैं तो हमारे कर्तव्य स्वयं के प्रति भी हैं। कु-
विचारों को हटाने का दृढ़ता से प्रयास करें, तभी आपका
व्यक्तित्व सशक्त बन सकता है।

 

       ईश्वर की भक्ति
से विघ्नों का नाश होता
है। मनु महाराज ने सच ही
कहा है कि तप से पापों का नाश
होता है, पाप छूटने से प्रभु से प्रीति
होती है और आत्म कल्याण भी। अंतर्मन
की आवाज को अनसुना कर कुमार्ग पर च-
लकर हम समाज व राष्ट्र का अहित तो करते
ही हैं और स्वयं का भी अहित करते हैं। इसलिए
हमें आत्म-उद्धार करना होगा। आत्म-उद्धार में उन
सभी सकारात्मक गुणों या बातों का समावेश है, जिनसे
आपका व्यक्तित्व व मनोबल सशक्त होता है। आत्म-वि-
श्वास व आत्म-सम्मान के साथ जीते हुए उस अदृश्य शक्ति
पर अटूट विश्वास रखें जो इस ब्रह्मंड का संचालन कर रही है।
तभी आप आत्म-उद्धार कर सकेंगे। आत्म-उद्धार के माध्यम
से ही हम दूसरों के जीवन में भी खुशियां ला सकते हैं।

 

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