आध्यात्मिक प्रश्नोत्तर-45


1-विज्ञान कहता है जड से ही चेतना प्रकट होती है
और आध्यात्म कहता है कि चेतना से जड प्रकट होता है।
इसमें आपका क्या तर्क है? –

उ.-आध्यात्म का कहना है कि जड उस चे्तना की शक्ति का
घनीभूत रूप है, जो उससे भिन्न नहीं है।जड के भीतर चेतना
तो एक सुप्ताववस्था में रहती है जो उचित वातावरण पाकर प्रकट
होती है।वह नयॉ निर्मित नही होता। जैसे अगर देखें तो लकडी में अग्नि
है,धातुओं में जो अग्गि है वह घर्षण से प्रकट होती है।यह अग्नि नईं नहीं है।वायु
की अग्नि दवाव से प्रकट होती है।जल में अग्नि है । इसी प्रकार जब चेतना उचित वातावरण
पाकर प्रकट हो जाती है,अन्यथा वह सुप्त अवस्था में पडी रहती है। विज्ञान तो बुद्धि की उपज है,
और बुद्धि से चेतना को नहीं जाना जा सकता है।चेतना तो बुद्धि के पार की चीज है,इसकी तो केवल
अनुभूति ही हो सकती है। विज्ञान की खोज तो भौतिक जगत के लिए सही है,जो भी खोज उसने की है
वह सही है,लेकिन चेतना किस प्रकार कार्य करती है इसे वह नहीं जान पाया ।

2-विज्ञान चेतना को न जानने का कारण क्या है?-

    इसलिए कि विज्ञान पदार्थ का विज्ञान है,जबकि आध्यात्म
चेतना का विज्ञान है। और दोनों के अलग-अलग क्षेत्र हैं। विज्ञान
में तो केवल भौतिक तत्वों की खोज की जाती हैऔर आध्यात्म में चेतनाशक्ति
की खोज की जाती है। इसलिए भौतिक दृष्टि से विज्ञान तथा चेतना जगत की दृष्टि
से आध्यात्म को ही प्रमॉण माना जाना चाहिए।

3-हमारे वेदान्त में प्रकृति को माया क्यों कहा गया है?-

    वेदान्त के अनुसार प्रकृति कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है बल्कि
ब्रह्म की शक्ति है,जो उसी से प्रकट होकर उसी में विलीन हो
जाती है । इसलिए यह सत्य नहीं है। भ्रम से ही यह सत्य जैसा
लगता है। इसीलिए इसे माया कहा गया है। सॉख्य में इसी को प्रकृति
कहा गया है। उसी प्रकार जैसे अंधेरे में रस्सी में सर्प का भ्रम हो जाता है,
या आकाश में नहोते हुये भी इन्द्रधनुष दिखाई देता है उसी प्रकार सत्य ज्ञान
के अभाव में ही यह प्रकृति सत्य ज्ञात होती है।

4- जो प्रत्यक्ष है उसे असत्य,भ्रम या मिथ्या कैसे माना जाय?-

   प्रत्यक्ष तो इन्द्रधनुष भी दिखाई देता है,स्वप्न के दृष्य भी स्वप्नावस्था
में सत्य लगते हैं,लेकिन सत्य का ज्ञान होने पर ही ज्ञात होता है कि वह
सत्य नहीं था। शाश्वत नहीं है। इस, भ्रम के निदान के लिए सत्य ज्ञान और
प्रत्यक्ष अनुभूति आवश्यक है। और यह अनुभूति समाधि अवस्था में जब आत्म चैतन्य
की अनुभूति हो जाती है तो तभी यह मिथ्या ज्ञात हो सकता है। जिस प्रकार दीपक लेकर
देखने से रस्सी में सर्प का भ्रम दूर हो जाता है।

5-चेतनाशक्ति को कैसे जाना जसकता है?-

चूंकि प्रकृति जड होने से कोई भी क्रिया नहीं कर सकती है।
वह तो इस चेतना के संयोग से ही क्रिया करती है। वनस्पति,जीव-जन्तु
पशु-पक्षी व मनुष्य में जो क्रिया होती है वह इसी चेतनाशक्ति के कारण से होती
है। यह आत्मज्ञान अज्ञान के आवरण के कारण नहीं हो पाता है ।गीता में कहा गया
है कि मै माया से आवृत्त होने के कारण सभी के सामने प्रत्यक्ष नहीं होता हूं। और माया
के इस आवरण को हटाने के लिए निरन्तर ईश्वर चिंतन करना चाहिए ।

6-गीता में तो कहा गया है कि -चार वर्ण वाली सृष्टि
मेरे द्वारा रची गई है,किन्तु मैं कर्ता नहीं हूं। इसका क्या अर्थ है?-

     ईश्वर स्वयं कोई कर्म नहीं करता है,वह तो कर्मों का करण मात्र है।
सभी कर्म प्रकृति के गुणों के अनुसार ही होते हैं,किन्तु यह प्रकृति उस
चेतनाशक्ति से कार्य करती है । जिस प्रकार शरीर जड तत्वों से निर्मित है
लेकिन उस आत्म चेतना से वह कार्य करता है। आत्मा स्वयं क्रिया नहीं करती
है किन्तु उसके विना भी क्रिया नहीं हो सकती है। जैसे सूर्य के कारण इस पृथ्वी
पर सभी क्रियाएं संचालित होती है। जबकि सूर्य इन कार्यों को नहीं करता है। बल्कि
सूर्य के प्रकाश और ताप से सब कार्य स्वयं हो जाते हैं। इसी प्रकार ईश्वर की चेतनाशक्ति भी है।

7-वेदान्त बार-बार अज्ञान की बात कही गई है यह अज्ञान क्या है?-

      यह संसार अनित्य,परिवर्तनशील है,किन्तु अज्ञानतावश लोग
इसे नित्य व स्थिर समझ बैठते हैं। बस यही अज्ञान है। यह अज्ञान
सृष्टि का कारण है ।क्योंकि इस सृष्टि का मूल तत्व ब्रह्म है, जिसकी
चेतना शक्ति ही ज्ञान स्वरूप है । लेकिन अकेला ज्ञान सृष्टि की रचना नहीं
कर सकता ।सृष्टि की रचना तो प्रकृति से होती है, जो कि जड है ,जिसमें कि
ज्ञान का अभाव है ।इसलिए यह सम्पूर्ण दृष्य जगत प्रकृति निर्मित है,जिससे इस,
अज्ञान कहा गया है। जो कति इस सृष्टि को ही सत्य मानता है,उसी को अज्ञानी कहा
गया है। इस अज्ञानता को उसी प्रकार दूर किया जा सकता है जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश
से अन्धकार दूर हो जाता है,झान के प्रकाश से ही अज्ञान अपने आप दूर हो जाता है ।

8- क्या ज्ञान होने पर यह सृष्टि नहीं रहती?-

सृष्टि तो रहती है मगर ज्ञानी को इसकी सत्यता का बोध हो जाता है
जिससे वह ब्रह्म को ही सत्य मानता है ।उसे सभी मिथ्या ज्ञात होते हैं।

9-एक छोटा सा सुक्रॉणु पूरे मानव शरीर का
किस प्रकार निर्मॉण करता है?-

    जिस प्रकार विभिन्न पौधों के बीज उसी प्रकार के पौधे व बृक्ष में तना,
पत्ते लता,शाखाएं,फल,फूल व बीज तैयार करते हैं उसी प्रकार यह मनुष्य
बीज शुक्रॉणु भी वैसी ही शरीर की रचना करता है।उस बीज के भीतर चेतनाशक्ति
प्रकृतिके गुणों के अनुसार उसी प्रकार के शरीर की रचना करती है। प्रकृति के तत्वों में
परिवर्तन करके इनमें परिवर्तन किया जा सकता है। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने प्रयोग करके
वनस्पति की नईं-नईं जातियों का विकास किया है। मनुष्यों में भी इस प्रकार के प्रयोग हुये हैं,इनहीं
से संसार में विभिन्न जातियों का निर्मॉण हुआ है,जिनके कि रंग-रूप -आकार तथा गुणों में भिन्नता पाई
जाती है।

10-इस पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म सर्व प्रथम किस प्रकार हुआ?-

     पदार्थ में निहित चेतनाशक्ति का निरन्तर विकास होता रहता है।और यह माना
जाता है कि सर्वप्रथम वनस्पति के रूप में प्रकट होती है,फिर धीरे-धीरे विकसित होकर
जीव-जन्तु ,कीच-पतंग ,पशु-पक्षी व अन्त में मनुष्य रूप में प्रकट होती है। इसका मतलब
हुआ हुआ कि मनुष्य का जन्म पशु योनि से हुआ है ।इसलिए कि चेतना शक्ति का प्रारम्भिक विकास
पहले मनुष्य रूप में प्रकट नहीं हो सकता है। इस चेतना शक्ति का मुख्य घटक मन है। जब मन शक्ति
अधिक विकसित हो जाती है तो मनुष्य का रूप धारण करता है।

11-यदि मनुष्य इस विकास प्रकृया की अन्तिम कडी है तो इसके बाद की अवस्था क्या होगी?-

       इसके बाद अति मानव(सुपर ह्यूमन) बन जायेगा जिससे उसकी कई सुप्त
आध्यात्मिक शक्तियृ और जागृत हो जायेंगी। सभी ईश्वरीयशक्तियों से सम्पन्न
होकर ईश्वर के तुल्य हो जायेंगे। यही उसकी अन्तिम स्थित होगी ।

12-ईश्वर कहता है कि मनुष्य को ईश्वर ने सीधा पैदा किया है?-
इस सृष्टि में मनुष्य की श्रेष्टता को लेकर ऐसा कहा जाता है कि वह ईश्वर
की सर्व श्रेष्ठ रचना है। और सभी कुछ ईश्वर की शक्ति से प्रकट होते हैं,लेकिन
ये सब विकास की प्रकृया से गुजरकर ही वर्तमान स्थिति में पहुंचे हैं।

13-विज्ञान यह भी कहता है कि मनुष्य किसी अन्य लोक से आया है?-

विज्ञान का तो यह अनुमान मात्र है । यदि प्रमॉण मिल
जाता है तो इसी धारणॉ को स्वीकार कर लेना चाहिए।

14-मृत्यु के समय क्या छूटता है और क्या साथ जाता है?-

       मृत्यु के समय तो यह भौतिक शरीर यहॉ छूट जाता हैअन्य सभी साथ जाते हैं।
जैसे मनुष्य का मन,बुद्धि,अहंकार,चित्त,संस्कार,कामना,वासना,इच्छाएं,आदतें,महत्वाकाक्षॉएं
तथाकर्मसाथ जाते हैं। ये तो सूक्ष्म शरीर में ही रहते हैं। जब तक मन रहता है तब तक ही सूश्र्म शरीर
रहता है। मृत्यु के समय यह सूक्ष्म शरीर विलीन हो जाता है लेकिन मरता नहीं है।

15-प्रेत योनि में कौन-कौन से लोग रहते हैं?-

      मृत्यु के समय जिनकी भोग वासनाएं षेष रहती है वे सभी प्रेत योनि में रहते हैं।
और जिनकी भोगों की वासनाएं शेष नहीं रहती हैं वे आगे केलोकों में निकल जाते हैं।
जैसे पितरलोक,स्वर्ग लोक आदि। स्वर्ग तो सद्कर्मों से ही प्राप्त होता है ।

16-मृत्यु के बाद मनुष्य कैसा अनुभव करता है?-

         वह अपने आपको हल्का अनुभव करता है।संसार के सभी झंझटों से स्वयं
को मुक्त अनुभव करता है। लेकिन सॉसारिक भोगों की वासना शेष रहने पर उन्हैं
वहॉ न मिलने पर उसे बडी बेचैनी होती है। जिससे उसकी आत्मा भटकती रहती है ।

17-क्या पर काया प्रवेश सम्भव है?-

      यह सम्भव है । कई उदाहरण हैं। शंकराचार्य ने तो राजा सुधन्वा
के मृत शरीर में प्रवेश करना एक मुख्य घटना है ।

18-/यदि ईश्वर या आत्मा स्वयं कर्म नहीं
करता तचो फिर कर्म कौन करता है?-

       अगर गीता को पढें तो अध्याय 14 व 18 में इसका उल्लेख किया गया है,
कि कर्म करने के पॉच कारण हैं ,जिनमें आत्मा स्वयं कर्म नहीं करता है । पहला
कारण शरीर है जो कर्म करता है । दूसरा कारण कर्मेंन्द्रियॉ हैं जिनकी सहायता से शरीर
कर्म करता है । तीसरा कारण जीवात्मा है,वही कर्ता है। चौथा प्रॉण वायु है जो क्रिया का करण है।
और पॉचवॉ देव है जो इन सबका अधिष्ठाता है ।ये ,सारे आत्मा के प्रकाश से कार्य करते हैं। स्वयं आत्मा
कोई कार्य नहीं करता है।

19- मनुष्य अच्छे या बुरे कर्म क्यों करता है?-

    प्रकृति के सत्व ,रज तथा तमोगुण ही उसे कर्म करने के लिए वाध्य
करते हैं। वह उनके अधीन रहकर ही कर्म करता है ।,वह स्वतंत्र नहीं है ।
अच्छे कर्मों से बुरे कर्मों को काटा नहीं जा सकता है। दोनों कर्मों का फल भोगना
होता हैअगर चोरी कर दी, तो दान करने से चोरी के अपराध से बचा नहीं जा सकता है।

20-क्या बुराई हटाने से अच्छाई लाई जा सकती है?-

    जब तक अच्छाई नहीं लाई जाएगी तबतक बुराई को हटाया नहीं जा सकता है।
दीपक जलाने से ही अन्धकार मिटेगा। उसे सीधा हटाया नहीं जा सकता है

21-ईश्वर का निवास स्थान कहॉ है?-

    सृष्टि के कण-कण में व्याप्त जो चेतन सत्ता है वही ईश्वर का निवास
स्थान है । उस ईश्वरीय विधान से बचने का कोई उपाय नहीं है ।कर्म फल
तो भोगना ही पडता है। शास्त्रों के अनुसार कर्म करते रहना ही ,इनसे मुक्ति का
एक मात्र उपाय है ।

22-मनुष्य के सत्व,रज व तम गुंण के क्या लक्षण हैं?-

       सत्व गुंणसे ज्ञान होता है।रजोगुण से क्रिया होती है।
तथा तमोगुँण से मूढता ,अज्ञान,जडता,आलस्य,प्रमाद होता है।

23-सदाचार और सद्कर्म क्या होते हैं?-

        अपने धर्म ग्रन्थों में जो विधि निषेध के नियम बताये
गये हैं उन्हीं के अनुसार आचरण और व्यवहार करना उत्तम है ।

24-जो धर्म तत्व की बात नहीं जानता औरशास्त्रों का भी
अध्ययन नहीं किया उसे किस प्रकार का जीवन जीना चाहिएः?

     अपने द्वारा किसी को कष्ट न देना,तथा सदा दूसरे के भले के लिए
ही कर्म करना।यही जीवन का सद्मार्ग है । और यही परम धर्म है।

25-केवल दूसरों को कष्ट न दें,क्या यह प्रयाप्त नहीं है?-

   इससे पाप से तो बच जायेंगे किन्तु पुण्य का लाभ नहीं मिल सकता।
दूसरों का भला करने की भावना से बुराई से अपने आप बच सकते हैं।
क्योंकि यदि कोई भूख या बीमारी आदि से तडफ रहा हो तो यह कह देना कि
हमने थोडे ही किया है।यह तो अपने कर्मों का फल भोग रहा है,ऐसा कहकर उसकी
सहायता न करना मानवीय दृष्टि नहीं है।क्योंकि कुछ सम्प्रदाय ऐसी ही गलत मान्यताएं
रखते हैं।

26-अहिंसा पालन का फल क्या होता है?-

      वह स्वार्थी हो जाता है ।उसे अपनी ही चिंता अधिक रहती है
कि मेरे से पाप कर्ण न हो लेकिन वह दूसरों का भला भी नहीं कर
सकता है ।

27-जो आत्मज्ञान की साधना नहीं कर सकता उसे किस
        प्रकार का जीवन जीना चाहिए?-
उसे तो सदाचार और सेवा धर्म को अपनाना चाहिए।

28-भारत में मोक्ष और मुक्ति प्राप्ति को
ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य माना जाता है ऐसा क्यों?-

        मोक्ष प्राप्ति तो इस जीव चेतना की अन्तिम
स्थिति है।जहॉ से आरम्भ हुआ है वहीं पहुंच जाना है।

29-क्या मुक्ति के लिए सनेयास आवश्यक है?-

यदि कोई गृहस्थ में रहकर भी कामना ,वासना,आसक्ति,मोह,ममता,आदि
का त्याग कर सकता है तो विधिवत् सन्यास की कोई आवश्यकता नहीं है।वह सन्यास
ही है। लेकिन ऐसा सन्यास सामान्यतः सम्भव नहीं है।काजल की कोठरी में रहने पर कालिख
से कोई बच नहीं सकता ।

30-सन्यास का क्या अर्थ है?-

       अपना घर छोडकर जंगल चले जाना और भगवा वस्त्र पहनना ही
सन्यास नहीं है,बल्कि सॉसारिक भोगों के प्रति आसक्ति का त्याग एवं
फल की इच्छा का त्याग ही सन्यास है।

31-गुरु और,गुरु की महिमॉ क्या है?-

    जो अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश देता है,
वही गुरु है। गुरु ही वास्तविकता का ज्ञान कराता है। और गुरु ही
शिष्य को ईश्वर तत्व प्रदान करता है इसलिए असे ईश्वर से भी ऊंचा
स्थान दिया गया है।

32-गुरु और शिक्षक में क्या अन्तर है?-

          शिक्षक मात्र ज्ञान दाता है,लेकिन गुरु तो शिष्य की पूर्ण
रूपान्तरण कर देता है। उसे नयॉ ही रूप दे देता है। वह तो मुक्ति दाता है।

33-गुरु कौन हो सकता है?-

जो स्वयं ब्रह्मज्ञानी है,वही सच्चा गुरु है।

34-ज्ञान किसका गुंण है?-

ज्ञान तो चेतनाशक्ति आत्मा का गुंण है।जड पदार्थों में ज्ञान नहीं होता ।

35-आत्मा तो सबमें है फिर अज्ञान किससे होता है?-

  अहंकार के कारण उस चेतन आत्मा के ज्ञान के अभाव
में प्रकृति को ही ज्ञान का स्वरूप मान लेना अज्ञान है।

36-आत्मा और शरीर तो सबके एक से हैं फिर
सभी के व्यक्तित्व भिन्न-भिन्न क्यों होते हैं?-

         यह त्रिगुणॉत्मक प्रकृति पूर्व जन्मों के संस्कार तथा वातावरण
मिलकर उसके व्यक्तित्व में भिन्नता पैदा करते हैं । इस त्रिगुणॉत्मक
प्रकृति से मनुष्य का स्वभाव बनता है ।

37-आध्यात्मा और धर्म में क्या अन्तर है?-

        आध्यात्मा इस चेतन शक्ति का विज्ञान है तथा धर्म उस चेतना
की अनुभूति का साधन है। और धर्म के विना चेतना का अनुभव नहीं
हो सकता है।

38-धर्म और सम्प्रदाय में क्या अन्तर है?-

        धर्म तो एक महॉसागर है तथा सम्प्रदाय उसमें छोटे-छोटे द्वीप हैं।
धर्म में विशालता है,सम्प्रदाय में संकीर्णता है। धर्म सार्वर्भौम है,सम्प्रदाय
क्षेत्रीय है ।

39-जो ईश्वर को नहीं मानता उसका क्या परिणॉम होता है?-
ईश्वर का भय उसे नैतिक बनाता है अन्यथा उसकी
नैतिकता दिखावा मात्र बनकर रह जाती है ।

40-क्या मनुष्य को सुख-दुख ईश्वर स्वयं देता है?-

        ईश्वर स्वयं किसी को सुख-दुख नहीं देता है। वह तो शक्ति का
श्रोत है। उस शक्ति के सदुपयोग से मनुष्य सुखी होता है तथा दुरुपयोग
करने से वह दुखी होता है।यह तो मनुष्य के हाथ में है।

41-क्या संसार में दुख ही दुख है?-

        संसार किसी को दुख-सुख नहीं देता। वह तो निरपेक्ष है।मनुष्य
की विकृत मानसिकता उसमें दुःख ही देखती है तथा स्वस्थ मानसिकता
वाला इसमें आनन्द देखता है। दोनों की दृष्टि एकॉगी है।

42-आनन्द की अनुभूति किसको होती है?-

जब जीव चेतना आनन्दमय कोश में प्रवेश करती
है तो उसे आनन्द की अनुभूति होती है ।

43-क्या आनन्द की अनुभूति ही ईश्वरानुभूति है?-

     नहीं,यह आनन्दमय कोष तो ईश्वर के समीप का कोश है
लेकिन यह शरीर का ही एक कोश है । ईश्वर के समीप होने
से ही यहॉ आनन्द का अनुभव होता है ।

44-कर्मकाण्ड का औचित्य क्या है?-

        कर्मों की गति स्वर्ग तक ही है। यह मुक्ति
का साधन नहीं है।मुक्ति का साधन तो अकर्म है ।

45-क्या मूर्ति पूजा उचित है?-

       यदि मूर्ति में ब्रह्म भावना रखकर पूजा की जाय तो उचित है,
अन्यथा वह पाषॉण पूजा ही है।मूर्ति तो माध्यम है,प्रतीक है ।वह
स्वयं ईश्वर नहीं है ।

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