आस्था के आयाम


 

                       जीवन के बारे में गहराई
से सोचने के लिए मनुष्य में आस्था-भाव
अवश्य होना चाहिए।विकेश कुमार बडोला जी
ने अपने लेोख में लिखा कि- मानव जीवन हमेशा
सामान्य रूप से नहीं चल सकता। कठिनाइयों के समय
धैर्य व साहस के साथ जीवन निर्वाह के बारे में सोचना
पड़ता है। भौतिक रूप से खाली होने पर मनुष्य किंकर्त-
व्यविमूढ़ हो जाता है। संघर्ष के ऐसे वक्त में उसे ईश्वर
का ध्यान तो आता है, पर वह अपने कल्याण के लिए
उसमें पूरी आस्था नहीं रख पाता। उसका ईश्वरीय संस्म-
रण मात्र डर व शंका के कारण ही होता है, जबकि उस
सर्वशक्तिमान के सान्निध्य-प्रसाद को उस पर गहन आ-
स्था रखने से ही प्राप्त किया जा सकता है।

                 आस्था का भाव-विचार
संशयग्रस्त नहीं होना चाहिए। आस्था
के लिए सोचने-विचारने का कार्यक्रम आ-
स्थावान रहकर ही संपन्न हो सकता है। धर्म-
कर्म व ईश-मर्म में रुचि भी तब ही बनी रह सकती
है। ईश्वरीय उपासना के दौरान गूढ़, रहस्यात्मक विचार
हमें निराकार शक्ति की ऊर्जा के निकट ले जाते हैं। इस
ऊर्जा प्रवाह से हममें सच्ची धार्मिक स्थिरता आती है। ईश्वर
से साक्षात्कार इसी प्रकार होता है। भगवान में आस्था की बात
को इसी उच्चकोटि के धर्मानुभव के आधार पर समझी जा सकती
है। आस्था कोई पौराणिक व पारंपरिक विधान या नियम नहीं है,
जिसका अनुसरण करके ही व्यक्ति आस्था में विश्वास करे। आस्था
एक विशुद्ध व्यक्तिगत मान्यता है।

                    धर्म को सम्मान देते हुए
ध्यान का विस्तार करना और धर्म-भक्ति
के सुर,       संगीत और संप्रवाह के माध्यम से
उसमें गहरे उतरना आस्था से ही संभव है। आस्था
कठिन जीवन परिस्थितियों में एक विश्वास-पुंज के
समान होती है। आस्थावान होकर हम जीवन को व्यर्थ
व विकार के रूप में देखना बंद कर देते हैं। इसके उपरांत
हममें भगवत चेतना का अंकुर फूट पड़ता है। आस्था एक
प्रकार का मानसिक व्यायाम है। इसमें ज्ञानेंद्रियां एक सकारा-
त्मक विचार-बिंदु पर स्थिर हो जाती हैं और तत्पश्चात हमारे
द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य व कामना में एक शुभभाव
आ जाता है। व्यक्ति में ऐसा परिवर्तन उसे नई दिशा प्रदान
करता है। आस्था के बलबूते जिंदगी फलती-फूलती है। सच्ची
आस्था से ईश्वर का साक्षात्कार या उनकी अनुभूति किसी न
किसी रूप में अवश्य होती है।

 

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