इस विश्व जगत का जन्म शून्य से हुआ


 

          सूक्ष्म से सूक्ष्म कण
कहीं अन्यत्र बिखरे रहते हैं,
लेकिन वे ब्रह्मंड को संचालित
करने वाली परम सत्ता से जुड़े रहते
हैं। ब्रह्मंड के कण, द्रव और वाष्प दिखने
में भिन्न-भिन्न दिखते हैं, लेकिन वे भिन्न
नहीं हैं। एक ही स्वरूप के प्रतिबिंब हैं। मनुष्य,
पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, चर-अचर, द्रव और वाष्प
के तात्विक विश्लेषण में कोई भेद नहीं है।

                 प्रत्येक ठोस, द्रव
और वाष्प है और प्रत्येक वाष्प
ऊर्जा है। ऊर्जा भी पदार्थ की अंतिम
इकाई नहीं है। ऊर्जा ताप, विद्युत और
प्रकाश का योग है। ताप विद्युत और प्रकाश
की उत्पत्ति शून्य से होती है। कोई भी शून्य न
पदार्थ है, न तरल है और न वाष्प है। वह केवल
शून्य है।

          संसार शून्य से
पैदा हुआ है, यह केवल
दृष्टिभेद है, भ्रम है। अपदार्थ
से पदार्थ पैदा नहीं हो सकता।
शून्य से शून्य ही पैदा होता है।
संसार की वस्तुओं को हम देखते
हैं, लेकिन इसे देखने पर भरोसा करने
वाला भ्रम में पड़ जाता है। यह संपूर्ण संसार
भ्रमपूर्ण है, क्योंकि महानतम वैज्ञानिक आइं-
स्टीन ने पदार्थ को झुठलाते हुए कह दिया था
कि जो पदार्थ आप देखते हैं, जो संसार आप देखते
हैं वह ऊर्जा है। आपसे देखने में भूल हो रही है।

            दरअसल, पदार्थ है
ही नहीं, केवल ऊर्जा है। ऐसा
विज्ञान मानता है। विज्ञान और
अध्यात्म, दोनों इस बिंदु पर सह-
मत हैं कि संसार है ही नहीं। जिसे
हम संसार कहते हैं, पेड़-पौधे, पहाड़,
जीव सबका सूक्ष्म रूप ऊर्जा है। जिसे
हम पहाड़ कहते हैं, वह तो ऊर्जा का
घनीभूत रूप है। इस संसार की वस्तुओं
को हमने नाम दिया है, पहाड़ को चाहे जो
भी नाम दीजिए। नाम तो आप द्वारा दिया गया
है। जब आप स्वयं प्रामाणिक नहीं हैं तो आपका
दिया गया नाम प्रामाणिक कैसे हो सकता है। वि-
ज्ञान भी कहता है कि हमारी आंखें जो देखती हैं
वही निर्णय करती हैं कि यह द्रव है कि ठोस। आ-
श्चर्य है कि आंखें स्वयं झूठी रिपोर्ट संग्रह करती हैं।
पानी भरे गिलास में लकड़ी टेढ़ी दिखती है।

        मरुभूमि में जल
दिखता है। खुरदुरे चेहरे
में सौंदर्य दिखता है। हड्डियों
के ढांचे में प्रेयसी दिखती है। यह
सब इसलिए दिखता है, क्योंकि आपने
मान लिया है कि यह सौंदर्य है। आपका
मानना कितना प्रामाणिक है, उसे आपसे
अधिक कौन जान सकता है। जब आप
अपने नौकर को लखपतिया और करो-
ड़ीमल कह सकते हैं, तो आपकी बात
कितनी प्रामाणिक है, इसकी व्याख्या
आप स्वयं करें।

 

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