ईर्ष्या करना स्वयं में भयानक मनोरोग है


 

                            ईर्ष्या मानव चरित्र
के पराभव का एक प्रमुख कारण है। यह
ऐसा मनोविकार है, जिससे मनुष्य का मौलिक
व्यक्तित्व बुरी तरह आहत हो जाता है। ईष्र्या एक
भयानक मनोरोग है, जो अकारण मनुष्य को दंडित
करता रहता है।

                   इसके कारण मनुष्य
का सारा व्यक्तित्व विकृत हो जाता
है, उसकी अपनी क्रियात्मक शक्ति नष्ट
हो जाती है, जिससे उसके अपने व्यक्तित्व
को कुछ लेना-देना नहीं रहता। ईष्र्या हमेशा दूसरों
के कारण होती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि कोई भी
व्यक्ति अपने से ईष्र्या नहीं करता। ईष्र्या के लिए
दूसरे शख्स का होना आवश्यक है। अकेला व्यक्ति
कभी भी ईष्र्या का शिकार नहीं बनता। जब दूसरा
उसके सामने आ जाता है तब उसकी जलन बढ़
जाती है। आदमी अकेले सालों तक रह सकता है,
लेकिन कभी भी वह ईष्र्या का पात्र नहीं बनता,
लेकिन ज्यों ही दूसरा उसके बगल में बैठ जाता है,
तो ईष्र्या शुरू हो जाती है।

                  दरअसल, कोई भी व्यक्ति
दूसरे को सहन नहीं कर सकता। वह चाहे
राजनीति का क्षेत्र हो, धर्म का क्षेत्र हो, समाज
या परिवार का हो, कहीं भी हम दूसरे को स्वीकार
करने के लिए तैयार नहीं है। सारी गड़बड़ तब शुरू हो
जाती है जब कोई दूसरा बगल में खड़ा हो जाता है। केवल
दूसरे के होने से हम ईष्र्या के दंश को झेलने लगते हैं।

                        साधक कभी भी ईष्र्या नहीं
करता, क्योंकि वह साधना के क्षेत्र में अकेला
होता है। झगड़ा तो तब बढ़ता है जब एक ही काम
दो व्यक्ति करना चाहते हैं। दुनिया के जितने भी काम
हैं, वे सारे काम एक-दूसरे के लिए किए जाते हैं।    कोई
धन के लिए, कोई पद के लिए, कोई अपने अस्तित्व के
लिए दिन-रात प्रयत्न कर रहा है, लेकिन जब कभी वह
देखता है कि इस काम में कोई दूसरा आकर अर्थ या पद
का दावेदार बनना चाहता है तो उसके मन में ईष्र्या होने
लगती है। कभी-कभी तो हम ऐसे लोगों से ईष्र्या   करने
लगते हैं, जिन्हें हम पहचानते भी नहीं। कई बार तो हम
अपने बगल के मकान और उसके मालिक से ईष्र्या करने
लगते हैं, दूसरों की शान-ओ-शौकत से ईष्र्या करने लगते
हैं और सबसे बुरी बात तो यह है कि हम दूसरे की उन्नति
देखकर ईष्र्या करने लगते हैं।     ईष्र्या करने वाला व्यक्ति
अध्यवसायी नहीं होता। परिश्रम नहीं करके हमेशा आग में
जलता रहता है। दूसरे की प्रगति देखकर जलने वाला जीवन
में यशस्वी नहीं हो सकता।

 

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