ईश्वर और जीवों का सम्बंध-12


1- ईश्वर और जीवों का सम्बन्ध

             ईश्वर और जीवों का सम्बंध वैसा ही है जैसा चुम्बक
और लोहे का ।तो फिर ईश्वर जीव को आकर्।त क्यों नहीं करते ?
इस लिए कि जिसप्रकार कीचड में लिपटा हुआ लोहा चुंबक  चुंबक से
आकर्षित नहीं होता,उसी प्रकार अत्यधिक माया में लिप्त जीव ईश्वर के
आकर्षण का अनुभव नहीं करता,लेकिन जैसे ही पानी से कीचड धुल जाने पर
लोहा चुंबक की ओर आकर्षित होने लगता है उसी प्रकार अनवरत् प्रार्थना तथा
पश्चाताप के असुओं द्वारा संसारबंधन में डालने वाली माया का वह कीचड धुल
जाता है,तो जीव शीघ्र ही ईश्वर की ओर आकर्षित होने लगता है ।

2-भीष्म पितामह की आंख अंतिम क्षण में खुली थी

               जब भीष्म पितामह देहत्याग के समय शरशय्या पर पडे
हुये थे,तब एक दिन उनके नेत्र से आंसू निकलते देख अर्जुन ने भगवान
श्री कृष्ण से कहा, हे  सखे  आश्चर्य की  बात है कि पितामह जो सत्यवादी,
जितेन्द्रिय,ज्ञानी और अष्ट वस्तुओं में से एक हैं,शरीर त्यागते समय माया
से रो रहे हैं । भगवान  श्री  कृष्ण ने  जब यह बात  भीष्म पितामह से कही,तो
उन्होंनेकहा,भगवन् आप तो अच्छी तरह जानते हैं कि मैं ममता के कारण नहीं
रो रहा हूं,मेरे रोने का कारण यह है  कि  भगवान  की  लीला  को  आजतक  में नहीं
समझ पाया जिनका नाम मात्र जपने से मनुष्य अनेकोंनेक विपदाओं से तर जाता है,
और वे ही भगवान पाण्डवों के सारथी और सखा –रूप में विद्यमान हैं।

3-अवतारी पुरुष की पहचान

               जिस प्रकार एक रेल का एंजन स्वयं भी आगे बढता ङै और
कितने ही मालडिब्बों को भी साथ खीचकर लेजाता है उसी प्रका अवतारी
पुरुष भी हजारों-लाखों मनुष्यों को ईश्वर के निकट लेजाता है ।।

4-सबके भीतर परमात्मा विराजमान है

             मनुष्य तो एक के गिलाफ के समान है ।ऊपर से देखने
में कोई गिलाफ लाल है तो कोई काला,लेकिन सबके भीतर रुई भरी
होत है, उसी  प्रकार  मनुष्य  देखने  में कोई  सुन्दर है कोई काला है,कोई
महात्मा हैतो कोई दुराचारी है,पर सबके भीतर वही परमात्मा विराजमान है ।।

5-संसारिक जीवों में धर्म का प्रभव कम पडता है

जिस प्रकार एक मगर पर शस्त्र से वार किया जाय,तो उससे
मगर का कुच भी नहीं होता है,बल्कि शस्त्र ही छिटककर अलग गिर जाता है ।
इसी प्रकार संसारी जीवों के बीच यदि धर्म चर्ची कितनी ही क्यों न की जाय,उसके
ह्दय पर तनिक भी प्रभाव नहीं पडता ।।

6-मन तराजू के पलडे के समान है

           तराजू का जिधर पल्ला भारी होता है,उधर झुक जाता  है और
जिधर हल्का होता है,उधर का भाग ऊपर को उठ जाता है। मनुष्य का मन
भी तराजू की भॉति है।उसके एक ओर संसार है और दूसरी ओर भगवान है ।
जिसके मन में संसार ,मान इत्यादि का भार अधिक होता है, उसका मन संसार
की ओर से उठकर भगवान की ओर झुक जाता है ।।

7-हमारे हाथ आंखों पर हैं

         विश्व की समस्त शक्तियॉ हमारी हैं,हमने तो अपने हाथ अपने
आंखों पर रख लिए हैं और चिल्लाते हैं कि सब ओर अंधेरा है ।जान लो कि
हमारे चारों ओर अंधेरा नहीं है,अपने हाथ अलग करो,तुम्हें प्रकाश दिखाई देने
लगेगा ,जो कि पहले भी था ।अंधेरा कभी नहीं था, कमजोरी कभी नहीं थी।हम
सब मूर्ख हैं जो चिल्लाते हैं कि हम कमजोर हैं,अपवित्र हैं ।।
 

8-एक विचार पालो

                  एक विचार लेलो ।उसी एक विचार के अनुसार जीवन
को बनाओ,उसी को सोचो,उसी का स्वप्न देखो और उसी पर अवलम्बित
रहो ।शरीर के प्रत्येक भाग को उसी विचार से ओत-फ्रोत होने दो और दूसरे
सब विचारों को अपने से दूर रखो यही सफलता का रास्ता है ।।

9-ईश्वर के कई रूपों में दिखता है

      एक बार एक मनुष्य जंगल गया य़वहॉ उसने एक वृक्ष पर
एक सुन्दर प्राणी देखा ।घर लौटकर उसने अपने मित्र से कहा कि
मैने जंगल में एक पेड पर लाल रंग का एक प्राण देखा,मित्र बोला मैने
भी देखा लेकिन वह तो हरा है,तीसरे व्यक्ति ने कहा नहीं उसे तो मैने भी
देखा वह तो पीला है,उन्य लोगों ने भी कहा किसी ने कहा सफेद रंग का है
किसी ने कोई और रंग बताया ।उन्हैं परस्पर झगडा होने लगा अंत में वे उस
वृक्ष के पास गये वहॉ पर एक व्यक्ति बैठा था उसने उनके प्रश्नों के उत्तर में
कहा,मैं तो इसी वृक्ष के नीचे बैठा रहता हूं और उस जन्तु को खूब अच्छी तरह
से जानता हूं।तुम लोग उसके विषय में जो कह रहे हो सब सही है ।कभी वह लाल
होता है कभी पीला,कभी सफेद उसके रंग बदलते रहते हैं और कभी विना रंग का
दिखता है ।इसी प्रकार जो निरंतर भगवान का चिंतन कता है वह उनके रूपों तथा
अवस्थाओं के बारे में जान सकता है।भगवान के अपने गुंण हैं,साथ ही वे निर्गुंण भी हैं।
केवल वही व्यक्ति जो वृक्ष के नीचे रहता है,जानता है कि वह कितने रंगों में दिखाई देता
है ।दूसरे लोग, जो पूरे सत्य को नहीं जानते ,परस्पर झगडा करते रहते हैं और कष्ट पाते हैं ।।

10-ईश्वर निराकारव साकार से परे है

           ईश्वर के वारे में भ्रॉतियॉ निराकार और कार के सम्बंध में ।
ईश्वर तो निराकार भी है साकार भी है तथा इससे परे भी है।केवल  वे  ही
स्वयं जानते हैं कि वे क्या हैं।जो लोग उनसे  प्रेम  करते हैं उनके लिए वे नाना
प्रकार से नाना रूपों स्वयं को व्यक्त करते हैं ।किन्तु निश्चित ही वे साकार अथवा
निराकार की सीमा से बंधे नहीं हैं ।।

11-श्रद्धा और विश्वास में बहुत बडी शक्ति है

              एक आदमी से विभीषण ने कहा लो इस चीज को अपने  पास  कपडे
के एक छोर से बॉध के रख लो ,इसके बल पर तुम  सहज  ही  समुद्र  पार हो जाओगे,
तुम पानी पर चल सकोगे,लेकिन ध्यान रखना इसे देखना नहीं,नहीं तो डूब जाओगे।वह
आदमी पानी पर बडी सरलता से चलते हुय़े आगे बढने लगा –विश्वास में ऐसा ही बल होता
है ।लेकिन कुछ दूर जाने पर उसके मन में कुतूहल हुआ-कि विभीषण ने मुझे कौन सी वस्तु
दी है कि जिसके बल पर मैं पानी के  ऊपर  ही  ऊपर  चला जा रहा हूं ?  उसने  गॉठ  खोल  ली
और देखा तो उसमें केवल एक पत्ता था, जिसपर लिखा था राम नाम। उसने कहा –बस यही,
और तत्काल वह डूब गया ।कहते हैं कि हनुमान ने राम के नाम पर विश्वास करके एक छलॉग
में समुद्र को लॉघ दिया था लेकिन रामचन्द्र जी को सेतु बॉधना पडा था ।।

12-हम माया के अन्दर सुख ढूंडते हैं

            इस संसार में जीवन और मृत्यु,शुभ और अशुभ,ज्ञान और अज्ञान
का यह मिश्रण ही माया या जगत प्रपंच है ।तुम्हें सुख के साथ बहुत दुख तथा
अशुभ भी मिलेगा ।यह कहना कि मैं केवल शुभ लूंगा,अशुभ नहीं लूंगा ,लडकपन
है-यह असम्भव है ।

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