भूत और भविष्य का ज्ञान–4


1-संयम क्या है-

जब हम अपने मन को किसी निर्धारित वस्तु की ओर लेजाकर
उस वस्तु में कुछ समय तक के लिए धारण कर सकते हैं,और उसके
बाद उसके अन्तर्भाग को उसके बाहरी भाग से अलल करके काफी समय तक
उसी स्थिति को बनाये रखते हैं, तो यह संयम कहलाता है।उस स्थिति में बाहरी
आकार अचानक गायब हो जाता है यह पता ही नहीं चलता । हममें तो केवल इसका
अर्थ मात्र भाषित होता है ।।

2-संयम में सफल होना ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करना है-

यदि हम इस संयम को साधन के रूप में अपनाने में सफल हो
जाते हैं तो सारी शक्तियॉ हमारे हाथ में आ जाती हैं ।यही संयम योगी
का प्रधान स्वरूप है।ज्ञान के विषय तो अनन्त हैं ।जैसे स्थूल,स्थूलतम् सूक्ष्म,
सूक्ष्मतम् आदि कई विभागों में विभक्त हैं।संयम का प्रयोग पहले स्थूल वस्तु पर
करना चाहिए,और जब स्थूल ज्ञान प्राप्त होने लगे,तब थोडा-थोडा करके सूक्ष्मतम्
वस्तु पर प्रयोग करना चाहिए ।

3-भूत और भविष्य का ज्ञान-

जब मन बाहरी भाग को छोडकर उसके आन्तरिक भावों के साथ
अपने को एक रूप करने की अवस्था में पहुंचता है,तब दीर्घ अभ्यास
के द्वारा मन केवल उसी की धारणॉ करके क्षण भर में उस अवस्था में
पहुंच जाने की शक्ति प्राप्त कर लेता है, लेकिन इसके लिए हमें संयम की
परिभाषा को नहीं भूलना चाहिए । और इस अवस्था को प्राप्त करके यदि भूत
और भविष्य जानने की इच्छा करे,तो उन्हैं संस्कार के परिणॉमों में संयम का प्रयोग
करना चाहिए । फिर भूत और भविष्य को जाना जा सकता है ।

4-कुल श्रेष्ठ कौन हैः-

किसी कुल में उसी को श्रेष्ठ माना
जाता है जो संपूंर्ण प्राणिर्यों को शॉत
रखने का प्रयत्न करता है, हमेशा
सत्य व्यवहार करता है, कोमल
स्वभाव होकर सबका सम्मान करता
है, सर्वदा शुद्ध भाव से रहता है ।

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