कृष्ण व राधा, क्यों नहीं बंधे विवाह बंधन में


 

                जब कृष्ण के प्रति
राधा का प्रेम समाज को चुभने
लगा तो घर से उनके निकलने पर
रोक लगा दी गई। लेकिन कृष्ण की
बंसी की धुन सुनकर राधा खुद को रोक
नहीं    पाती  थी।  यह  देखकर  उनके  घरवालों
ने उन्हें खाट से बांध दिया था। पूर्णिमा की शाम थी।
राधे  को बांसुरी की मधुर आवाज सुनाई दी।  उन्हें
लगने लगा कि  अपने  शरीर  को छोडकऱ बस वहां
चली जाएं। कृष्ण को राधे की इच्छा और उस पीड़ा
का अहसास हुआ, जिससे वह गुजर रही थीं। वह
उद्धव और बलराम के साथ राधे के घर गए और
उसकी छत पर जा चढ़े।
                               कृष्ण ने कहा, ‘आठ साल
पहले जब मुझे ओखली से बांध दिया गया था,
तो यह लडक़ी मेरे पास आई थी। तभी उसकी नजर
मुझ पर पड़ी। उस पल से मैं ही उसके जीवन का आधार
बन चुका हूं। उन्होंने राधे के कमरे की खपरैल को हटाया,
धीरे-धीरे नीचे उतरे और राधे को आजाद कर दिया। इतने में
ही बलराम भी छत से नीचे आ गए। उन्होंने कृष्ण और राधे
दोनों को उठाया और बाहर आ गए। इसके बाद सभी ने पूरी
रात खूब नृत्य किया।    अगली सुबह जब मां ने देखा तो राधे
अपने बिस्तर पर सो रही थीं। पूर्णिमा का यह अंतिम रास था।
कृष्ण ने माता    यशोदा से कहा कि वह राधे से विवाह करना
चाहते हैं। इस पर मां ने कहा, ‘राधे तुम्हारे लिए ठीक लड़की
नहीं है; इसकी वजह है कि एक तो वह तुमसे पांच साल बड़ी है,
दूसरा उसकी मंगनी पहले से ही किसी और से हो चुकी है। जिसके
साथ उसकी मंगनी हुई है, वह कंस की सेना में है।
                   अभी वह युद्ध लडऩे गया है।
वह जब लौटेगा तो अपनी मंगेतर से विवाह
कर लेगा। इसलिए तुम्हारा उससे विवाह नहीं हो
सकता। वैसे भी जैसी बहू की कल्पना मैंने की है,
वह वैसी नहीं है। इसके अलावा, वह कुलीन घराने
से भी नहीं है। वह एक साधारण ग्वालन है और तुम
मुखिया के बेटे हो। हम तुम्हारे लिए अच्छी दुल्हन ढूंढेंगे।
यह सुनकर कृष्ण ने कहा, ‘वह मेरे लिए सही है या नहीं,
यह मैं नहीं जानता। मैं तो बस इतना जानता हूं कि जब
से उसने मुझे देखा है, उसने मुझसे प्रेम किया है और
वह मेरे भीतर ही वास करती है। मैं उसी से शादी करना
चाहता हूं। मां और बेटे के बीच यह वाद-विवाद बढ़ता गया।
माता यशोदा के पास जब कहने को कुछ न रहा तो बात पिता
तक जा पहुंची। माता ने कहा, ‘देखिए आपका बेटा उस राधे से
विवाह करना चाहता है।
                      वह लड़की ठीक नहीं है।
वह इतनी निर्लज्ज है कि पूरे गांव में
नाचती फिरती है। उस वक्त के समाज के
बारे में आप अंदाजा लगा ही सकते हैं। कृष्ण
के पिता नंद बड़े नरम दिल के थे, अपने पुत्र से
बेहद प्रेम करते थे। उन्होंने कृष्ण से इस बारे में
बात की, लेकिन कृष्ण ने उनसे भी अपनी बात
मनवाने की जिद की। ऐसे में नंद को लगा कि
अब कृष्ण को गुरु के पास ले जाना चाहिए। वही
उसे समझाएंगे। गर्गाचार्य और उनके शिष्य संदीपनी
कृष्ण के गुरु थे। गुरु ने कृष्ण को समझाया, ‘तुम्हारे
जीवन का उद्देश्य अलग है। इस बात की भविष्यवाणी हो
चुकी है कि तुम मुक्तिदाता हो। इस संसार में तुम ही धर्म के
रक्षक हो। तुम्हें इस ग्वालन से विवाह नहीं करना है।
                तुम्हारा एक खास
लक्ष्य है। कृष्ण बोले, ‘यह कैसा
लक्ष्य है, गुरुदेव? अगर आप चाहते
हैं कि मैं धर्म की स्थापना करूं, तो क्या
इस अभियान की शुरुआत मैं इस अधर्म के
साथ करूं? आप समाज में धार्मिकता और
साधुता स्थापित करने की बात कर रहे हैं।
क्या यह सही है कि इस अभियान की शुरुआत
एक गलत काम से की जाए? गुरु गर्गाचार्य ने कहा,
‘धर्मविरुद्ध काम करने के लिए तुमसे किसने कहा?
कृष्ण ने कहा, ‘आठ साल पहले जब मुझे ओखली से
बांध दिया गया था, तो यह लडक़ी मेरे पास आई थी।
तभी उसकी नजर मुझ पर पड़ी। कृष्ण ने कहा, ‘नहीं,
मैं बढ़ा चढ़ाकर नहीं बता रहा हूं। यही सच है। गर्गाचार्य
ने दोबारा कहा, ‘तुम मुक्तिदाता हो, तुम्हें धर्म की स्थापना
करनी है। कृष्ण बोले, ‘मैं मुक्तिदाता नहीं बनना चाहता।
                      मुझे तो बस अपनी गायों से,
बछड़ों से, यहां के लोगों से, अपने दोस्तों
से, इन पर्वतों से, इन पेड़ों से प्रेम है और
मैं इन्हीं के बीच रहना चाहता हूं। उस पल
से मैं ही उसके जीवन का आधार बन चुका
हूं। उसका दिल, उसके शरीर की हर कोशिका
मेरे लिए ही धडक़ती है। एक पल के लिए भी वह
मेरे बिना नहीं रही है। अगर एक दिन मुझे न देखे
तो वह मृतक के समान हो जाती है। वह पूरी तरह मेरे
भीतर निवास करती है और मैं उसके भीतर। ऐसे में अगर
मैं उससे दूर चला गया, तो वह निश्चित ही मर जाएगी। मैं
आपको बताना चाहता हूं कि जब सांपों वाली घटना हुई,
अगर मैं वहीं मर जाता तो गांव में दुख तो बहुत से लोगों
को होता, लेकिन राधे वहीं अपने प्राण त्याग देती। देखो,
हर कोई सोचता है कि कृष्ण अजेय हैं, वह मर नहीं
सकते, लेकिन खुद कृष्ण अपनी नश्वरता के प्रति
पूरी तरह सजग थे। गर्गाचार्य ने कहा, ‘तुम्हें नहीं
लगता, तुम पूरी घटना को कुछ ज्यादा ही बढ़ा
चढ़ाकर बता रहे हो? कृष्ण ने कहा, ‘नहीं, मैं
बढ़ा चढ़ाकर नहीं बता रहा हूं। यही सच है।
गर्गाचार्य ने दोबारा कहा, ‘तुम मुक्तिदाता हो,
तुम्हें धर्म की स्थापना करनी है।
                कृष्ण बोले, ‘मैं मुक्तिदाता
नहीं बनना चाहता। मुझे तो बस अपनी
गायों से, बछड़ों से, यहां के लोगों से, अपने
दोस्तों से, इन पर्वतों से, इन पेड़ों से प्रेम है और
मैं इन्हीं के बीच रहना चाहता हूं।यह सब सुनने के
बाद गर्गाचार्य को लगा कि अब समय आ गया है कि
कृष्ण को उनके जन्म की सच्चाई बता दी जाए।

                  राधे से विवाह के लिए एक
तरफ कृष्ण का आग्रह था, तो दूसरी
तरफ यशोदा और नंद की वंश-मर्यादा।
जब विवाद बढ़ता गया तो इस संकट की
घड़ी से सबको निकाला गुरु गर्गाचार्य ने,
कृष्ण को उनके जन्म की हकीकत और
मकसद बता कर। आइये देखते हैं गुरु ने
कृष्ण को क्या बताया
                इसके बाद गर्गाचार्य ने
कृष्ण को नारद द्वारा उनके बारे
में की गई भविष्यवाणी के बारे में
बताया। पहली बार उन्होंने कृष्ण के
साथ यह राज साझा किया कि वह नंद
और यशोदा के पुत्र नहीं हैं।
             कृष्ण को पता था कि
अब उन्हें वहां से विदा लेना है।
जाने से पहले उन्होंने एक रास का
आयोजन किया। कृष्ण बचपन से नंद
और यशोदा के साथ रह रहे थे। अचानक
उन्हें बताया गया कि वह उनके पुत्र नहीं हैं।
यह सुनते ही वह वहीं उठ खड़े हुए और अपने
अंदर एक बहुत बड़े रूपांतरण से होकर गुजरे।
अचानक कृष्ण को महसूस हुआ कि हमेशा से कुछ
ऐसा था, जो उन्हें अंदर ही अंदर झकझोरता था। लेकिन
वह इन उत्तेजक भावों को दिमाग से निकाल देते थे और
जीवन के साथ आगे बढ़ जाते थे। जैसे ही गर्गाचार्य ने
यह राज कृष्ण को बताया, उनके भीतर न जाने कैस-कैसे
भाव आने लगे! उन्होंने गुरु से विनती की, ‘कृपया, मुझे
कुछ और बताइए।Ó गर्गाचार्य कहने लगे, ‘नारद ने तुम्हें
पूरी तरह पहचान लिया है। तुमने सभी गुणों को दिखा दिया
है। तुम्हारे जो लक्षण हैं, वे सब इस ओर इशारा करते हैं कि
तुम ही वह शख्स हो, जिसके बारे में तमाम ऋषि मुनि बात
करते रहे हैं। नारद ने हर चीज की तारीख, समय और स्थान
तय कर दिया था और तुम उन सब पर खरे उतरे हो।
              कृष्ण अपने आसपास के
लोगों और समाज के लिए पूरी तरह
समर्पित थे। राधे और गांव के लोगों के
प्रति उनके मन में गहरा लगाव और प्रेम
था, लेकिन जैसे ही उनके सामने यह राज
आया कि उनका वहां से संबंध नहीं है, वह
किसी और के पुत्र हैं, उनका जन्म कुछ और
करने के लिए हुआ है,तो उनके भीतर सब कुछ
बदल गया। ये सब बातें उनके भीतर इतने जबर्दस्त
तरीके से समाईं कि वह चुपचाप उठे और धीमे कदमों से
गोवर्द्धन पर्वत की ओर चल पड़े।
                 वह इतनी ज्यादा
भाव-विभोर और आनंदमय
हो गईं कि अपने आसपास की
हर चीज से वह बेफिफ्र हो गईं। कृष्ण
जानते थे कि राधे के साथ क्या घट रहा है।
वह उनके पास गए, उन्हें बांहों में लिया,
अपनी कमर से बांसुरी निकाली और उन्हें
सौंपते हुए बोले, ‘राधे, यह बांसुरी सिर्फ तुम्हारे
लिए है। पर्वत की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंचे और
वहां खड़े होकर आकाश की ओर देखने लगे। सूर्य
अस्त हो रहा था और वह अस्त हो रहे सूर्य को देख
रहे थे।
                    अचानक उन्हें ऐसा लगा,
जैसे एक जबर्दस्त शक्ति उनके भीतर
समा रही है। यहीं उनके अंदर ज्ञानोदय हुआ
और उस पल में उन्हें अपना असली मकसद याद
आ गया। वह कई घंटों तक वहीं खड़े रहे और
अपने भीतर हो रहे रूपांतरण और तमाम
अनुभवों को देखते और महसूस करते
रहे। वह जब पर्वत से उतरकर नीचे
आए तो पूरी तरह से बदल चुके थे।
चंचल और रसिक ग्वाला विदा हो
चुका था, उसकी जगह उनके भीतर
अचानक एक गहरी शांति नजर आने
लगी, गरिमा और चैतन्य का एक नया
भाव दिखने लगा। जब वह नीचे आए तो
अचानक वे सभी लोग उनके सामने नतम-
स्तक हो गए, जो कल तक उनके साथ खेलते
और नृत्य करते थे। उन्होंने कुछ नहीं किया था।
वह बस पर्वत पर गए, वहां कुछ घंटों के लिए खड़े
रहे और फिर नीचे आ गए। इसके बाद जो भी उन्हें
देखता, वह सहज ही, बिना कुछ सोचे समझे उनके
सामने नतमस्तक हो जाता।
           कृष्ण को पता था कि
अब उन्हें वहां से विदा लेना है।
जाने से पहले उन्होंने एक रास का
आयोजन किया। जाने से पहले वह अपने
उन लोगों के साथ एक बार और नृत्य कर
लेना चाहते थे।
                वह जब पर्वत से
उतरकर नीचे आए तो पूरी
तरह से बदल चुके थे। चंचल
और रसिक ग्वाला विदा हो चुका
था। उन्होंने जमकर गाया, नृत्य किया।
हर किसी को पता था कि वह जा रहे हैं,
लेकिन राधे थीं कि भीतर ही भीतर परम
आनंद के एक जबर्दस्त उन्माद से सराबोर
थीं और भावनाओं की सामान्य हदों से कहीं
आगे निकल गई थीं। वह इतनी ज्यादा भाव-
विभोर और आनंदमय हो गईं कि अपने आसपास
की हर चीज से वह बेफ्रिक हो गईं। कृष्ण जानते थे
कि राधे के साथ क्या घट रहा है। वह उनके पास
गए, उन्हें बांहों में लिया, अपनी कमर से बांसुरी
निकाली और उन्हें सौंपते हुए बोले, ‘राधे, यह
बांसुरी सिर्फ तुम्हारे लिए है। अब मैं बांसुरी को
कभी हाथ नहीं लगाऊंगा।Ó इतना कहकर वह
चले गए। इसके बाद उन्होंने कभी बांसुरी नहीं बजाई।
उस दिन के बाद से राधे ने कृष्ण की तरह बांसुरी बजानी
शुरू करो

 

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