स्वयं को पहचानें-16


1-क्रोध करना बुरा है की अनुभूति कब होती है

     यदि आप कहते हैं कि मैं यह जानता हूं कि क्रोध
करना बुरा है,हानि कारक है,लेकिन इस बात को आप
तभी जानते हैं जब कोई दूसरा क्रोध कर रहा होता है या
आप यह तभी जानते हैं जब आपका क्रोध आकर जा चुका
होता है,लेकिन जब आप क्रोध में होते हैं तो आपका रोआं-रोआं
कहता है कि क्रोध ही उचित है ।

2-स्वयं को पहचानने में विवाद न करें-

      जो लोग धर्म के बारे में विवाद करते हैं,वे तो
स्वयं को पहचानने में विवाद करते हैं।वे स्वयं ईश्वर
रूप होते हुये भी अपने ईश्वर पद को अस्वीकार करते हैं।वे
पागलों की भॉति अपने को ही नहीं पहचानते हैं ।वे लोग अपनी
गंदगी और अनुत्तरदायित्वपूर्ण कार्य से जगत को कुरूप बना देते हैं ।
इनका उपचार करना,इन्हैं समझा-बुझाकर इनके रोग को मिटाना आवश्यक हैं।
नईं शिक्षा के द्वारा इन्हैं शिक्षित किया जाना चाहिए ।

3-शुभ कार्य स्वयं में शुभ मुहूर्त है-

       कोई भी शुभ कार्य करने में उसे कल पर नहीं
छोडना चाहिए,और न हीं शुभ कार्य के लिए मुहूर्त की
आवश्यकता होती है,इसलिए कि शुभ कार्य स्वयं में शुभ मुहूर्त है ।
अशुभ को करने में जल्दवाजी नहीं करनी चाहिए ।शुभ,पुण्य कार्य को आज
ही कर लो,अभी कर डालो,इसी वक्त कर डालो पता नहीं अगले क्षण तुम रहो या न रहो ।

4-श्रद्धा और विश्वास-

       विश्वास तो कई जगह किया जा सकता है, जैसे
मित्र,नौकर,अपना सम्बन्धी,और यहॉ तक कि ताले पर
भी ।लेकिन श्रद्धा तो केवल एक ही स्थान पर होती है और वह है
इष्ट या सद्गुरु।श्रद्धा के आने से अभय का भाव आता है । लेकिन अभय
का तात्पर्य यह नहीं कि तुम किसी से डरते नहीं, बल्कि इस भाव का अर्थ तब
पूर्ण होगा जब तुमसे भी कोई न डरे ।

5-दुखों से मुक्ति पाने का साधन श्रेष्ठ बुद्धि है-

      ईश्वर ने जिस महान उद्देश्य के लिए हमें यह शरीर
प्रदान किया है,     इसके लिए श्रेष्ठ बुद्धि की आवश्यकता है।
इस संसार के समस्त दुखों से मुक्ति पाने के लिए महत्वपूर्ण साधन
यह श्रेष्ठ बुद्धि ही है,जिसकी सहायता से संसार का प्रत्येक प्राणी भव सागर
के भंवर में उलझी हुई अपने इस तन रूपी नौका को भी पार उतार सकता है लेकिन
यह तभी संभव है जब बुद्धि श्रेष्ठ हो ।

6-जब बुद्धि मलिन हो तो समझो विपत्ति आनी वाली है-

जैसा कि कहा गया है कि विनाश काले विपरीत बुद्धि।
जब बुद्धि मलिन होने लगे और विचार अपवित्र हों तो समझ
लेना चाहिए कि कोई विपत्ति आनी वाली है। उस समय योग द्वारा
अपने विचारों और संकल्प को शुद्ध और पवित्र बना लेना चाहिए,तो फिर
दुर्भाग्य भयभीत नहीं कर सकेगा । जिससे संकट हल्का हो जाता है । सत्य
संकल्प के द्वारा कठिन आपत्ति को भी टाला जा सकता है ।दृढ संकल्प और शुद्ध
विचार वाले व्यक्ति पर यदि अचानक विपत्ति आ भी जाय तो प्रकृति और आस-पास
के लोग एवं वहॉ का वातावरण उसके बोझ को बॉट लेंगे । इसलिए संकल्प शक्ति इस संसार
में सर्वोपरि शक्ति है ।

7-मन हंसता है तो होंठ कभी नहीं रोते-

           जिसका मन रोगी नहीं ,विकार युक्त नहीं ,
उसका शरीर कभी रोगी नहीं हो सकता है।जिसका मन
हंसता है उसके होंठ कभी नहीं रोते ।अस्वस्थ तन में स्वस्थ
मन तो रह सकता है,परन्तु अस्वस्थ मन कभी तन को स्वस्थ रहने नहीं देता ।

8-स्वस्थ चिंतन से समाज को गति मिलती है –

              स्वस्थ शरीरमें स्वस्थ विचार होते हैं स्वस्थ चिन्तन
से एकाग्रता-सजगता-अन्तर्दृष्टि जागृत होती है।तब आत्मध्यान
की गहराई से प्राप्त अमृत ही जीवन को शक्ति व शॉन्ति देता है।इस
प्रकार के स्वस्थ चिन्तन व शॉत मानव द्वारा ही विश्व सुन्दर वनता है,उस
समाज को उत्थान की ओर बढने की गति मिलती है ।बीमार व्यक्ति का चिन्तन
एवं आचरण भी रुग्ण होगा। मूढ व्यक्ति तो अपना ही उपकार नहीं कर सकता ।अशॉत
व्यक्ति तो दुनियॉ को कुरूप बना देता है ।

9-ईश्वर अनुभूति का विषय है –

       जिसे पाने का कोई उपाय नहीं उसका नाम है
संसार, और जिसे खोने का कोई उपाय नहीं है उसका
नाम है परमात्मा।लेकिन इस संसार को पाने के लिए और
परमात्मा को खोने के लिए इंसान सारा जोखिम दॉव पर लगा देता है ।
ईश्वर तो मान्यता का नहीं अनुभूति का विषय है ।

10-सबसे बडा वशीकरण मंत्र स्वयं को वश में करना है-

      सच्चा संत कभी वशीकरण मंत्र का प्रयोग नहीं
करता बल्कि  संत  तो  स्वयं  अपने  आपको  वश में
कर देता है । और फिर पूरी दुनियॉ संत के वश में हो
जाती है। स्वयं अपने को वस में करना दुनियॉ का सबसे
बडा वशीकरण मंत्र है ।

11-सत्य को गंवाकर कुबेर की सम्पदा पाना घाटे का सौदा होगा-

     सत्य और न्याय के पीछे चलने में हमें सबकुछ
छोडना पडता है  तो  इसके  लिए   हमें स्वयं को तैयार
करना चाहिए ।क्योंकि सत्य ही परमेश्वर है, इससे बढकर
इस संसार में कुछ भी नहीं है । यदि सत्य अपने हाथ रहा और
उसके बदले सबकुछ चला गया तो कोई हर्ज नहीं ।लेकिन यदि सत्य
को गंवाकर कुवेर की सम्पदा और इन्द्र का सिंहासन भी मिल जाता तो समझना
चाहिए कि यह बहुत महंगा और बहुत घाटे का शौदा रहा है ।

12- ज्ञान का सार है आचार-

       वही ज्ञान उपयोगी होता है जो अहंकार न बढाये,
जो बंधन न बने,        जिससे स्व की विस्मृति न हो, जो
संस्कार का शोधन करे, तथा मानसिक शॉति की ओर ले जाये।
ज्ञान की उपयोगिता की चरम कसौटी है कि वह आत्मा की ओर ले
जाये ,जो ज्ञान आत्मा से विमुख बनाता है उसे भारतीय मनीषा में अज्ञान
कहा जैता है। ज्ञान का सार है आचार ,इसलिए वही ज्ञान उपयोगी है जो अहंकार
न बढाये ।

13- ज्ञान का दुरुपयोग विनाश और सदुपयोग विकास है-

     जिस प्रकार गंगा नदी के प्रवाह को,सुखाया नहीं जा
सकता,केवल उस प्रवाह के मार्ग को बदला जा सकता है।
उसी प्रकार ज्ञान के प्रवाह को सुखाया नहीं जा सकता है,उसे
पर हित के लिए उपयोग में लाया जा सकता है ।ज्ञान का दुरुपयोग
होना विनाश है और ज्ञान का सदुपयोग करना ही विकास है,सुख है,उन्नति
है ।ज्ञान के सदुपयोग के लिए तो जागृति परम आवश्यक है ।

14- आदर्श साहित्यकार की पहचान –

         आदर्श साहित्यकार वही है जो समाज की पीडा और
सुख का अनुभव कर समाज के लिए रोता और हंसता है ।वह
तो एक दिया है,जो जलकर केवल दूकरों को ही प्रकास देता है।जब
साहित्यकार की भावना,ज्ञान और कर्म एक साथ मिलती हैं तो युग प्रवर्तक
साहित्य का निर्माण होता है।किसी देश का साहित्य वहॉ की जनता की चित्त वृत्ति
का द्योतक है।साहित्य तो आनंद देता है ।ज्ञानराशि के संचित कोष का नाम ही साहित्य है,
जिसका निर्माण साहित्यकार द्वारा किया जाता है ।

15- वास्तविक सौन्दर्य ह्दय की पवित्रता में है-

        योग्य मनुष्यों के आचरण का सौन्दर्य ही उसका
वास्तविक  सौन्दर्य  है, शारीरिक सौन्दर्य उसकी सुंदरता
में किसी भी प्रकार की अभिवृद्धि  नहीं  करता। सुन्दर और
कल्याणमय के साथ यदि हम ह्दय की समीपता बढाते रहें
तो संसार सत्य और पवित्रता की ओर अग्रसर होगा ।अलंकार
तो भावों का आवरण है और सुन्दरता को तो अलंकारों की जरूरत है ही नहीं।

16- शंका जीवन का विश है-

          आदमी के लिए विश्वास ही सबकुछ है,जिसे अपने
पर विश्वास नहीं,उसे भगवान पर भी विश्वास नहीं हो सकता।
स्वयं को ईश्वर पर छोड देना ही विश्वास है।