क्रोध करना मनुष्य की एक मनोवृत्ति बन जाती है


              क्रोध से व्यक्ति का
सहज स्वभाव बदल जाता है।
क्रुद्ध व्यक्ति की सज्जनता, संवे-
दनशीलता, शालीनता, विन्रमता,
उदारता आदि गुण ओझल हो जाते हैं।
उसके अंदर की हमदर्दी कठोरता में और
सहृदयता क्रूरता में बदल जाती है।

         जब क्रोध स्थायी
भाव बन जाता है तो यह
रोष बन कर प्रकट होता
है। क्रोध एक मनोवृत्ति है।
यह एक ऐसी भाव दशा है
जो अति शीघ्र प्रकट होती है।
इसे दबाया तो जा सकता है, लेकिन
इसके प्रभावों को छिपाना संभव नहीं है।
क्रोध मानवीय व्यवहार के किसी न किसी
पक्ष से उजागर हो ही जाता है। मनोवैज्ञानिकों
ने क्रोध को शांत व हिंसक के रूप में वर्गीकृत
किया है। शांत क्रोध अंतरमुखी होता है। इससे
व्यक्ति में हताशा, निराशा और उदासी छा जाती
है। वह हैरान-परेशान रहता है।

           अपने मन की बात किसी
से कह न पाने के कारण वह अंदर
ही अंदर घुटता रहता है। क्रोध के उबाल
को दबा देने के कारण उसकी आंतरिक स्थि-
ति और भी अस्थिर व अशांत हो उठती है।

          ोहिंसक क्रोध बहिर्मुखी होता
है। यह क्रोध अपने उफान को बाहर
प्रकट करता है। इसके परिणाम स्वरूप
कलह, लड़ाई-झगड़ा से लेकर दंगा-फसाद
तक होते देखे जा सकते हैं। यह भी दो प्रकार
का होता है- साधारण और असाधारण। साधारण
क्रोध अल्पकालिक और क्षणिक होता है। यह दूध
के समान तुरंत उफन पड़ता है। इसकी प्रतिक्रिया
क्षीण ही सही, परंतु तीव्र होती है। जैसे ही यह क्रोध
शांत होता है, अपने किए कर्म पर पश्चाताप होता है।
असाधारण क्रोध का आवेश दीर्घकाल तक बना रहता है।
आवेश का यह नशा मदिरा के समान होता है। इसके नशे
में व्यक्ति लंबे समय तक आत्मविस्मृत हो कर बेसुध
पड़ा रहता है। ऐसे व्यक्ति को कोई भी उपदेश और
मार्गदर्शन देना संभव नहीं है, क्योंकि वह अपने
ही बुने ताने-बाने में जलता-भुनता रहता है।
धीरे-धीरे वह उन्माद के बाहुपाश में जकड़ता
चला जाता है और उन्मादी वृत्ति उसके जीवन
का अंग बन जाती है। किसी भी कारण से क्रोध
पैदा हो सकता है, परंतु जैसे ही मन में छोटी तरंग
उत्पन्न होती है, वैसे ही यह संवेदना का योग पाकर
मन की गहराई में उतरती चली जाती है। क्रोध को
नियंत्रित किया जा सकता है। आत्म-नियंत्रण व
ईश्वर चिंतन द्वारा इस असाध्य मनोरोग से मुक्ति
संभव है।

 

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