क्षमाशीलता व्यक्ति का उत्तम आभूषण है


 

           क्षमा एक ऐसा
आभूषण है, जो किसी के
व्यक्तित्व में चार चांद लगा
देता है। क्षमा करना बहुत मुश्कि-
ल कार्य है, खास तौर पर उस समय,
जब आप शक्तिशाली हों और किसी का
नुकसान करने में सक्षम हों। एक दीन-हीन
व्यक्ति को समय-समय पर अपमानजनक स्थि-
तियों से गुजरना पड़ता है।

                     अपमान को नजर
अंदाज करना कमजोर व्यक्ति
की मजबूरी होती है , परंतु क्रोध
का शमन कर लेना शक्तिशाली व्यक्ति
की क्षमाशीलता की पहचान है। महात्मा
गांधी का जीवन इसका जीवंत उदाहरण है।
प्रतिशोध की भावना मानव स्वभाव का अंग है।
क्षमाशीलता से ही इसका नियंत्रण संभव है।

             अच्छे संस्कार
क्षमाशीलता को पुष्पित
और पल्लवित करते हैं परंतु
यदा-कदा कड़ी परीक्षा में सब
कुछ धरा रह जाता है । संस्कारों
की शीतलता भी प्रतिशोध की आग
को नियंत्रित नहीं कर पाती। ऐसे में प्रभु
की शरण में जाना ही बेहतर होता है और
विश्व की विराटता में अपने क्षुद्र अस्तित्व को
देखना होता है, मृत्यु की अनिवार्यता पर विचार
करना और समय की गतिशीलता के बारे में भी
सोचना होता है। क्षमाशीलता का अभ्यास करते रहना
चाहिए। अभ्यास करते रहने से परीक्षा की घड़ी में हम
अपना आपा नहीं खोते हैं। समय बीतने के साथ-साथ उस
क्षण का आवेश ठंडा हो जाता है और हम असहज स्थितियों
से बच जाते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने मन को
नियंत्रण में रखने की कोशिश करें और आवेश को खुद पर
हावी न होने दें।

            जो क्रोध के प्रभाव
में आ जाता है उसका अहित
होना निश्चित है। कभी-कभी जिसे
क्षमा किया जाता है, वह ऐसा आभास
देता लगता है कि उसने तो होशियारी से
क्षमा प्राप्त कर ली। अपना उल्लू सीधा करने
के लिए उसने हमें बेवकूफ बना दिया। ऐसी
मन: स्थिति में नेकी कर कुएं में डाल वाली
कहावत पर घ्यान देना चाहिए। यह सोचना
चाहिए कि चलो हमने तो अपना काम सही
किया। हमें किन्हीं अपेक्षाओं के बगैर क्षमा के
गुण का विकास करना चाहिए। क्षमाशील दिखने
और होने में बहुत फर्क है। क्षमाशील होने में जो पर-
मानंद है, वह अकल्पनीय है। यह वही जानता है, जो
वास्तविक रूप में क्षमाशील है। सात खून माफ नहीं किए
जाते हैं और जो करने की ताकत रखता है, वही क्षमावान
और प्रभु के बहुत नजदीक है।

 

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