मानव का सबसे बडा शत्रु उसका क्रेाध है


         अक्सर दूसरे
व्यक्ति के व्यवहार व
क्रियाकलापों के कारण
ही क्रोध उत्पन्न होता है।
व्यक्ति को अधिकांशत: क्रोध
तब उत्पन्न होता है जब सामने
वाला गलती करता है। क्रोध हमारे
शरीर का सहज रूप से उत्पन्न होने
वाला लक्षण नहीं है। व्यक्ति के सम्मुख
जब दूसरा गलती करता है, अपशब्द बकता
है, कहना नहीं मानता, अवज्ञा करता है तब यह
विकार क्रोध उत्पन्न करता है। जैविक, शारीरिक
दोष, दृष्टिकोण और परिवेशजन्य बदले हुए संस्कारों
से भी क्रोध उत्पन्न हो सकता है।

         क्रोध की अभिव्यक्ति
हमारे अंदर की कुंठा, हिंसा व
द्वेष के कारण भी हो सकती है। व-
र्तमान काल में अपराधों के बढ़ने का
एक प्रमुख कारण भीषण क्रोध ही है। क्रोध
से उत्पन्न हुए अपराधों के औचित्य को सिद्ध
करने के लिए क्रोधी व्यक्ति कुतर्क कर दूसरे को
ही दोषी सिद्ध करता है। एक दोष को दूर करने के
लिए अनेक कुतर्क पेश करता है। क्रोध में व्यक्ति आपा
खो देता है। क्रोध में अंतत: बुद्धि निस्तेज हो जाती है और
विवेक नष्ट हो जाता है। क्रोध का विकराल रूप जुनून है।
आदमी पर जुनून सवार होने पर वह जघन्य से जघन्य
अपराध कर बैठता है। जुनून की हालत में उसे मानवीय
गुणों का न बोध रह पाता है और न ही ज्ञान। क्रोध मा-
नव का सबसे बड़ा शत्रु है, बहुत बड़ा अभिशाप है।
शारीरिक रूप से क्रोध से व्यक्ति व्यथित हो उठता
है। स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, पाच-
न शक्ति क्षीण हो जाती है, रोग प्रतिरोधात्मक
शक्ति कमजोर होने से शरीर रोगी हो जाता है।
क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति
विभ्रमित होती है और स्मृति के विभ्रम से बुद्धि
नष्ट हो जाती है। इसलिए व्यक्ति को क्रोध उत्पन्न
नहीं होने देना चाहिए। यह सही है कि दूसरे के क्रियाक-
लापों से क्रोध उत्पन्न होता है, लेकिन क्रोध के आवेग को
रोकने का तो हम प्रयत्‍‌न कर ही सकते हैं। कहते हैं कि क्रोध
आने पर एक गिलास ठंडा पानी पीने से क्रोध की अग्नि शांत हो
जाती है। दूसरे उपाय के अनुसार उल्टी गिनती गिनने से मस्तिष्क
को अधिक व्यस्त रखने के कारण भी क्रोध शांत होता जाता है। इसके
साथ ही एकांत में जाकर ध्यान के माध्यम से क्रोध के विकारों को नष्ट
करने का प्रयास करें तो ऋणात्मक ऊर्जा को मोड़कर हम सकारात्मक
ऊर्जा से विवेक सम्मत निर्णय लेने में सक्षम हो सकते हैं।

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