गुरु पर भरोसा की संस्कृति


 

       हमारी संस्कृति में
हमेशा से गुरु-शिष्य के
संबंध को बहुत अहम माना
गया है। आध्यात्मिक पथ पर
ऐसा क्या ख़ास है कि साधक को
एक अनुभवी या आत्मज्ञानी गुरु की
ज़रूरत होती है? और क्या एक साधक
को अपने गुरु के ऊपर पूरा भरोसा होना
जरुरी है? अगर हां तो क्यों? आइये जानते हैं-

                 आप कहते हैं कि
हमें किसी चीज पर यूं ही यकीन
नहीं कर लेना चाहिए, बल्कि खुद ही
जीवन के साथ प्रयोग करके देखना चाहिए।
लेकिन ऐसा लगता है कि आध्यात्मिक विकास
के लिए गुरु में जबर्दस्त भरोसा रखना जरूरी है।
फिर विश्वास और भरोसे में क्या अंतर है?

               इस सम्बनन्द में हमारे
महान लोग कहते हैं कि जब लोग
भरोसे की बात करते थे, तो उनका
मतलब होता था कि आप किसी और को
अपने अंदर प्रवेश करने दें। अगर आपको
किसी और को अपने अंदर प्रवेश करने देना
है, तो आपको ऐसा बनना होगा कि वह आपको
भेद सके। एक बार वह उर्जा आपके अंदर प्रवेश कर
ले, तो आपके साथ कुछ भी किया जा सकता है।विश्वास
आपकी उम्मीदों से पैदा होता है। जब आप कहते हैं, ‘मैं आप
पर विश्वास करता हूं, तो आप उम्मीद करते हैं कि मैं आपकी
सही-गलत की समझ के मुताबिक काम करूंगा।

            मान लीजिए कि मैं
कुछ ऐसा करता हूं जो सही
और गलत के आपके दायरे के
भीतर नहीं आता, तो पहली चीज
यह होगी कि आप मेरे पास आ कर
कहेंगे, ‘मैंने आपका विश्वास किया और
अब आपने मेरे साथ ऐसा किया। अगर आ-
पके गुरु को आपकी सीमाओं के भीतर कैद
किया जा सकता हो, तो बेहतर है कि आप उस
आदमी के करीब भी न फटकें क्योंकि वह आपकी
कोई मदद नहीं कर सकता। वह आपको तसल्ली दे
सकता है, आपको दिलासा दे सकता है मगर वह आ-
दमी बंधन है। वह आदमी मुक्ति नहीं है। भरोसा अलग
चीज है।

             भरोसा आपका गुण है।
यह किसी और चीज पर निर्भर
नहीं है, यह आपके अंदर मौजूद
होता है। जब आप कहते हैं, ‘मैं भ-
रोसा करता हूं, तो इसका मतलब है,
‘चाहे आप जो कुछ भी करें, मैं आप पर
भरोसा करता हूं। यह आपकी सीमाओं के
दायरे में नहीं होता है।

          मैंने आपसे कभी मुझ
पर भरोसा करने के लिए नहीं
कहा। मैं लोगों के साथ कभी ‘भरोसा
शब्द का इस्तेमाल नहीं करता क्योंकि
यह शब्द बहुत बुरी तरह भ्रष्ट हो चुका है।
अगर यहां किसी ने कभी भरोसे की बात की
है, तो इसका मकसद आपको अपनी पसंद-नाप-
संद, अपनी सीमाओं के परे ऊपर उठाना है। ‘

          मैं आप पर भरोसा करता हूं
की भावना ही आपको पसंद और ना-
पसंद के इस ढेर से ऊपर उठा देती है।
‘चाहे आप कुछ भी करें, मैं आप पर भरोसा
करता हूं। अगर आप वाकई एक गुरु की मौ-
जूदगी का फायदा उठाना चाहते हैं, तो आपको
इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि वह मौजू-
दगी आपको वश में कर ले, अभिभूत कर दे, एक
तरीके से आपके अस्तित्व को ध्वस्त कर दे। कम
से कम उन चंद पलों में, जब आप उसके साथ होते हैं,
आपको अपना अस्तित्व भूल जाना चाहिए। आप खुद
को जो भी समझते हैं, वह उसकी मौजूदगी में गायब हो
जाना चाहिए।

   खुद को संवेदनशील बनाना
                    जब लोग भरोसे की
बात करते थे, तो उनका मतलब
होता था कि आप किसी और को अपने
अंदर प्रवेश करने दें। अगर आपको किसी
और को अपने अंदर प्रवेश करने देना है, तो
आपको ऐसा बनना होगा कि वह आपको भेद
सके। एक बार वह (उर्जा के रूप में) आपके अंदर
प्रवेश कर ले, तो आपके साथ कुछ भी किया जा स-
कता है। आपने दीवारें इसलिए खड़ी की हैं क्योंकि
कहीं न कहीं जब आपने खुद को संवेदनशील बनाया,
तो किसी ने कुछ ऐसा किया जो आपकी उम्मीदों के मुता-
बिक नहीं था। इसलिए आप डर गए और आप हमेशा अपना
बचाव करने लगे। अब, जब आप कहते हैं, ‘मैं आप पर भरोसा
करता हूं, तो आप उस दीवार को गिराना चाहते हैं। इसका मतलब
है कि सामने वाले इंसान को आपकी उम्मीदों के ढांचे के भीतर रहने
की जरूरत नहीं है।

           इस तरह से भरोसा
करने के दो पहलू हैं – एक
पहलू है गुरु की मौजूदगी। गुरु
के निकट होने भर से आपमें बदलाव
आने लगता है। दूसरा पहलू है – अगर
आप इस बात से बेपरवाह हो जाते हैं कि
आपके साथ क्या होगा, तो वह अपने आप
में रूपांतरण है।

                 लोगों के साथ मैं एक
सीमित समय तक ही काम कर
सकता हूँ। इसलिए मैं सिर्फ एक मौ-
जूदगी के रूप में खुद को उपलब्ध बना
रहा हूं, एक व्यक्ति के रूप में नहीं। एक
व्यक्ति के रूप में मैं बस एक खास चेहरा
बरकरार रखता हूं जो कई रूपों में आपकी
उम्मीदों के ढांचे के भीतर होता है। अगर मुझे
अपने व्यक्ति को एक उपकरण के रूप में भी
इस्तेमाल करना हो, तो इसके लिए बहुत ज्यादा
भरोसे और शायद ज्यादा समय की जरूरत होती है।
जो लोग लंबे समय तक मेरे साथ रहते हैं, वे मुझे एक
मुश्किल इंसान पाते हैं।

जागरूकता से बनाया गया व्यक्तित्व-
                    जिसे आप गुरु कहते हैं,
वह कोई इंसान नहीं है। आत्मज्ञान
की पूरी प्रक्रिया का यह मतलब है कि
कोई अपनी शख्सियत से परे चला गया
है और वह सावधानी से एक शख्सियत या
व्यक्तित्व तैयार करता है, जो उस तरह की भू-
मिका के लिए जरूरी हो, जिसे वह निभाना चाहता
है।फिलहाल, जिस शख्सियत को आप ‘मैं खुद कहते
हैं, वह एक संयोग से बना है। यह इस बात पर निर्भर
करता है कि आपने किन हालातों का सामना किया है।
आपकी शख्सियत लगातार विकसित हो रही है, जो जीवन
के थपेड़ों से बनती है। जीवन आप पर जिस रूप में भी
आघात करता है, आप उस तरह का रूप और आकार
अपना लेते हैं। आपकी शख्सियत लगातार बाहरी
हालातों से बनाई जाती है।

                    जिसे आप गुरु कहते हैं,
वह कोई इंसान नहीं है। आत्मज्ञान
की पूरी प्रक्रिया का यह मतलब है कि
कोई अपनी शख्सियत से परे चला गया
है और वह सावधानी से एक शख्सियत या
व्यक्तित्व तैयार करता है, जो उस तरह की
भूमिका के लिए जरूरी हो, जिसे वह निभाना
चाहता है।

                   एक सीमित तरीके
से आप भी अपनी शख्सियत
इस तरह गढ़ रहे हैं, जो आपके
कामों के लिए उपयुक्त होती है। जो
प्राणी सीमाओं से परे जाकर खुद का
अनुभव कर रहा है, वह ऐसा बहुत गहरे
रूप में करता है। वह अपने जीवन के हर
पहलू को इस तरह बनाता है जो उसकी चुनी
हुई भूमिका के लिए जरूरी हो। यह पूरी जागरू-
कता में गढ़ी जाती है। जब कोई ढांचा जागरूकता
के साथ तैयार किया जाता है, तो वह सिर्फ एक उप-
करण या साधन होता है, वह बंधन नहीं रह जाता। वह
किसी भी पल उसे गिरा सकता है। अभी भी, मैं एक इंसान
के रूप में अलग-अलग जगहों पर बहुत अलग-अलग
तरीके से काम करता हूं। अगर आप दूसरी तरह के
हालातों में मुझे देखें, तो आप हैरान हो जाएंगे। आप
एक तरह के इंसान को जानते हैं और उससे अच्छे
से वाकिफ हैं, इसलिए जब आप उसे किसी दूसरी
तरह से बर्ताव करते देखते हैं, तो उसे समझ
नहीं पाते।

         एक गुरु अपनी शख्सियत
को इस तरह से तैयार करता है कि
लोग समझ नहीं पाते कि उसे प्यार करें
या उससे नफरत करें। वह सावधानी से एक
शख्सियत गढ़ता है, जहां एक पल आप सोचते
हैं, ‘हां, मुझे वाकई इस आदमी से प्रेम है। अगले
ही पल आप उसके बारे में बिल्कुल अलग महसूस
कर सकते हैं। इन दोनों भावनाओं को कुछ रेखाएं
पार करने की इजाजत नहीं होती। उन रेखाओं के
भीतर, आप पर लगातार आघात किया जाता है कि
कुछ समय के बाद आपको पता चल जाएगा कि यह
कोई व्यक्ति नहीं है। यह कोई इंसान नहीं है। या तो वह
शैतान है या भगवान।

             अंतिम लक्ष्य तक का
सफऱ- अपनी ऊर्जा को आज्ञा
चक्र में ले जाने के कई तरीके हैं।
मगर आज्ञा से सहस्रार तक जाने के
लिए कोई एक तरीका नहीं है। अगर आ-
पको यह छलांग लगानी है, तो आपको गहरे
भरोसे की जरूरत है वरना यह संभव नहीं है।
जो आपके अनुभव में नहीं होता, वह आपको
बौद्धिक रूप में नहीं सिखाया जा सकता। किसी
व्यक्ति को अनुभव के एक आयाम से दूसरे आयाम
तक ले जाने के लिए, आपको एक ऐसे साधन की
जरूरत होती है जो तीव्रता और ऊर्जा के एक उच्च
स्तर पर हो। उसी साधन या उपकरण को हम गुरु
कहते हैं। गुरु-शिष्य का रिश्ता एक ऊर्जा के आधार
पर होता है।

                एक गुरु आपको
ऐसे आयाम में स्पर्श करता
है, जहां कोई और आपको स्पर्श
नहीं कर सकता। अपनी ऊर्जा को
आज्ञा चक्र में ले जाने के कई तरीके
हैं। मगर आज्ञा से सहस्रार तक जाने के
लिए कुछ भी करने का कोई एक तरीका
नहीं है। वह बस एक छलांग है। इसी वजह से
गुरु-शिष्य रिश्ते को इस संस्कृति में सबसे पवित्र
रिश्ता माना गया है। अगर आपको यह छलांग
लगानी है, तो आपको गहरे भरोसे की जरूरत
है वरना यह संभव नहीं है।

 

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