पिता का स्थान-1


           मॉ घर का मंगल है
तो पिता घर का स्तित्व होता
है।क्या इसे हमने  कभी सच से
कभी समझा है?पिता का महत्व
होने के वावजूद भी इसे अधिक न
तो अधिक बोला जाता है  और  न
लिखा जाता है ।  संत  महॉत्मा,देवी
-देवता, विद्वान,अध्यापक सभी बस
मॉ का ही गुंण-गान का करते है कि मॉ
बच्चे की प्रथम पाठशाला है,घर की शान
है आदि….कुछ  लेखकों  ने तो पिता   का
चित्रण गुस्सेल,व्यसनी,मार-पीट करने वाला
आदि रूपों में किया है।अच्छे पिताओं के बारे
में कुछ नहीं लिखा जाता है ।हमेशा पुरुष को
भावना शून्य या पत्थर दिल समझा जाता है।
मॉ के पास आंसू है तो पिता के पास संयम।
मॉ रो धोकर तनाव मुक्त हो जाती है लेकिन
सॉत्वना हमेशा पिता ही देता है,यह न भूलेंकि
रोने वाले से अधिक तनाव सॉत्वना देने वाले
को होता है ।रोज का खाना बनाने वाली मॉ
याद रहती है लेकिन जीवन भर खाने की
व्यवस्था करने वाले बाप को हम भूल
जाते हैं । मॉ रोती है    बाप नहीं रो
सकता,खुद का पिता मर जाय,
फिर भी नहीं रो सकता,क्योंकि
छोटे भाइयों को संभालना है।
मॉ की मृत्यु हो जाय तो
भी वह नहीं रो सकता,
क्योंकि बहिनों को
सहारा देना होता
है।पत्नी साथ
छोड जाय
फिर भी
नहीं
रो  सकता,
क्योंकि  बच्चों
को सॉत्वना  देनी
होती है ।देवकी-यशोदा
की तो तारीफ की जानी
चाहिए मगर बाढ  में  सिर
पर टोकरे में कृष्ण को रखकर
लेजाने वाले वसुदेव को नहीं भूलना
चाहिए ।राम भले ही कौशल्या का पुत्र
हो लेकिन वियोग में तडफ कर जान देने
वाले दशरथ ही थे।आय न होने के वावजूद
बेटे-बेटी को मेडिकल कालेज में इंजीनियरिंग
में प्रवेश करवाता है .. कैसे भी अपना एडजेस्ट
करके बेटे को हर माह पैसे भेजता है –  वही वेटा
पैसा आने पर दोस्तों को पार्टी देता है..पिता तो
घर का स्तित्व होता है,क्योंकि जिस घर में पिता
होता है उस घर पर कोई भी बुरी नजर से    नहीं
देखते ।पिता घर की मर्यादा का खयाल रखता है।
किसी भी परीक्षा के परिणाम आने पर मॉ हमें
प्रिय लगती है,क्योंकि वह तारीफ करती है,
पुचकारती है,हमारा गुंण-गान करती है ,
लेकिन चुप-चाप जाकर मिठाई का
पैकेट लाने वाला पिता ही है ।
पहली बार मॉ बनने पर
स्त्री की खातिरदारी की
जातीहै,यह स्वाभाविक
भी है-लेकिन स्पताल
में बेचैनी से  घूमने
वाला ,ब्लड   ग्रुप
की जॉच,दवाइयों
के लिए भाग-दौड
करने वाले पिता
को नदरंदाज
किया जाता
है ।यदि
कभी
ठोकर लगे
या हल्का  सा
जले तो ओह  मॉ
शब्द मुंह से निकलता
है अर्थात छोटी मुसीबतों
के लिए मॉ  शब्द  मुंह    से
निकलता है जबकि बडे संकटों
के लिए बाप याद आता है।जवान
बेटा रात में देर से घर आता हैतो
बाप ही दरवाजा खोलता है।बाप ही
बेटे कीनौकरी केलिए एरो-गैरो के
सामने गिडगिडाता है तो बेटी
की शादी के लिए पत्रिका लिए
दूर-दूर तक घूमता जाता
है। कभी घर की बात
बाहर न जाने पॉय
इसके लिए तनाव
सहता   हुआ
बाप वास्तव
में कितना
महॉन है ।

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