चरित्र एक ज्योति है-6


1-चरित्र निर्मॉण-

           चरित्र तो एक ज्योति है,जो सूर्यास्त हो जाने और सभी
के बुझ जाने पर भी आलोकित होती रहती है। चरित्र एक शक्ति
है,जिसके द्वारा हम हारते हुये युद्धों को भी जीत में परिणित कर
सकते हैं।यह मनुष्य में एक दिव्यता है, जिसके सामने सभी नत
मस्तक हो जाते हैं।यह एक उत्प्रेरणॉ है जो कि निर्धनता के बीच भी
चमकती रहती है। यह एक सुदृढ है। लुटेरे सबकुछ लूट सकते हैं मगर
चरित्र को नहीं ।यदि हमने चरित्र के आलावा सबकुछ खो दिया तो वस्तुतः
हमने कुछ भी नहीं खोया। मनुष्य द्वारा निर्मित हर वस्तु को मनुष्य नष्ट
कर सकता है,लेकिन चरित्र को नहीं। चरित्र से हम निर्भयतापूर्वक किसी भी
प्रकार के वर्तमान और भविष्य का सामना कर विजय प्राप्त कर सकते हैं। इसके
अभाव में तो न हमारा कोई वर्तमान है और न भविष्य।

2-शिक्षा का मुख्य उद्देश्य चरित्र निर्मॉण है-

      चरित्र मिर्णॉण शिक्षा का मुख्य मूलभूत उद्देश्य है ।जो लोग अपने
बच्चों को सबकुछ देकर भी चरित्र नहीं दे पाते हैं,वे मानो रोटी की जगह
मिट्टी दे रहे हैं। वैसे तो मनुष्य अपना चरित्र स्वयं बना सकता है,लेकिन उसके
निर्मॉण के बाद खो भी सकता है। इसलिए इस जीवन के लिए स्वॉस लेने के समान,
अपने चरित्र की निरन्तर देखभाल करने की आवश्यकता होती है। किसी भी देश की शक्ति
की नींव, उसका चरित्र है।

3-चरित्र हीन एक दरिद्रता का नाम है-

      चरित्रहीन वह दरिद्रता है,जिससे अधिक बुरा कुछ भी नहीं है।
एक सामान्य व्यक्ति को संसार के संकटों के   निवारण में  कठिनाई
हो सकती है, मगर यदि उसने अपने चरित्र की देखभाल की है,और इसमें
दूसरों की भी सहायता की है तो,अपने कर्तव्यों की पूर्ति पर स न्तोष करते हुए
अन्य सभी चीजों की चिन्ता छोड सकता है।

4-चरित्र जीवन यापन के लिए आवश्यक है-

      हमें अपने जवन यापन के लिए अच्छे चरित्र की आवश्यकता
होती है, क्योंकि हमारे जीवन में व्यक्तिगत,सामाजिक,राष्टीय व
अन्तर्राष्टीय स्तरों पर विना अच्छे चरित्र के समस्याओं का समाधान
हो ही नहीं सकता। यदि हमारे पास अच्छा चरित्र न हो,तो हमारी शक्तियों
की अपेक्षा दुर्वलताएं ही प्रभावी होंगी,और फिर सौभाग्य की तुलना में दुर्भाग्य
अधिक प्रबल होगा। हमारे जीवन में लुख-शॉति की जगह शोक-विषाद अधिक होगा।

5-चरित्र हीनता से नकारात्मकता सबल होंगे-

        अगर हमारा चरित्र अच्छा नहीं है तो हमारे मित्रों की अपेक्षा शत्रु
अधिक सबल होंगे।शॉति की अपेक्षा चुद्ध अधिक होंगे,हमारी रेलगाडियॉ
समय से नहीं चलेंगी,कारखाने क्षमता के अनुरूप उत्पादन नहीं करेंगे,खेतों
में कम उत्पादन होगा,हमारे मनदिर व्यावसायिक केन्द्र बन जायेंगे,ऐसे कार्यों
को हम टालते जायेंगे जो हमें पूर्ण बनाते हैं। हमारे बॉध बाढ को नहीं रोक सकेंगे,
हमारे पुल बह जायेंगे,हमारे राजमार्ग जगह-जगह नष्ट हो जायेंगे,हमारे नेता अपने
नेत्रृत्व की खरीद-फरोक्त करेंगे,राजनीतिक दलों में फूट होगी,पुरोहित दुकानदारों के समान
होंगे और व्यवसायी हर एक का गला काटने में आनन्द का अनुभव करेंगे,अपराध बढेंगे,असुरक्षित
स्थानों का बाहुल्य होगा,संस्कृकि कामुकता की पर्याय बन जायेगी,लडाई झगडे बढेंगे। अच्छे चरित्र के
अभाव में हम निर्लज्जापूर्वक दूसरों की रोचियों पर पलते रहेंगे,हमारा ज्ञान मनुष्य की बर्वादी के लिए
काम करेगा,हमारे चेहरे की चमक,नेकत्रों का तेज,ह्दय की आशा,मन का विश्वास,आत्मा का आनन्द
सब चले जायेंगे।

6-चतुर आत्मघाती मनुष्य-

           आज हर मनुष्य चतुर बनने की कोशिष करता है, अलग-अलग
छेत्र हैं चतुराई दिखाने के, लेकिन कुछ तो आत्मघाती चतुर हैं। कुदरत के
द्वारा मनुष्य को भोजन देने में कोई कमी कसर नहीं की है,मगर कुछ मनुष्य
उसे अंधेरे कोने में छिपाकर मनुष्य को ही देने से वंचित कर देते हैं,इसलिए कि वह
धन कमाना चाहता है,यह मानवीय आचरण नहीं है। उसे यह पता नहीं है कि एक दिन
वह अपनी सारी दौलत को बैंको में छोडकर एक कीट के समान मर जायेगा। ये कुदरत खाद्य
पदार्थों में मिलावट नहीं करती है,लेकिन मनुष्य को देखो, स्वयं अपने बच्चों,और अन्य लोगों को
खिलाने के लिए पहले भोजन में मिलावट कर लेता है। गाय को ही देखो कितनी उदार दिल की है,हमें
शुद्ध दूध देती है,लेकिन मनुष्य है कि किसी को शुद्ध दूध पीने को नहीं देता। कुदरत के बने खनिज तथा
रसायन विध्वँशकारी अस्त्रों का निर्मॉण नहीं करता, लेकिन मनुष्य को देखो उसने इनकी परस्पर सॉठ-गॉठ
करके विध्वंशकारी अस्त्र बना दिये हैं। इस आसमान ने कभी मनुष्य के सिर पर बम नहीं फेंका, पर मनुष्य
को देखो अपनी बुद्धिमता से उस आसमान से अपने ही भाइयों के ऊपर बम फेंकता है,और सोचता है कि मैने
विजय प्राप्त कर ली। कुदरत ने पृथ्वी के समस्त मनुष्यों को पृथ्वी पर पर्याप्त भूमि और संसाधन प्रदान किये
हैं,लेकिन मनुष्य को देखो, उसने दूसरे मनुष्य को वंचित कर,उसे निर्धन बना दिया है। अगर देखें तो मनुष्य
इस धरती पर परमात्मा का एक अभिन्न अंग है,लेकिन अपने एन कृत्यों से वह कितना सीमित हो गया है।

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