जिंदगी के मायने क्या हैं?


 

          आप अपनी जिंदगी
किस तरह जीना चाहते हैं?
यह तय करना जरूरी है। आखि-
रकार जिंदगी है आपकी। यकीनन,
आप जवाब देंगे-जिंदगी को अच्छी तरह
जीने की तमन्ना है।

          यह भाव, ऐसी इच्छा
इस तरह का जवाब बताता है
कि आपका मन सकारात्मकता
से परिपूर्ण है, लेकिन यहां एक मह-
त्वपूर्ण प्रश्न उठता है-जिंदगी क्या है,
इसके मायने क्या हैं? इसका यही नि-
ष्कर्ष सामने आया है कि दूसरों के भले
के लिए जो सांसें हमने जी हैं वही जिंदगी
है, पर कोई जीवन अर्थवान कब और कैसे
हो पाता है, यह जानना बेहद आवश्यक है।

           दरअसल, जीवन
एक व्यवस्था है। ऐसी व्यव-
स्था, जो जड़ नहीं चेतन है। स्थिर
नहीं, गतिमान है। इसमें लगातार बदलाव
भी होने हैं। जिंदगी की अपनी एक फिलासफी
है, यानी जीवन-दर्शन। सनातन सत्य के कुछ
सूत्र, जो बताते हैं कि जीवन की अर्थवत्ता किन
बातों में है। ये सूत्र हमारी जड़ों में हैं। जीवन के
मंत्र ऋचाओं से लेकर संगीत के नाद तक समाहित
हैं। हम इन्हें कई बार समझ लेते हैं, ग्रहण कर पाते हैं
तो कहीं-कहीं भटक जाते हैं और जब-जब ऐसा होता है,
जिंदगी की खूबसूरती गुमशुदा हो जाती है। हम केवल घर
को ही देखते रहेंगे तो बहुत पिछड़ जाएंगे और केवल बाहर
को देखते रहेंगे तो टूट जाएंगे। मकान की नींव देखे बगैर मंजिलें
बना लेना खतरनाक है, पर अगर नींव मजबूत है और फिर मंजिल
नहीं बनाते तो अकर्मण्यता है। केवल अपना उपकार ही नहीं परोपकार
भी करना है। अपने लिए नहीं दूसरों के लिए भी जीना है। यह हमारा दा-
यित्व भी है और ऋण भी, जो हमें समाज और अपनी मातृभूमि को चुकाना
है।

          परशुराम ने यही
बात भगवान कृष्ण को
सुदर्शन चक्र देते हुए कही
थी कि वासुदेव कृष्ण, तुम बहुत
माखन खा चुके, बहुत लीलाएं कर
चुके, बहुत बांसुरी बजा चुके, अब वह
करो जिसके लिए तुम धरती पर आए हो।
परशुराम के ये शब्द जीवन की अपेक्षा को न
केवल उद्घाटित करते हैं, बल्कि जीवन की सच्चा-
इयों को परत-दर-परत खोलकर रख देते हैं। हम
चिंतन के हर मोड़ पर कई भ्रम पाल लेते हैं। प्रतिक्षण
और हर अवसर का महत्व जिसने भी नजरअंदाज किया,
उसने उपलब्धि को दूर कर दिया। नियति एक बार एक ही
क्षण देती है और दूसरा क्षण देने से पहले उसे वापस ले लेती
है। याद रखें, वर्तमान भविष्य से नहीं अतीत से बनता है।

 

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