वॉणी गन्दी है तो मन भी गन्दा होता है–10


1-जिसकी वॉणीं गन्दी होती है उसका मन भी गन्दा होता है-

कभी भी अपने मुख से ऎसे शब्द न निकालें
जो किसी के दिल को दुखाये और किसी का अहित करे।
इस प्रकार की कडवी और अहितकारी वांणी सत्य को बचा
नहीं सकती और उसमें सत्य का स्वरूप कुत्सित और भयानक
हो जाता है जो कि किसी को भी स्वीकार्य नहीं हो सकता ।ध्यान
रखें जिसकी जबान गंदी होती है उसका मन भी गंदा होता है ।इसलिए
पवित्र मन के लिए अच्छी वॉणी बोलिए ।

2- दिव्य प्रेम का नशा-

जब किसी को भगवान के दिव्य प्रेम का नशा चढ
जाता है,तो तब उसके कौन पिता कौन माता या कौन पत्नी ?
तब उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता है । वह तो सभी
ऋणों से मुक्त हो जाता है ।इस अवस्था में मनुष्य जगत को भूल जाता है ।
अपनी देह,जो सब को प्रिय होती है उस देह को भी भूल जाता है ।।

3-सिर्फ अज्ञान है-

न पाप है, न पुण्य है,
सिर्फ अज्ञान है। अद्वैत की
उपलव्धि से यह अज्ञान मिट जाता है ।।

4-आत्मा के जीवन में ही आनन्द है-

यदि आत्मा के जीवन में मुझे आनन्द
नहीं मिलता,तो क्या मैं इन्द्रियों के जीवन में
आनन्द पा सकूंगा ? अगर मुझे अमृत नहीं मिलता तो
क्या में गढ्ढे के पानी से प्यास बुझाऊं ? चातक तो सिर्फ
बादलों के पानी से ही पानी पीता है और ऊंचा उडता हुआ चिल्लाता
है,शुद्ध पानी ! शुद्ध पानी ! कोई आंधी या तूफान उसके पंखों को डिगा नहीं
पाते और न उसे धरती के पानी को पीने के लिए बाध्य कर पाते हैं ।।

5-तर्क से सत्य की पहचान-

जब तर्क से बुद्धि सत्य को जान लेती है,
तब भावनाओं के स्रोत ह्दय द्वारा अनुभूत होता है।
इस प्रकार बुद्धि और भावना दोनों एक ही क्षण में आलोकिक
हो उठते हैं, और तभी उपनिषद में कहा गया है कि ह्दय ग्रन्थि खुल
जाती है ,फिर सारे संशय मिट जाते हैं ।।

6-संसार के दुःख-

ऊंट को कंटीली घास प्रिय होती है,
उसके मुंह में कॉटे चुभते हैं खून निकलता
है,लेकिन वह फिर भी उस घास को खाना बन्द
नहीं करता है,खाते ही रहता है, उसी प्रकार संसारके
लोगों को इस संसार में इतना अधिक कष्ट होने पर
भी उनमें लिप्त रहते हैं,कुछ दिनों में वह सब भूलकर ज्यों
के त्यों हो जातेहैं ।

7-मन दूध और संसार जल के समान है-

ये मन दूध और संसार जल के समान है ।
यदि हम मन को संसार में लगाये रखोगे तो
दूध जल के साथ मिल जायेगा । इसीलिए लोग
दूध को एकान्त में रखकर उसका दही जमाते हैं और
फिर उसे मक्खन निकालते हैं । इसी प्रकार हम एकान्त
में साधना करते हुए मन रूपी दूध में से ज्ञान और भक्ति
का मक्खन निकाल सकते हैं । फिर वह मक्खन संसार रूपी
जल में आसानी से रखा जा सकता है ।उसके बाद तो वह संसार
में मिल नहीं पायेगा ।ये मन संसार रूपी जल से निर्लिप्त रहकर
उसके ऊपर तैरता रहेगा ।।

8-संसार दूध और जल का मिश्रण है–

यह संसार जल और दूध के
मिश्रण जैसा है । उसमें ईश्वरीय
आनन्द और विषय दोनों हैं।तुम हंस
बनकर दूध –दूध पी लो और पानी छोढ दो ।।

9-पत्ती की तरह बने रहो-

इस संसार में पत्ती की तरह बने रहो,
जब आंधी आती है तो आंधी जहॉ ले जाती
है वहीं वह जाती है । कभी किसी के घर के
भीतर तो कभी कूडे के ढेर पर, कभी अच्छी जगह
तो कभी बुरी जगह, यही जीवन है ।।

10-दुर्जनों से अपनी रक्षा करें–

इस संसार में दुर्जनों से अपनी रक्षा
करना आवश्यक है,वरना वे आपको जीने
नहीं देंगे ।इसके लिए आप तमोगुणों का
प्रदर्शन करें,लेकिन सिर्फ प्रदर्शन, लेकिन इस
बात को ध्यान में रखना होगा कि उसे कोई हानि
न पहुंचे ।।

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