पूर्णता हमारा स्वभाव व अधिकार है-3


1-पूर्णता हमारा स्वभाव व अधिकार है-

जिस प्रकार किसान को अपने खेतों में पानी की
सिंचाई के लिए कहीं से पानी लाने की आवश्यकता
नहीं होती है, बल्कि खेत के किनारे ही तालाबब या नहर
में पानी है, बीच में एक बॉध होने के कारण खेत में पानी नहीं
आ पा रहा है। बस किसान उस बॉध को खोल भर देता है, फिर पानी
गुरुत्व बल के नियमानुसार अपने आप खेत में आ जाता है। ठीक उसी प्रकार
सभी व्यक्तियों में सभी प्रकार की उन्नति और शक्ति पहले ही से निहित है। पूर्णता
ही मनुष्य का स्वभाव है, लेकिन उसके द्वार अभी बन्द हैं। उसे यथार्थ रास्ता नहीं
मिल पा रहा है,बीच में एक बाधा है, कोई अगर उस बाधा को दूर कर दे तो वह
विद्यमान पहले की शक्तियों को प्राप्त कर लेता है, और जिन्हैं पापी कहते हैं वे
भी साधु में बदल जाते हैं, यह प्रकृति तो हमें पूर्णता की ओर ले जाती है,
धार्मिक होने के लिए साधनाएं और प्रयत्न हैं बस वे ही तो इस बाधा को
दूर करते हैं, जिससे पूर्णता के द्वार खुल जाते हैं। जो कि हमारा
जन्मसिद्ध अधिकार और हमारा स्वभाव भी है ।

2-कर्मवाद और आत्मा-

कर्मवाद में हमें उपने-अपने भले-बुरे कर्मों का फल भोगना होता है।
लेकिन देखने वाली बात यह है कि क्या शुभ-अशुभ कर्म आत्मा पर प्रभाव
डाल सकते हैं अगर डालते हैं तो आत्मा का स्वरूप क्या है जो इस तरह प्रभावित
हो जाती है। वास्तव में अशुभ कर्म मनुष्य के अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति में बाधा
डालते हैं, और शुभ कर्म उन बाधाओं को दूर करते हैं। स्वयं मनुष्य में कोई परिवर्तन
नहीं होता । तुम चाहे जो करो। तुम्हारे अपने स्वरूप को कोई भी नष्ट नहीं कर सकता।
आपका असली स्वरूप आपकी आत्मा है।कोई भी वस्तु उस आत्मा पर प्रभाव नहीं डाल
सकती।उससे सिर्फ आत्मा पर एक आवरण जैस,पड जाता है,जिससे आत्मा पूर्णतः ढक
जाती है।

3-जीवन का रहस्य –

अगर आप जीवन को समझने की कोशिस
करते हैं तो समझ में नहीं आयेगा, समझने की 
बात भूल जाओ, जीवन तो एक रहस्य है,यही जीवन
का अर्थ है ।बस सिर्फ जिओ इससे ही सब समझ में आ
जायेगा।जीवन के बारे में समझ में आने से संपूर्णता का वोध 
होता है, लेकिन इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है, 
इसलिए जीवन को रहस्य कहते हैं। बस इतना तो निश्चित है कि 
जीवन को जिया जा सकता है ।उसे  समझा  नहीं जा सकता है ।

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