जीवन के चक्र ग्रहण और त्याग-1


        जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य इसी चक्र में उलझा रहता है
कि ग्रहण और फिर त्याग । ग्रहण करने पर त्याग का प्रश्न उठता है।
जैसे सुख लेकर दुख का त्याग, भोजन ग्रहण कर मल का त्याग ।त्याग
तो अनर्थ की जड का किया जाय,हेय का किया जाय कूडा-कचरा,मल आदि
ये सब हेय पदार्थ हैं ।और इन हेय पदार्थों के त्याग में कोई शर्त नहीं     होती है,
न ही कोई मुहूर्त निकलवाना होता है क्योंकि इनके त्याग के बिना सुख शॉति नहीं
मिल सकती है।त्यागे बिना तो जीवन भी असंभव हो जायेगा। सामान्य रूप से रोग
निवृत्ति के लिए,स्वास्थ्य प्राप्तिके लिए जीवन जीने के लिए और इतना ही नहीं
मरण के लिए भी त्याग की आवश्यकता होती है ।

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