भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1


भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-

      अपने देश में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए यह पहला कदम नहीं हैं!
यह समस्या स्वतंत्रा प्राप्ति के समय से ही है ।लेकिन निसन्देह विकास के साथ-
साथ- भ्रष्टाचार स्थिति भी विक्राल रूप लेती जा रही है।देश में न्यायाधीश या लोकसेवा
आयोगों की सम्मानजनक स्थिति थी, लेकिन वहॉ भी अब अंगुली उठने लगी है। हमारे
इसी तरह के कई प्रश्न सिर उठाकर जबाव चाहती है कि-

 

1-     क्या जन लोकपाल विल के पारित होने से भ्रष्टाचार की समस्या समाप्त हो
जायेगी ? क्योंकि ।कुछ लोग समझते हैं कि सरकारी कर्मचारी जो रिश्वत लेते हैं
वही भ्रष्टाचार है! भ्रष्टाचार तो एक व्यापक स्वरूप है ।इस विल के पारित होने से
क्या अपने काम को कराने के लिए नेताओं, अधिकारियों या कर्णचारियों के जेब में
दिया जाने वाला गुप्त सुविधा शुल्क (रिश्वत) बन्द हो जायेगा ? इसे कौन देख
रहा है,यह कैसे बन्द होगा ?

 

2-    क्या खाद्यानों में मिलावट बन्द हो जायेगा?दूध में मिलावट बन्द हो जायेगा?
निर्माण कार्यों में ठेकेदारों से लिया जाने वाला प्रसन्टेज बन्द हो जायेगा?

 

3-     क्या सरकारी खरीददारी का प्रसन्टेज बन्द हो जायेगा?

 

4-आज अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार का यह स्वरूप एक अधिकार के रूप
में चलन में है। इसी परम्परा से अर्थव्यवस्था चल रही है।

 

5-क्या भ्रष्टाचार के निवारण के लिए स्थापित न्यायिक संस्थानों मे न्याय करने वाले
किसी दूसरे देश से आयेंगे ? नहीं? यहीं के होंगे! तो क्या वे रिस्वत लेने की परिभाषा
नहीं जानते हैं ?

 

5-कहीं ऐसा न हो कि इस लोकपाल विल के पारित होने से रिश्वत की दर चौगुनी हो जायेगी ?

 

6-कई देशों में इस प्रकार के अधिनियम पारित हुये,अपने ही पडोस पाकिस्तान में देखें तो वहॉ
भी समय-समय पर इस तरह के कठोर कानून वने है भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए। जिसमें कि
सफलता नहीं मिली,तो अपने देश के विधि वेत्ताओं ने इस बात को ध्यान में रखा ?

 

6-क्या आजतक भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए कोई कानून नहीं बना है ?

 

1947 (11-3-1947) में भ्रष्टाचार निवारण के लिए एक अधिनियम वनाया गया था, इसमें
पॉच धाराएं थी,इसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भ्रष्टाचार को समाप्त करना । उसमें
संशोधन कर 1952 (28-7-1952) का अधिनियम स्तित्व में आया था ।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 महत्वपूर्ण है ।(9-9-1988)राष्टपति द्वारा अपनी सहमति
प्रदान की गई। इसके बाद समय-समय पर इसकी धाराओं मेंसंशोधन किया जाता रहा है । इस
अधिनियम में-धारा-1,2(क),3 से 31 तक की अलग-अलग धारायें हैं ।
भारतीय दण्ड संहिता की सभी धारायें अपराधों के लिए है,जिसमें कठोर से कठोर सजा की व्यवस्था
है।निवारण के उपाय भी बताये गये हैं ।

अब प्रश्न यह उठता है कि जन लोकपाल विल के पारित होने पर भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा? या
यह भी जैसे पिछले अधिनियमों की भॉति मुंह देखता रहेगा ?  क्या  इसके लिए  एक  नईं  क्रॉति की
आवश्यकता तो नहीं होगी? जो विश्व की महॉन क्रॉतियों में गिना जायेगा? लेकिन यह कब ? लेकिन
इससे पहले सभी लोग प्रचलित लोकपाल को अवश्य देखना चाहेंगे । और उत्तराखण्ड में तो भ्रष्टाचार
अधिनियमपारित किया जा चुका है,कार्य भी चल रहा है, लेकिन आपको कुछ महसूश हो रहा है?कुछ
अन्तर दिखाई दे रहा है आपको ? यदि सरकार से पूछें तो बचाव में बहानाबाजी का उत्तर मिलेंगा ।

उत्तराखण्ड में सरकारी कर्मचारियों के स्थानान्तरण में खासकर शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार का मामला
विक्राल रूप लिये है, नेता जी हर वर्ष मोटी रकम कमा लेते हैं,   निशंक  ने  तो   स्थानान्तरण की पावर
अपने हाथ में रखी थी,बहस शुरू हुई फिर विधानसभा में स्थानतरण नीति का विधेयक  पारित  हुआ,
सुगम- दुर्गम के आधार पर स्थानॉतरण होना है।लेकिन जो आदमी शहर मे रहा है जीवनभर क्या वह
सामान्य आदमी तो होगा नहीं! वह दुर्गम कैसे जा सकता  है,  क्योंकि  एक्ट में  जो  सुगम  में रहा है
उसे दुर्गम में जाना होगा ।उसकी पहुंच मंत्री जी से होगी ही, तो फिर उसे कौन कानून हटायेगा । और
यदि यह नीति लागू होती है तो नेता जी की आय कैसे बढेगी । दो बार सरकार इस नीति को स्थगित
कर चुकी है।

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