जीवन के मूल्य-6


1-अपना सिर ढकने का प्रयास करें

                   सहस्रार की देखभाल करने के लिए
जरूरी है कि आप    सर्दियों में अपना सिर ढकने का
प्रयास करें ताकि मस्तिष्क ठंड से ना जमें क्योंकि मस्तिष्क
मेघा(fat) का बना होता है,इसीप्रकार मस्तिष्क को गर्मी से भी
बचाना चाहिए ।अधिक समय तक धूप में बैठने से मस्तिष्क पिघलता
है और आप एक सनकी मनुष्य  बन जाते हैं ।  और कुछ समय बाद पागल
होने की सम्भावना बन जाती है।यदि आप धूप में बैठे हैं तो अपना सर ढक कर
रखें यह अतिआवश्यक है,लेकिन सिर को कभी-कभी ढकना चाहिए,हमेशा नहीं ।यदि
हमेशा सिर ढकेंगे तो रक्त का संचार सही ढंग से नहीं हो पायेगा ।चॉद के प्रकाश में
भी अधिक समय तक न बैठें,किसी भी चीज में अति न करें ।

2-आज्ञा चक्र खराब होने का कारण आंखें हैं

       मनुष्य को अपनी आंखों का खयाल रखना
चाहिए,    क्योंकि इनका बडा महत्व है, आंखों से ही
आज्ञाचक्र खराब होता है। इसीलिए जीसस खिस्र ने अपना
माथा किसी आदमी के समक्ष झुकाने को मना किया है।अनिधिकृत
गुरु के सामने झुकने या उनके चरणों में अपना माथा टेकने से भी आज्ञाचक्र
खराब हो जाता है।केवल परमेश्वरी अवतार के सामने ही अपना माथा टेकना चाहिए।
अपना माथा किसी भी गलत आदमी या गलत जगह पर किसी भी स्थिति में नहीं झुकाना
चाहिए। सहजयोग में अधिकॉश लोगों का आज्ञाचक्र इसीलिए खराब रहता है,इसका कारण गलत
जगह पर माथा टेकना । आंखों के रोग होने के कारण भी यही है।   आज्ञाचक्र को ठीक रखने के लिए
मनुष्य को हमेशा अच्छे पवित्र ग्रंथ पढने चाहिए।अपवित्र साहित्य नहीं पढने चाहिए,अपवित्र कार्यों के
कारण आंखें खराब हो जाती हैं।अपवित्र या गंदे व्यक्ति को देखकर भी आज्ञाचक्र खराब हो जाता है।आपकी
नजर अपवित्र है तो आपकी आंखों को तखलीफ होती है,आज्ञाचक्र खराब होने का दूसरा कारण मनुष्य की कार्य
पद्धति है,अति कर्मी। अर्थात अति कार्य न करें अति अध्ययन हो या विचार या सिलाई ।जिस समय आप अति
कार्य करते हैं उस समय आप परमात्मा को भूल जाते हैं ।

3-अपने कंधों को अधिक न हिलायें।

        कुछ लोग किसी कार्य में अपने कंधे हिलाते हैं,
संगीत गाते हुये शरीर    का ऊपरी हिस्सा हिला सकते हैं
लेकिन कंधे नहीं हिलाने चाहिए।भजन गाते हुय़ अपनी गर्दन
हिलाते हैं,शरीर हिला सकते है,अच्छी बात है परन्तु कंधे न हिलायें।
जो लोग कंधे हिलाते हैं  ।उन्हैं चैतन्य लहरियों का अहसास नहीं होता है।
क्योंकि उनका यह चक्र ठीक नहीं रहता है,परमचैतन्य का जो भी उपयोग होता
है इन्हीं दो चक्रो के माध्यम से होता है। ध्यान रखें अपने कंधों को ठीक रखें ।

4-मंत्र चक्रों को नहीं खोलते

            कुछ लोग सोचते हैं कि सुबह से शाम
तक मंत्र रटने से    उन्हैं उपलब्धियॉ मिलेंगी,  यह
सोच उपयुक्त नहीं है,कुछ लोगों जोर-जोर से मंत्र बोलने
की आदत होती है यह आदत भी सही नहीं है।चक्रों को खोलने
के लिए तो मंत्र अर्थहीन होते हैं ।यदि आप अपने अहं से सोचते
हैं कि मैं ठीक हूं    तो आप बहुत बडी गलती पर हैं ।आपको अपने
अन्दर पूर्णतःपरिवर्तित करना होगा ।और परिवर्तित हो जाने पर कुछ
लोगों को बहुत अच्छा लगता है,उन्हैं अनुभूति होती है उच्चतम् स्थिति
प्राप्त करने की ।आप जहॉ पर भी हैं आपको यह लक्ष्य प्राप्त करना होगा ।

5-कामक्रिया आवश्यक नहीं है

            कामक्रिया मानव के लिए आवश्यक नहीं
है,पावन मस्तिष्क के लिए प्रलोभन,रोमॉस,    आदि
मूर्खताओं के लिए कोई स्थान नहीं है,   ये तो मानव रचित
धारणॉयें हैं।यह एक आश्चर्य जनक गुलामी है।यह हमारी निकृष्ट
आस्था की देन है। निम्न स्तर के लोगों में इस प्रकार के विचार अधिक
आते हैं और वे उनके गुलाम बन जाते हैं।अपने चित्त को यौन परिपक्व बनाना
होगा ।जब यौन परिपक्व होता है तब आप माता-पिता होते हैं। पावन व्यक्तित्व
बन जाता है। यौन परिपक्व का अर्थ यह नहीं है कि युवाकाल में ही सन्यास लें,
बल्कि आपको इस सम्बंध में परिपक्व होना है,हमारा अमूल्य चित्त ,हमारी
मंगलमयता इस प्रकार की मूर्खता भरी चीजों में नष्ट हो रही है ।श्री गणेश
की पूजा करने के लिँए तो अपने अन्दर गहनता लाना आवश्यक है,यदि
गणेश की पूजा करनी है तो प्राथमिकतायें बदलनीं होंगी,क्योंकि गणेश
का निवास मूलाधार है ।सहजयोग में शादी के बाद मर्यादाओं के साथ
रोमॉस का स्थान है,लेकिन न सहजयोग और न उत्थान की कीमत
पर। इसीलिए कुछ विवाह असफल हो जाते हैं,क्योंकि महॉकाली का
प्रथम गुंण पावनता है पूर्ण पावनता,और उस पावनता को हम यदि
अपने अन्दर आत्मसात नहीं कर सकते हैं तो हम सहजयोगी नहीं हो
सकते हैं ।पत्नी तो वो होती है जो पति को स्थिर करे,अपनी पावनता
में न कि रोमॉटिक जीवन में ।अतः हमें समझना चाहिए कि हमारा लक्ष्य
क्या है,उत्क्रॉति हमारा लक्ष्य है ।यदि सहस्रार विगड गया तो सहजयोग किस
प्रकार कार्यान्वित होगा,सारा खेल ही सहस्रार का है, पावनता की अभिव्यक्ति होनी
चाहिए,आपके माध्यम से हम    विश्व को  परिवर्तित करने वाले हैं, किसी अन्य के
माध्यम से नहीं,सहजयोगी ही वे लोग हैं जो पूरे विश्व को परिवर्तित कर सकते हैं ।।

6-आत्म साक्षात्कारी चिरंजीवी बन जाता है

          सहजयोग में आकर यदि आपको आत्मसाक्षात्कार
प्राप्त हो जाता है तो आप चिरंजीवी बन जाते हैं।  आपके अन्दर
सभी देवी-देवता जागृत हो जाते हैं,उन देवी देवताओं के विरुद्ध आप
कोई कार्य करते हैं तो वे तुरन्त आपको हानि पहुंचाते हैं,आपकी चैतन्य
लहरियॉ समाप्त हो जायेंगी,लेकिन आरम्भ में यह अस्थाई रूप में होता है।
चिरंजीवी हमेशा आपका पथप्रदर्शक और आपकी देखभाल करते हैं ।यदि किसी
रेलगाडी में एक भी आत्मसाक्षात्कारी बैठा हो तो दुर्घटना नहीं हो सकती है,सडक
पर चलने वाले आत्मसाश्क्षात्कारी के सामने कोई दुर्घटना नहीं हो कती है। आप
स्वयं देख सकते हैं कि देवी देवता तो आपके आंतरिक हिस्से में हैं वे आपकी
आत्मा के साथ हैं,जब आप आत्मा से एक रूप हो जाते हैं तो आप निर्लिप्त
हो जाते हैं,तब आपमें स्व की भावना नहीं रहती है ।स्वयं को आप तृतीय
पुरुष की तरह देखने लगते हैं।स्वयं को आप मैं से नहीं जोडते हैं ।

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