जीवन के रहस्य-13


1-क्रिया से ही प्रतिक्रिया होती है-

            प्रकृति की प्रत्येक दृष्टिगोचर होने वाली क्रिया में
हमारा और प्रकृति का योगदान लग- भग आधा-आधा होता
है। अर्थात यदि कोई आदमी मेरे शरीर पर चोट पहुंचाता है तो,
वह उस आदमी की क्रिया और मेरे शरीर की प्रतिक्रिया है।   या
किसी तालाब में तरंगरहित तल पर पत्थर गिरा देने पर, प्रत्येक
पत्थर के गिराने  के बाद एक प्रतिक्रिया होती है।   उस तालाब की
छोटी सी तरंग से पत्थर ढक जाता है।  इसी प्रकार वाह्य वस्तुएं इस
मिली है।यदि आप कभी भी अपनी प्रणॉली को आराम देना चाहते हैं,तो
उसका एक मात्र तरीकायही है। गहरी से गहरी निंद्रा से भी उतना विकास
नहीं मिलेगा। मन प्रगाढतम निंद्रा में उछलता कूदता है।उन कुछ क्षणों में
आपका मष्तिष्क लग-भग रुक जाता है। जीवनशक्ति बनी रहती है,आप
अपने शरीर को विस्तृत कर देते हो।उसमें इतना अनंद मिलता है कि
आपका शरीर हल्का एवं पूर्ण विश्रॉति महशूस करने लगोगे ।।

2-हम लोग दुखी क्यों होते हैं-

       सच तो यह है कि हम लोग जो कुछ भोग करते हैं,वे वासना,इच्छाओं
से ही उत्पन्न होते है।मान लो तुम्हें कुछ चाहिए,    और जब वह पूरा नहीं होता
है,तो उसका फल है दुःख ।और यदि इच्छा न रहे, तो दुःख भी नहीं होगा।वासनाओं,
इच्छाओं से दुख तो हैं मगर जीवन की गरिमा भी है जैसे -दीवार में कोई वासना नहीं है,
वह कभी कोई दुख नहीं भोगती ।,लेकिन वह कभी उन्नति भी तो नहीं करती।इस कुर्सी में
कोई वासना नहीं है तो कोई कष्ट भी नहीं है,लेकिन यह कुर्सी कुर्सी ही रहेगी।अर्थात सुख भोग
और दुख भोग के पीछे एक गरिमा भी है। मैं अपने बारे में कह सकता हूं कि मैने कुछ अच्छा तथा
बहुत सी बुराइयॉ की हैं। मैं प्रशन्न इसलिए हूं कि मैने कुछ अच्छा कार्य किया है और इसलिए भी
प्रशन्न हूं कि मैने गल्तियॉ तो की हैं मगर उनसे शिक्षा प्राप्त की है।और इस समय मैं जो कुछ भी हूं,
वह अपने पूर्व कर्मों और विचारों के फलस्वरूप हूं।प्रत्येक कार्य और विचार का एक न एक फल प्राप्त
हुआ है,  जो कि मेरी उन्नति का प्रतीक है।   इसका अर्थ यह नहीं कि धन-सम्पत्ति न रखें, जो आप
आवश्यक समझते हैं  सब रखें,   उससे अतिरिक्त वस्तुएं भी रखें लेकिन उनसे कोई हानि न हो,यह
पहला कर्तव्य है।सत्य को जान लेना,उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कर लेना ,  यह धन किसी का नहीं है,
किसी भी पदार्थ के प्रति स्वामित्वभाव न रखें।उस प्रभु की ही वस्तुएं हैं,दुख की अनुभूति नहीं होगी ।

3-माया का जाल क्या है-

           नारद ने एक दिन श्रीकृष्ण से पूछा,प्रभो माया कैसी होती है,
मुझे अभी पता नहीं है,मुझे दिखाइय़े माया जाल को । कुछ दिनों बाद
श्री कृष्ण नारद को लेकर एक मरुस्थल की ओर ले गये,बहुत दूर जाने के
बाद श्री कृष्ण नारद से बोले-नारद मुझे प्यास लगी है।क्या कहीं से थोडा जल
ला सकते हो ? नारद बोले,प्रभो ठहरिये मैं अभी जल लिए आता हूं।यह कहकर
नारद चले गये।कुछ दूरी पर गॉव था,नारद वहीं जल की खोज में गये।एक मकान
में जाकर दरवाजा खटखटाया ।द्वार खुला और एक परम सुंदरी कन्या उनके सम्मुख
आकर खडी हो गई ।उसे देखते ही नारद सबकुछ भूल गये ।कि भगवान मेरी प्रतीक्षा कर
रहे होंगे,वे प्यासे होंगे,   हो सकता है,प्यास से उनकी जान निल रही हो-नारद सारी बातें
भूल गये और कन्या के साथ बातों में लीन हो गये ।  उस दिन नारद वापस नहीं लौटे दूसरे
दिन भी वे फिर उस लडकी घर गये और उससे बातचीत की ।धीरे-धीरे बातचीत ने प्रणय का
रूप धारण कर लिया ।।तब नारद उस कन्या के पिता के पास गया और कन्या के साथ विवाह
की अनुमति मॉगने लगे।विवाह हो गया ।दोनों नव दंम्पति उसी गॉव में रहने लगे । धीरे-धीरे
उनकी संतानें भी हुई। बारह वर्ष बीत गये । इस बीच नारद के ससुर भी मर गये और वे उनकी
सम्मत्ति के उत्तराधिकारी बन गये । और बडे चैन से रहने लगे । भूमि,पशु,पुत्र,सम्मपत्ति सब
कुछ उन्हीं का तो है । इतने में उस देश में बाढ आ गई । रात के समय नदी दोनों किनारे तोडकर
बहने लगी और सारा गॉव डूब गया । मकान गिरने लगे, मनुष्य और पशु बह बहकर डूबने लगे,नदी
की धार में सबकुछ बहने लगा।नारद को भी बचने के लिए भागना पडा।एक हाथ से अपनी पत्नी,दूसरे
हाथ से अपने दो बच्चों का हाथ पकडकर और तीसरे बच्चे को कंधे पर रखकर भयंकर बाढ में चल पडे।
कुछ ही दूर जाने के बाद पानी का वेग तीव्र होने लगा।कंधे पर रखा बच्चा गिर पडा और बह गया,उसकी
रक्षा में हाथ से पकडे बच्चे भी छूट गये और बह गये । अपनी पत्नी को थामने के लिए सारी शक्ति लगा
रखी थी अंत में तरंगों के वेग में पत्नी भी उसके हाथ से छूट गई और अब नारद स्वयं कातर स्वर में विलाप
करते हुये तट पर जा गिरे । उसी समय पीछे की ओर से सौम्य वॉणी में सुनाई दिया कि” वत्स जल कहॉ है”?
तुम जल का घडा लेने गये थे न मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में खडा हूं।तुम्हें गये आधा धण्टा बीत चुका है।“आधा घण्टा”?
नारद चिल्ला पडे ।उनके मन में तो बारह वर्ष बीत चुके थे,और आधा घण्टे के भीतर ही ये सब दृश्य उनके मन से
होकर निकल गये,श्री कृष्ण नारद से बोले कि यही तो माया है ।।

4-भिखारी को भीख देते समय उपकार की भावना रखें-

    आप उच्च स्थान पर खडे होकर किसी भिखारी से ऐसा न कहें कि हे भिखारी
आओ यह  पैसे लो ।  बल्कि इस बात के लिए उपकार मानना चाहिए कि तुम्हारे
सामने एक गरीब है,   जिसे दान देकर तुम अपने आप की सहायता कर सकते हो।
पाने वाले का सौभाग्य नहीं है,देने वाले का सौभाग्य है।उसका आभार मानो कि उसने
तुम्हें संसार में अपनी उदारता और दया प्रकट करने का अवसर दिया और इस प्रकार

तुम शुद्ध और पूर्ण बन सके ।।

5-जीवन देने के लिए है वरना प्रकृति दिलायेगी-

         हमें स्मरण रखना होगा कि हमारा पूरा जीवन देने के लिए ही है,
अगर आप नहीं देंगे तो प्रकृति आपको देने के लिए विवश करेगी,   न सही
अपनी खुशी ही दे दो ।हम तो संग्रह करने के लिए ही अपना जीवन समझते हैं
मुठ्ठी बॉधकर बटोरना चाहते हैं लेकिन प्रकृति हमारी गर्दन दबाती है,फिर हमारे हाथ
खुल जाते हैं, हमारी इच्छा हो या न हो,       हमें देना ही पडता है। जैसे ही हम कहते हैं
कि मैं नहीं दूंगा वैसे ही एक घूंसा पडता है और हमें चोट लगने से हम दे देते हैं। इसलिए
हर किसी को देना होता है और अंत में सबको सबकुछ त्यागना ही तो होता है ।।

6-शॉति के लिए स्वयं को भूल जाने का अभ्यास करें-

     यदि आप दूसरों की भलाई करने का अनवरत् प्रयत्न करते रहते हैं
तो आप स्वयं को भूल जाते हैं ।   यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि  यदिसुख-
शॉति से रहना चाहते हो तो दूसरों की भलाई में स्वयं को भूल जाइये जिसे हमें
अपने जीवन में सीखना है ।वरना अपनी मूर्खता से यह सोचने लग जाते है कि वह
अपने को सुखी रखने के लिए यही सोचता है कि क्या करें,कैसे करें ।   वर्षों संघर्ष के
पश्चात अंत में वह यही समझ पाता है कि सच्चा सुख तो स्वार्थ के नाश में है,  दूसरों
के हित करने में है ।  और स्वयं को अपने आपके अतिरिक्त अन्य कोई सुखी नहीं बना
सकता।परोपकार करने में तो आप कुछ देते हैं और यदि आप देते हैं, तो आपको वह चीज
अवश्य मिलेगी जिसे आप चाहते हैं ।।

7-शुद्ध बनना और दूसरों की भलाई ही उपासना है-

      हम जो भी उपासना करते हैं उसमें हमें शुद्ध बनना और दूसरों की भलाई
करना सब उपासनाओं का सार है।जो लोग गरीबों,निर्बलों और पीढितों में शिव
को देखते है,शिव के उपासक वास्तव में वही है,लेकिन जो केवल मूर्ति में ही शिव
को देखता है,तो समझें यह उसकी उपासना का आरम्भ मात्र है ।

8-ज्ञान हमें शिक्षा देता है संसार को त्यगने के लिए-

          जैसे-जैसे हमें ज्ञान प्राप्त होता है और हम ज्ञानी बनते हैं वैसे ही इस
संसार को त्यागने की प्रवल इच्छा होती है,लेकिन इस संसार को त्यागना नहीं
चाहिए यही तो सन्यासी की सच्ची कसौटी है,संसार में रहना लेकिन संसार का न
होना ।सभी धर्मों में इस प्रकार के त्याग की भावना किसी न किसी रूप में है ।क्योंकि
ज्ञान का दावा होता है कि हम सभी को समान भाव से देखें,समत्व का ही दर्शन करें।इसके
लिए पहले हमें देह रूपी कुसंस्कारों को त्यागना होता है, कि हम देह नहीं हैं ।तभी कुसंस्कारों
को त्याग सकेंगे।हम मन नहीं हैं ।इस प्रकार अविद्या का नाश होता है और वास्तविक आत्मा
को जान लेता है।सुःख और दुःख तो केवल इन्द्रियों में है,वे अब हमें स्पर्श नहीं कर सकते हैं।
आत्मा तो सर्वव्यापी है ।ज्ञानी को तो सभी नाम-रूपों से छुटकारा पाना ही होता है,तभी वह
सभी नियमों और शास्त्रों से परे हो सकेगा । सच्चे ज्ञानी के तो कई लक्षण हैं-जैस वह
ज्ञान के अतिक्त और कुछ कामना नहीं करता।सच्चे ज्ञानी की सभी इन्द्रियॉ पूर्ण
नियंत्रण में होती हैं।वह जानता है कि एक व्रह्म को छोडकर सब मिथ्या है।
सच्चे ज्ञानी में मुक्ति की प्रवल इच्छा होती है ।वह तो सभी कर्म फलों
का त्याग करता है ।

9-आज संसार के धर्म प्रॉणहीन हो चुके हैं-

         पूरे विश्व में लगता है सारे धर्म प्रॉणहीन एवं परिहास की वस्तु हो
गये हैं।जगत में चरित्र का अभाव दिखता है।इस संसार को आवश्यकता है
ऐसे जीवन की जिसमें उत्कृष्ट प्रेम तथा निस्वार्थपरता से परिपूर्णता हो ।यही
प्रेम तो प्रत्येक शव्द को वज्रवत् शक्ति प्रदान करेगा ।।

10-एक ही विचार को लेकर चलो-

     अपने जीवन को बनाना है तो एक ही विचार को लेकर अपने
जीवन को बनाओ,    उसी को सोचो,उसी का स्वप्न देखो और उसी
पर अवलंम्बित रहो। अपने मस्तिष्क,मॉशपेशियों,स्नायुओं और शरीर
के प्रत्येक भाग को उसी विचार से ओत- प्रोत होने दो और दूसरे सब
विचारों को अपने से दूर रखो ।यही सफलता का रास्ता है और यही वह
मार्ग है,जिसने महान धार्मिक पुरुषों का निर्मांण किया है।।

11-जीवन में दुख का भाव स्थाई होता है-

       हमने जीवन में महशूस किया कि हम अपने दुखों को दूर करने का
कितना ही प्रयास क्यों न करें लेकिन फिर  भी  जीवन का   अधिकॉश भाग
अवश्य ही दुखपूर्ण रहता है।यह दुख हमारे लिए वास्तव में अनंत है ।आदिकाल
से दुख को दूर करने का प्रयास किया जाता रहा है,   लेकिन जितने ही उपाय हम
अपनाते जाते हैं जगत में और भी दुख के गुप्त भाव विद्यमान दिखाई देते हैं। सभी
धर्मों में दुख चक्र से बाहर निकलने के लिए एक मात्र उपाय है- ईश्वर। और सभी धर्म
यह भी कहते हैं कि यदि इस    संसार में जैसा है उसी रूप में ग्रहण करें तो फिर दुःख के
सिवा कुछ भी नहीं है। और जो लोग ईश्वर को जीवन    का आधार नहीं मानते हैं उन्हैं ये
दुख मुक्ति के लिए आत्महत्या की सलाह देता है कि जीवन का त्याग ही एकमात्र उपाय है।
इस सम्बंध में एक प्राचीन कथा है कि किसी के मुख पर एक मच्छर बैठ गया,उसके मित्र ने
जब यह देखा तो उस मच्छर को मारने के लिए इतने जोर का घूंसा मारा कि मच्छर के साथ
वह मनुष्य भी मर गया । अर्थात दुख के प्रतिकार का उपाय भी मानना होगा ।जीवन और
जगत तो दुखमय है,यह एक ऐसा तथ्य है जिसे जगत को जानने वाला कोई भी व्यक्ति
अस्वीकार नही कर सकता ।।

12-आत्मा का स्वभाव आनंद और अपरिवर्तनीय शॉन्ति है-

        सुख-दुख दोनों जंजीरें हैं सुख सोने की और दुख लोहे की जंजीर है
दोनों हमें बॉधने के लिए दृढ हैं ।  आत्मा तो दुख या सुख नहीं जानती, ये
तो केवल स्स्थितियॉ हैं और स्थितियॉ हमेशा बदलती रहती हैं । आत्मा का
स्वभाव आंनंद और अपरिवर्तनीय शॉति है ।हमें इसे पाना नहीं है वह तो हमें
प्राप्त है।   तो फिर आओ हम अपनी आंखों  से कीचड को धो डालें और उसे देखें।
हमें हमेशा आत्मा में प्रतिष्ठित रहकर पूर्ण शॉति के साथ संसार के दृश्य को देखना
है।यह मात्र शिशु का खेल जैसा है इससे कभी हमें क्षुब्द नहीं होना चाहिए ।  यदि मन
प्रशंसा से प्रसन्न हो तो वह निंदा से दुखी होगा।मन के सभी आनंद क्षणभंगुर हैं,किन्तु
हमारे अंदर एक सच्चा आनंद है जो किसी वाह्य वस्तु पर निर्भर नहीं है,यह आत्मा का
ही तो आनंद है,जिसे संसार धर्म कहता है ।जितना ही अधिक हमारा आनंद हमारे अन्तर
में होगा,उतने ही अधिक हम आध्यात्मिक होंगे।हम आनंद के लिए संसार पर निर्भर न हों,
यह हमें बनना है।जैसे एक बार समुद्र में कुछ दीन महिला मछली पकडने गई,तूफान में फंस
जाने पर एक सम्पन्न    व्यक्ति के बगीचे में शरण पाई,    वहॉ उनके भोजन आदि की सभी
व्यवस्थायें थी, मानों स्वर्ग में हों ।विश्राम करने लिए उपयुक्त जगह में थी लेकिन उन्हैं उन्हैं
लगा जैसे कुछ खो गया है उन्हैं नींद भी नहीं आई,इसलिए सुखी न हो सकी ।अंत में एक स्त्री
उठी और उस स्थान पर गई जहॉ कि वे अपनी मछली की टोकरियॉ छोड आई थी वे उन्हैं जब
वापस लाई, तब उन्हैं चैन की नींद आई । इसलिए यह संसार हमारी मछली की टोकरी न बन
जाय,जिस पर हमें आनंद के लिए निर्भर होना पडे ।

13-योगी एक देह से हूसरी देह में प्रवेश कर उसका संचालन कर सकता है

      अगर कोई योगी एक देह में क्रियाशील रहकर अन्य किसी मृत
देह में प्रवेश  कर  उसे  गतिशील  कर  सकता है ।   इसलिए वे किसी
जीवित शरीर में प्रवेश करके उस व्यक्ति के मन और इन्द्रियों को निरुद्ध
कर सकते हैं,तथा उस समय तक के लिए उस शरीर के माध्यम से कार्य कर
सकते हैं ।यदि वे दूसरे शरीर में प्रवेश करने की इच्छा करें तो उस शरीर में संयम
का प्रयोग करने से ही वह सिद्ध हो जायेगा,क्योंकि उनकी आत्मा ही नहीं बल्कि मन
भी सर्वव्यापी है ।अभी तक वह शरीर के स्नायुओं के माध्य से ही काम कर सकता था,
लेकिन योगी बनने पर अपने इन स्नायुविक प्रवाहों से अपने को मुक्त कर लेते हैं,तब दूसरे
शरीर के द्वारा भी कार्य कर सकते हैं ।

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