जीवन को हम जैसा चाहें, वैसा बना सकते हैं


 

                                   निद्रा का जन्म आलस्य से होता
है और आलस्य जीवन के पतन का मार्ग प्रशस्त करता
है। निद्रा का विज्ञान यह है कि निद्राकाल में जब शरीर की
सारी इंद्रियां काम करना बंद कर देती हैं तो शरीर ऊर्जा का संग्रह
करने लगता है। यह एक प्राकृतिक व्यवस्था है। जो ऊर्जा जाग्रत
अवस्था में खर्च हो जाती है उसे पुन: प्राप्त करने के लिए निद्रा
में जाना आवश्यक है।

                      जितनी ऊर्जा हमारे शरीर
को चाहिए उसके लिए छह घंटे का समय
काफी होता है। जन्मकाल के बाद बच्चा लगभग
23 घंटे सोता है। ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता है, निद्रा कम
होती जाती है। यही कारण है कि आम तौर पर वृद्ध लोग
2 से 3 घंटे से अधिक नहीं सोते। इतने ही समय में उनके
शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा संग्रहीत हो जाती है।

                      जो लोग आलस्य के कारण
अधिक सोते हैं, धीरे-धीरे सोना उनकी आदत
बन जाता है और वे आलसी बन जाते हैं। आलस्य,
नींद और जम्हाई लेना अच्छा लक्षण नहीं माना जाता।
जो लोग साधक होते हैं, उनके लिए आवश्यक है कि वे नींद
के वश में न रहें, क्योंकि नींद साधना की विरोधी है। साधना करते
समय साधक को अगर आलस्य आ जाए, नींद आने लगे, तो साधना
में उतरना संभव नहीं है। हमारा जीवन किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हैं,
उसे उद्देश्यहीन बनाकर अपनी मूल प्रवृत्तियों के वश में होकर इसे नष्ट नहीं
करना है।

                   जीवन की सार्थक भूमिका
यही है कि हम आत्मिक चिंतन करें और
सारी ऊर्जाशक्ति को संग्रहित कर जीवन में
विवेकशक्ति को जाग्रत करें और इसके लिए दूसरों
को भी प्रेरित करें। जो शरीर साधना के मार्ग से बुद्धि
और विवेक से नियंत्रित होकर परमात्मा की अनुभूति नहीं
करता है अंतत: उसका लौकिक और अलौकिक जीवन निर्थक
हो जाता है। मूल प्रवृत्तियां शरीर को स्थिर करने में सहायक मात्र
होती हैं और जब शरीर सही ढंग से काम करता रहता है तभी आत्म
तत्व को परमात्म तत्व में मिलने का सहज मार्ग बन पाता है। इसलिए
सभी को आलस्य और निद्रा से वशीभूत होने से बचने की आवश्यकता है।
हमारा जीवन बड़ा महत्वपूर्ण है। इस जीवन को हम जैसा चाहें, वैसा बना
सकते हैं। अगर हमारा जीवन कर्मशील है, तो हम जीवन में यशस्वी बन
सकते हैं। अगर आलसी है, तो समाज में निंदा के पात्र भी बन सकते हैं।

 

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