जीवन में अज्ञानता अंधकार है


                    सांसारिक जीवन
रूपी आभासित सुख के पौधे पर
अंतत: दुख का फल लगता है। यह
महज संयोग नहीं है, बल्कि दुखमय
संसार की अंतिम व वास्तविक परिणति
भी है। हम दुखी क्यों होते हैं? क्या ईश्वर
ने दुख प्रदान करने वाले पदार्थो का नि-
र्माण हमारे लिए किया है? ईश्वर ने तो
हमें निर्मल मन, निश्छल देह व गंगा-
सा पवित्र आनंदमय कानन-कुसुमयुक्त
जीवन दिया था। फिर इस सुख में बिन बुलाए
दुख आया कैसे? कौन है इसका निर्माता व जिम्मेदार?

                   सच तो यह है कि
मनुष्य ने स्वयं ही कामनाओं
का यह मकड़जाल बुना है और
स्वयं ही उसमें फंसकर छटपटा रहा
है। असहाय व असमर्थ, पग-पग अपने
गलत कृत्यों पर पश्चाताप के आंसू बहाता
हुआ। ईश्वर ने हमें तपस्वी मन व सशक्त
काया दी थी। इसको संग्रही व भोगी हमने
बनाया। सुख की चाहत में परिवार, धन-
दौलत, जायदाद व अपेक्षा-कामनाओं का
अभयारण्य हमने बसाया। अब इसके हानि-
लाभों से स्वयं हमें ही रूबरू होगा पड़ेगा।
जीवन के हर मार्ग व मोड़ पर शाश्वत
सुख व शाश्वत दुख हमारे स्वागत के
लिए सदैव खड़े रहते हैं। शाश्वत सुखों
में भौतिक कष्टों का आभास होता है,
जबकि शाश्वत दुखों में हमें अतुलनीय
आभासित भ्रामक संसार दिखाई देता है।
अज्ञानता में इसे ही हमने उपलब्धियों की पूर्व-
पीठिका मानकर स्वीकार कर लिया है।

                   असली सुख का मार्ग
हमसे दूर छूटता चला गया और
हमने दुखमय मार्ग को ही अज्ञानता
के अंधकार से प्रेरित होकर सुख-सदृश
मान लिया। छलावा तो महज छल सकता
है। जैसे निद्रा में भव्य स्वर्णमहलों की प्राप्ति,
जो स्वप्न टूटते ही खंड-खंड होकर असलियत
या यथार्थ से साक्षात्कार करा देता है। इस संपूर्ण
दुखमय सृष्टि का निर्माण व आमंत्रण केवल हमने
ही किया है। इससे पनपने वाला हर भाव, स्वभाव,
उत्पाद, संबंध व विस्तार दुखमय ही होगा। सुख
का मार्ग ईश-भजन की नाव में बैठकर,
सांसारिक विस्तार को भुलाकर,
सनातन आनंद के उस लोक का दिव्य-
दर्शन है, जहां दुख, पीड़ा, पश्चाताप व संताप
पनप ही नहीं सकते।

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