ज्ञान की महिमा-1


                  ज्ञान सबकी व्यक्तिगत चेतना है,
जिससे वह सत्य को देख सकता हैं,अज्ञानी नहीं।
अपनी अज्ञानता का आभास जब होने लगता है तो
ज्ञान का प्रथम चरण प्रारम्भ हो जाता है।   ईश्वर का
भय ही ज्ञान का प्रथम चरण है। ज्ञानी स्वयं को जानता
है जबकि विद्वान दूसरों को जानता है। ज्ञान सच्चाई में ही
पाया जाता है ।उडने की अपेक्षा झुकने का ज्ञान हमारे ज्यादा
नजदीक होता है। ज्ञानी तो जगत का यथार्थ रूप जान सकता है।
जो ज्ञानियों के साथ चलता है वह अवश्य ज्ञानी हो जाता है।ज्ञानी तो
हर वात की अपने से आशा रखता है, जबकि मूर्ख दूसरों की ओर ताकता
है। ज्ञानी वर्तमान को ठीक पढ सकता हैऔर परिस्थिति के अनुसार चल सकता
है । ज्ञान से तो ही मुक्ति होती है।ज्ञान की बातें सुनकर जो   उनपर अमल करता
है, उसी के ह्दय में ज्ञान की ज्योति प्रकट होती है। ज्ञान का अन्तिम लक्ष्य चरित्र
निर्माण करना होना चाहिए। ज्ञान से मन को शुद्ध होता है।क्रिया के बिना तो ज्ञान
एक भार है । ज्ञान से मुक्ति होती है,यथार्थ मुक्ति का कारण भी यथार्थ ज्ञान ही है ।
कोई भी ज्ञानी पाप नहीं कर सकता ।

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