ज्ञान के नेत्र-4


1- अन्धकार में हम कहॉ से कहॉ पहुंच जाते हैं

              मानसिक पापों का परित्याग करें, मन
में जमी हुई   यह वासना ही हमसे दुष्कर्म कराती है।
पाप का प्रधान कारण आत्मज्ञान का अभाव है।हम प्रायः
मोह और आलस्य की निद्रा में पडे रहते हैं।आलस्य में रहकर
हमें सुख मिलता दिखाई देता है,    लेकिन उसका फल हमेशा दुःख
होता है।हमें अपनी कमजोरियों का ज्ञान नहीं होता है।जो आदमी गलती
करता है उसे यह ज्ञात नहीं होता है  कि  वह  गलत  राह  पर है, अन्धकार  ही
अन्धकार में वह कहॉ से कहॉ पहुंच जाता है।अन्त में किसी भावशिला पर टकराकर
उसे अपनी गलती का आभास होता है,उसके ज्ञान चक्षु एकाएक खुल जाते हैं बस वहीं
से वास्तविक आत्मिक उन्नति का सुप्रभात प्रारम्भ होता है।।

2-ज्ञान के नेत्र हमें दुर्वलता से परिचित कराते हैं

                ज्ञान के नेत्र तो हमें अपनी दुर्वलता से
परिचित कराने आते हैं,  जब ज्ञान के नेत्र  खुलते  हैं
तो हमें को अपनी दुर्वलता के दर्शन होते हैं। जब तक इन
इन्द्रियों से सुख दिखता है,  तब तक  आंखों पर परदा पडा हुआ
मानना चाहिए।और जो अपनी दुर्वलता से परिचित हो जाता है,उसके
लिए वह अपना सच्चा पश्चाताप कर उसे दूर करने की इच्छा और सतत्
उद्योग प्रारम्भ कर देता है, उसकी उन्नति का आधा काम तो बन गया
मानना चाहिए।दुर्वलता तो पाप का मूल है,इसका कारण अज्ञानता है।

3-ज्ञान के नेत्र

                 भक्त मीराबाई के ज्ञान के नेत्र इतनी जल्दी
खुल गये थे  कि  उन्हैं  अपने  विवाह तथा दाम्पात्य जीवन के
प्रति कुछ भी मोह नहीं हुआ। उनके सम्मुख  नाना  प्रकार के प्रलोभन
और भयंकर यातनायें आयीं,किन्तु वे सभी को ज्ञान के नेत्रों से से निरखती
रही। सॉसारिकता के असत्य व्यवहार को त्यागकर उन्होंने भक्ति का वह मार्ग
अपनाया जो मुक्ति देने वाला था। उन्हैं ज्ञान के नेत्रों से यह दिखाई दिया कि
कुविचार और कुकर्म ही दुख और अतृप्त का मूल है।

4-तिरस्कार से ज्ञान के नेत्र खुल गये

               गोस्वामी तुलसीदास अपनी पत्नी से अत्यधिक
प्रेम करते थे वासना और  इन्द्रियों  के  मायाजाल ने उन्हैं बॉध
रखा था,जितना ही वे इन्द्रिय सुख के मार्ग  पर  बढते  गये, उतना
ही उन्हैं उसकी आवश्यकता अधिकाधिक प्रतीत होती गई ।एक दिन
नारी के ज्ञान  ने  उनके ज्ञान के नेत्र खोल दिये।  उसकी पत्नी ने कहा
-मेरे इस हाड-मॉस के नश्वर शरीर के प्रति जो मोह आपको है, यदि
वही कहीं ईश्वर के प्रति होता तो आपकी मुक्ति हो जाती ।तुलसीदास
जी इन कथनों को सोचते रहे ।चिंतन करते रहे।वे अंत में इस परिणाम
पर पहुचे कि वास्तव में नारी का कथन सत्य है।आसक्ति से बढकर इस
संसार में कोई दूसरा दुःख नहीं है।इन्द्रियों के विषयों में फंसे रहने से मनुष्य
दुखी रहता है ।उनके ज्ञान के नेत्र खुल गये और अब दूसरा ही दृश्य था ।उन्होंने
देखा कि वासना मनुष्य को पागल बना रही है।संसार भोगों की ओर तीव्रता से दौड
रहा है।मनुष्य तो मन से ही संसार से बंधता है ।।

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