ज्ञान वह है जो वर्तमान को पढ सके-4


1 -आंखें खोलकर देखो सबमें अपनी ही छवि है

      सचमुच आंखें खोलकर
देखोगे तो  समस्त  छवियों में
तुम्हें अपनी ही छवि दिखाई देगी
और यदि कान खोलकर सुनोगे तो
समस्त ध्वनियों में तुम्हें अपनी ही
ध्वनि सुनाई देगी।केवल एक वार यह
हुआ जब मैं निर्वाक हो गया।  वह तब
जब एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा कि तुम
कौन हो।

2-ज्ञान वह है जो वर्तमान को ठीक ढंग से पढ-समझ सकें

     ज्ञान जब इतना घमंडी बन
जाय  कि  वह  रो  न सके,   इतना
गंभीर बन जाये कि हंस न सके और
इतना आत्मकेन्द्रित बन जाए कि अपने
सिवाय और किसी की चिन्ता न करे वह
ज्ञान अज्ञान से भी ज्यादा खतरनाक होता
है।   इस ज्ञान की प्राप्ति करने की अपेक्षा
अज्ञानता में विचरना श्रेयस्कर है।जो ज्ञान
मन को शुद्ध करता है,वही ज्ञान है शेष
सब अज्ञान है।  ज्ञानी  तो वह है  जो
वर्तमान को ठीक पढ सके और
परिस्थिति के अनुसार चल सके।

3-श्रेष्ठ पुरुषों का धन उसका मान है

   जो लोग निम्न श्रेणी के होते
हैं वे तो  सिर्फ  धन  की  कामना
करते हैं,  मध्यम श्रेणी के मनुष्य
धन और मान दोनों की कामना करते
हैं।लेकिन श्रेष्ठ पुरुष तो केवल मान की
ही कामना करते हैं।मान ही श्रेष्ठ पुरुषों
का धन है ।

4-दुर्जन का विश्वास न करें

      दुर्जन मीठा बोलें तब भी
उस पर विश्वास  न  करें  क्योंकि
उसकी जबान पर शहद रहता है मगर
दिल में जहर।इन दुर्जनों को अगर अच्छी
शिक्षा भी दी जाय,तब भी वह साधु नहीं बन
सकते है,ठीक उसी प्रकार जैसे नीम के पेड को
यदि घी और दूध से सींचा जाय तब भी वह मधुर
नहीं होता।ये दुर्जन अगर सौ बार भी तीर्थ स्नान
भी करें फिर भी वे शुद्ध नही होते ।

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