डरो नहीं स्वयं को पहचानो-7


1-फूल की तरह सदा खिले रहें

      अपने कर्म इस प्रकार करें
कि जैसे आपको सौ  वर्ष  जीवित
रहना हो, शुक्रिया इस प्रकार अदा करें
कि कि जैसे आप कल मर जायेंगे ।रहस्य
के प्रकट हो जाने पर दुखी मत होओ,बल्कि फूल
की तरह सदा खिले रहो । इस बहुरूपी संसार में पद
और प्रतिष्ठा,मान और मर्यादा सभी कुछ नष्ट होने वाले है।

2-धर्म के सम्बन्ध में विवाद न करें

       धर्म को लेकर कभी विवाद
न करें,धर्म सम्वन्धी विवाद और
सारे झगडे केवल यही दर्शाते हैं कि
वहॉ आध्यात्मिकता का अभाव है।धर्म
ससम्बन्धी झगडे तो सदैव खोखली और
अन्धविश्वास की बातों पर होते हैं।स्वयं पर
विश्वास करें इस संसार में तो वही महान और
शक्तिशाली बने हैं जिन्हैं अपने आप पर विश्वास
था ।दर्शन के अभाव में तो धर्म केवल अंधविश्वास
मात्र बनकर रह जाता है और धर्म का बहिष्कार करने
पर दर्शन केवल शुष्क नास्तिकतावाद बना रहता है।

3-समझें कि दुनियॉ में आप विदेशी हैं

        इस दुनायॉ में रहकर कार्य इस
ढंग  से  करो  कि  कि  मानो आप इस
संसार में विदेशी हो,एक यात्री हों।सतत
काम करो,लेकिन अपने को वन्धन में न
जकडो,क्योंकि बंधन बडा भयानक है।सिद्धि
चमत्कार के पीछे मत पडो।दूसरों की मुक्ति के
लिए तुम्हैं नरक में भी जाना पडे तो सहर्ष जाओ,
बदले में कुछ मत मॉगो,कुछ मत चाहो ,तुम्हैं जो देना
हो दे दो वह तुम्हारे पास लौटकर आयेगा पर अभी उसकी
बात मत सोचो ।

4- डरो नही स्वयं को पहचानो

       यदि तुम डरते हैं तो किससे?
यदि तुम  ईश्वर  से  डरते  हैं  तो  तुम
मूर्ख हो,यदि तुम मनुष्य  से  डरते  हो  तो
तुम कायर हो।यदि तुम क्षिति,जल,पावक,गगन,
समीर नामक पंच्चभूतों से डरते हो तो उनका सामना
करो।यदि तुम अपने आप से डरते हो तो अपने को पहचानो
और कहो कि मैं ही ब्रह्म हूं। डरें नहीं त्याग करें त्याग के
सिवा इस संसार में कोई शक्ति नहीं है ।सबकुछ तुम्हारे
भीतर है, अपने भीतर स्वर्ग के साम्राज्य का ताला
खोलने के लिए ऊं की चाबी को काम में लाना
चाहिए ।

5-विघ्न पडने पर भी कार्य न छोडें

        जो लोग तुच्छ प्रकृति के होते हैं
वे भय के मारे कोई कार्य प्रारम्भ ही नहीं
करते ,मध्यम श्रेणी के लोग कार्य को प्रारम्भ
करके विघ्न पडने पर बीच में ही छोड देते हैं।किन्तु
उत्तम लोग बार-बार विघ्न पडने पर भी आरम्भ किये
हुये कार्य को बीच में ही नहीं छोडते हैं।बल्कि उसे पूरा करते हैं।

6-अपनी प्रशंसा सुनना अच्छा लगता है

       अपनी प्रशंसा सुनकर हम इतने
मतवाले हॉ जाते हैं कि  हममें  विवेक की
शक्ति लुप्त हो जाती है।बडे से बडा महात्मा
भी अपनी प्रशंसा सुनकर खुश हो जाते हैं।अगर
आप देखें कि अपनी प्रशंसा से कोई यक्ति किस
तरह प्रभावित होता है, तो आप उस व्यक्ति का
चरित्र बता सकते हैं।

7-वैरागी मनुष्य सबको एक दृष्टि से देखता है

        बैराग्य के बिना तो कोई भी व्यक्ति
सम्पूर्ण रूप  से अंतःकरण को  परोपकार में
नहीं लगा सकता ,वैरागी ही  सबको  समान रूप
से देखता है और सबकी सेवा में अपने को लगा सकता
है।मनुष्य की यह स्थिति वेदांत की शिक्षा ग्रहण करने पर
प्राप्त होती है,जिसमें कि मनुष्य शोक,भय और चिन्ता से
विमुक्त हो जाता है। समस्त विश्व ईश्वर से परिपूर्ण है,अपने
नेत्र खोलो और उसे देखो ।सत्य के लिए तो सबकुछ त्यागा जा
सकता है।

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s