तर्क से बुद्धि सत्य को जान लेती है-5


1- तर्क से बुद्धि सत्य को जान लेती है

          भावनाओं के स्रोत ह्दय द्वारा अनुभूत होता है
कि तर्क के द्वारा बुद्धि सत्य को जान लेती है। इस प्रकार
बुद्धि और भावना दोनों एक ही क्षण में आलोकिक हो उठते हैं,
ह्दय ग्रन्थि खुल जाती है जिससे सब संशय मिट जाते हैं । प्राचीन
काल में ऋषियों के ह्दय में ज्ञान और भाव एक साथ प्रस्फुटित हो उठते
थे,तब सर्वोच्च सत्य ने काव्य की भाषा ग्रहण की, फलस्वरूप वेद और अन्य
ग्रन्थ रचे गये । उन्हैं पढते समय लगता है कि मानो भाव और ज्ञान की दोनों
सामान्तर रेखायें अन्ततः मिलकर एकाकार हो गई हैं और एक दूसरे से अभिन्न हैं ।।

2-भौतिक वस्तुओं के भीछे भागना मृत्यु के पाश में बंधना है-

              नुष्य बाहरी वस्तुओं के पीछे दौडते फिरते हैं,
जिससे व्याप्त मृत्यु के पाश में बंध जाते हैं,लेकिन ज्ञानी
पुरुष अमृत्व को जानकर अनित्य वस्तुओं में नित्य वस्तु की
खोज नहीं करते ।अनन्त की खोज अनन्त में ही करनी होगी,और
हमारी अन्तवर्ती आत्मा की एकमात्र अनन्त वस्तु है । शरीर, मन आदि
जो प्रपंच हम देखते हैं अथवा जो हमारी चिन्ताएं या विचार हैं,अनमें से कोई
भी अनन्त नहीं हो सकता ।मनुष्य की आत्मा जो सदा जाग्रत है,वही एकमात्र
अनन्त है ।जो नाना रूप दिखते है,वे बारम्बार मृत्यु को प्राप्त होते हैं ।

3-अद्भुत विषय के प्रति जिज्ञासा-

                जब लोग किसी अद्भुत विषय के सम्बन्ध में
सुनते हैं. तो  वे  समझने  लगते  हैं कि वे  उसे  एकदम प्राप्त
कर लेंगे ।क्षणभर में वे विचारते हैं कि उसकी प्राप्ति के लिए उन्हैं
उसका रास्ता तय करना पडेगा ।वे कूदकर पहुंच जाना चाहते हैं ।यदि
वह स्थान उच्च है तब भी पहुंच जाना चाहते हैं। वे यह नहीं  सोचते  कि
हममें उतनी शक्ति है या नहीं ।  नतीजा  यह  होता  है कि वे कुछ नहीं कर
पाते हैं ।हम किसी व्यक्ति को जबर्दस्ती उठाकर ऊपर नहीं धकेल सकते हैं,हम
आप कुछ नहीं कर सकते हैं । हम सबको प्रयत्न करने की आवश्यकता  होती  है ।
अतः धर्म का यह पहला भक्ति का भाग है, यह उपासना की पहली और निचली सीढी है।

4-ईश्वर को अनुभव करने की सामर्थ्य-

           सामान्यतः आपकी उस सर्वशक्तिमान के
सम्बन्ध में क्या कल्पना हुआ करती है ?  कुछ भी नहीं ।
ईश्वर के बारे में आपकी जो कल्पना है उसका अनुभव करना
ही धर्म है । और ईश्वर के विषय में,जो आपकी कल्पना है, उसका
अनुभव करने में जब आप समर्थ हो जायेंगे,तब हम आपको ईश्वर का
उपासक कहेंगे । अभी तो आप शब्द तक के बारे में ही  जानकारी र खते
हैं । इससे  अधिक  आप  कुछ  भी  नहीं  जानते ।  उस  अवस्था  में  पहुंचने  के
लिए, जिसमें ईश्वर का अनुभव कर  सकेंगे, साकार  माध्यम  से  ठीक  उसी  प्रकार
जाना होगा जैसे बच्चे प्रथम बार साकार वस्तुओं का अभ्यास करके क्रमशः भाववाचक
की ओर जाते हैं ।धीरे-धीरे चलने का तरीका है । यहॉ  धर्म  के  क्षेत्र   में सब   बच्चे ही  हैं,
उम्र में चाहे हम बूढे हों,संसार की सारी पुस्तकों का अध्ययन चाहे  हमने  कर  लिया  हो,
आध्यात्मिक क्षेत्र में तो हम सब बच्चे ही हैं । अनुभव करने की इस शक्ति से ही धर्म
बनता है ।

5-अपने को प्रेम से भर लो-

             नफरत से बहुत शक्तिशाली है प्यार  की  बात,
समुद्र की जैसी होती है प्रेम   की थाह, समुद्र  कितना  भी बढ
जाय उसकी थाह बढती ही रहती है ।कितनी भी नफरत बढ जाय
संसार की, पर प्यार उससे भी ज्यादा बढता रहेगा।आपके अन्दर जो
चैतन्य बह रहा है वह प्रेम ही तो है। आज के मानव जीवन के भयानक
तौर-तरीकों को समाप्त करने के लिए हमें अपने ह्दयों में प्रेम की शक्ति
विकसित करनी होगी, प्रेम की पहचान है वह कभी किसी का अहित करने की
नहीं सोच सकता, जो कुछ भी होगा हितकारी ही होगा । अबोधिता प्रेम का स्रोत है ।
पवित्रता का सम्मान करने पर ही हम प्रेम मय हो सकते हैं,घृणॉ से तो प्रेम को धोया
जाता है,हमारा लक्ष्य अपने प्रेम को उन्नत करना होना चाहिए । ध्यान धारण से प्रेम की
शक्ति विकसित की जा सकती है । अगर किसी से मार-पीट भी होती है तो प्रेम में,सबकुछ
करना धरना प्रेम में हो सकता है,जिसमें जिसका जितना हित हो वही प्रेम है, इसी को तो प्रेममय
जीवन कहते हैं ।

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