धर्म नित्य पवित्र होने का संकल्प है


 

           मनुष्य में अपने
भावों को पहचानने की
अपूर्व क्षमता है। अपने आच-
रण में वह संस्कार जन्य है, विका-
समान है। उसमें ग्रहण करने और त्याग
करने की योग्यता है। मनुष्य प्रकृतिबद्ध
नहीं है। वह प्रकृति को अपने अनुकूल बना-
ता है। पशु-पक्षी प्रकृति के अनुकूल होकर रहते
हैं। वे केवल अपने को देखते हैं। अपने स्वार्थ के
लिए कुछ भी कर सकते हैं। प्रभुत्व की स्थापना का
लोभ मनुष्य को पशु-तुल्य बना देता है, जहां वह अपने
गुणों से विमुख हो जाता है। यह उसका विकार है, रोग है।

          धर्म नित्य-नव्य
होने की प्रेरणा है। अपने
गुण में प्रतिष्ठित होने का पवित्र
संकल्प है। विगत और वर्तमान में
समस्त बाधाओं को छोड़कर ही नव्य
में प्रवेश संभव है। प्रत्येक जीव, वस्तु और
पदार्थ हर क्षण बीत रहा है, नया आ रहा है,
यही विद्यमानता है। इस आने-जाने और रहने
के स्वभाव के साथ तन्मय होकर जीना ही धर्म
को जीना है।

             धर्म बतलाता है कि
हमें इस तरह जीने की आदत
डालनी चाहिए जिससे हमारे अंत:
करण में अशांति, क्षोभ, असंतोष जैसी
कोई चीज पैदा न हो, क्योंकि ये सब चीजें
जीवन-रस को नष्ट करने वाली हैं। जीवन-
रस आत्मा की खुराक बनकर उसे पोषण देता
है। भौतिक विज्ञान पदार्थो को देखता है। प्रकृति
का दोहन कर सुविधाओं का विस्तार करते जाना
ही उसकी उपलब्धि है।

             धर्म यथार्थ को देखता
है, मूलभूत शाश्वत मूल्यों की
आधार-शिला पर प्रकृति को देख-
ना, समझना और तदनुकूल आचरण
करना ही धर्म का लक्षण है। धर्म जीवन
का गुण है, स्वभाव है जो सदैव विद्यमान
रहता है। गुण में अपना ज्ञान, समझ और
प्राण नहीं है, वह गुण अपने लक्षणों में प्रकट
होता है। कोई भी वस्तु अपने लक्षण से अलग
नहीं हो सकती। गुण पर आवरण आ सकते हैं,
दबे भी रह सकते हैं, पर समाप्त नहीं होते। अपनी
कामनाओं को कायम रखते हुए जीवन के यथार्थ
को समझा नहीं जा सकता। धर्म दीपक में ज्योति की
तरह है। च्योति की रक्षा करनी होती है, वैसे ही सत्य
की रक्षा करनी होती है। कुछ अनीश्वरवादी लोगों ने
धर्म को अफीम करार दिया है, लेकिन धर्म कभी मूच्र्छा
नहीं देता। सूर्य प्रकाश में प्रगट होता है, धर्म भी अपने
गुणों में प्रगट होता है। धर्म झरने की तरह गतिशील है,
इसी कारण नित्य-नूतन है।

 

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