ध्यान का उद्देश्य है सुशुप्त शक्तियों को जाग्रत करना


 

                 ध्यान का प्रयोजन है
कि व्यक्ति में आत्मविश्वास पैदा हो
जाए। व्यक्ति में आत्मविश्वास उत्पन्न
होना जरूरी है।

आत्मविश्वास का सूत्र है-
मेरी समस्याओं का समाधान
कहीं बाहर नहीं, भीतर ही है।
इस समाधान का सशक्त माध्यम
है ध्यान।

                समस्याओं से मुक्ति का
जो मार्ग मुझे चाहिए वह है ध्यान, जो
मेरे भीतर है। यदि यह भावना प्रबल बने
तो मानना चाहिए-ध्यान का प्रयोजन सफल
हुआ है। ध्यान का अर्थ यही है कि हमारे शरीर
के भीतर जो शक्तियां सुषुप्त हैं, वे जाग्रत हो जाएं।
ध्यान से व्यक्ति में यह चेतना जगनी चाहिए कि मुझमें
शक्ति है और उसे जगाया जा सकता है और उसका सही
दिशा में प्रयोग किया जा सकता है।

                   शक्ति का बोध,
जागरण की साधना और उसका
सम्यक दिशा में नियोजन, इतना
विवेक जग गया तो समझो कि सफलता
का स्त्रोत खुल गया और समस्याओं से मुक्ति
का मार्ग प्रशस्त हो गया।

                   हमारे भीतर ऐसी
शक्तियां हैं, जो हमें बचा सकती
हैं। संकल्प की शक्ति बहुत बड़ी शक्ति
है। अनावश्यक कल्पना मानसिक बल को
नष्ट करती है। लोग अनावश्यक कल्पना बहुत
करते हैं। यदि उस कल्पना को संकल्प में बदल
दिया जाए, तो वह एक महान शक्ति बन सकती
है।

                   एक विषय पर दृढ़ निश्चय कर लेने का अर्थ है-
कल्पना को संकल्प में बदल देना। इस संकल्प का प्रयोग करें,
तो वह बहुत सफल होगा। संकल्प एक आध्यात्मिक ताकत है।
संकल्पवान व्यक्ति अंधकार को चीरता हुआ स्वयं प्रकाश बन
जाता है। चंचलता की अवस्था में संकल्प का प्रयोग उतना
सफल नहीं होता जितना वह एकाग्रता की अवस्था में होता
है।

                      हर व्यक्ति रात्रि के
समय सोने से पहले एक संकल्प करे
और उसे पांच-दस मिनट तक दोहराए
कि मैं यह करना या होना चाहता हूं। इस
भावना से स्वयं को भावित करे, एक निश्चित
भाषा बनाए, जिसे वह कई बार मन में दोहराए।
ऐसा करने से संकल्प लेने में शीघ्र सफलता मिलती
है और इसमें ध्यान का चमत्कारिक प्रभाव है। ध्यान
आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी
बहुत उपयोगी है। ध्यान से निषेधात्मक भाव कम होते
हैं, विधायक भाव जाग्रत होते हैं। ध्यान एक ऐसी विधा
है, जो हमें भीड़ से हटाकर स्वयं की श्रेष्ठताओं से पहचान
कराती है। हममें स्वयं पुरुषार्थ करने का जज्बा जगाती है।

 

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