ध्यान क्या है-1


ध्यान का अर्थ हैं एकाग्रचित्त होना, अर्थात जागृत होकर
एकाग्रचित्त में किसी कार्य को करना ध्यान है।चलना,उठना,
सुनना,ध्यान हो सकता है पक्षियों की चहचहाहट सुनना ध्यान हो
सकता है,य़दि आप एकाग्रचित्त तथा जागृत होकर सुनते हैं तो।या
अपने भीतर की आवाजों को सुनना ध्यान हो सकता है।अर्थात सोये
न रहें जागृत होकर जो करोगे ध्यान हो सकता है।ध्यान को चार चरणों
में विभाजित किसा जा सकता हैः-

पहला चरण- अपने शरीर को पूर्ण जागृत रखकर,
एकाग्रचित्त, निर्विचारिता की स्थिति में ले जाना है,
इससे आपके शरीर को अधिक विश्राम और शॉति मिलेगी।
आपका शरीर लयबद्ध हो जाता है,महशूस करोगे कि शरीर में
एक सूक्ष्म संगीत सा फैलता जा रहा है।

दूसराचरण-अपने लक्ष्य के अनुरूप शरीर में निहित
सूक्ष्म विचार के प्रति जागृत होना।फिर धीरे-धीरे महशूस
करोगे कि आपके अन्दर उस विचार के प्रति क्या अनुभूति
होती है अगर लिख डालते हो तो,स्वयं चकित हो जाओगे।

तीसरा चरण-यदि आप अपने विचारों के प्रति जागृत हैं
तो फिर एक कदम और आगे बढना है कि उस विचार के
प्रति अधिक गहन जागृत होना है बस ये तीनों आयाम जुडकर
एक घटना बन जाती है फिर देखोगे कि क्या अनुभूति होती है।

चौथा चरण–यह तुरीय स्थिति की घटना की अवस्था है,
जो जब प्रथम तीन चरणों को साधचुके होते हैं उनके लिए
यह पुरुष्कार प्राप्त होता है।जिसमें व्यक्ति बुद्ध हो जाता है ।

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