निर्विचारिता से स्वयं को ज्योतिर्मय कैसे करें-1


निर्विचारिता एक औलौकिक स्थिति है जहॉ से परमात्मा के दर्शन होते हैं,
मस्तिष्क को विचारशून्य रखें यही निर्विचारिता है। निर्विचारिता की अवस्था
में जो भी घटित होता है वह प्रकाशवान होता है, निर्विचारिता में आपके मन
में जो विचार आता है वह एक अन्तःप्रेरणा होती है।निर्विचारिता में आप परमात्मा
की शक्ति के साथ एक रूप हो जाते है,अर्थात आप परमात्मा में आकर मिल जाते हैं।
परमात्मा की शक्ति आपके अन्दर आ जाती है।कोई भी निर्णय लेने से पहले निर्विचारिता
में जाओ, अब जो निर्णय सामने आ जाए, उसी को कीजिए, यही सबसे उपयुक्त निर्णय होगा,
क्योंकि उसमें आपका ईगो और सुपर ईगो दोनों काम करते हैं। आपका संसार आपके पीछे खडा है, 
आपने जो भी लौकिक कमाया है,वह आपके पीछे खडा होगा लेकिन निर्विचारिता में करोगो तो आलौकिक
व चमत्कारिक निर्णय होगा,आप ऎसा निर्णय लेंगे जो बडे-बडे लोगों के बस में नहीं। किसी भी कार्य को निर्वचारिता
में करने से जान जाओगे कि कहॉ से कहॉ डाएनैमिक हो गया मामला। निर्विचारिता में रहना सीखें यही आपका स्थान है,
आपका धन,  आपका बल, शक्ति, आपका स्वरूप, सौन्दर्य तथा यही आपका जीवन है। निर्विचार होते ही बाहर का यन्त्र पूरा     
आपके हाथ में घूमने लग जाता है। सिर्फ जीवंतता का दर्शन होगा,आपको उस जगह से दिखाई देगा जहॉ से जीवन की धारा
बहती है। इसलिए निर्विचारिता समाधि से स्वयं कोज्योतिर्मय बनाइये यह कार्य कठिन नहीं है । यह स्थिति आपके अन्दर है,
क्योंकि विचार या तो इधर से आते हैं या उधर से,ये आपके मस्तिष्क की लहरियॉ नहीं हैं, ये तो आपकीप्रतिक्रियायें हैं लेकिन
ध्यान धारण करने पर आप निर्विचार चेतना में चले जाते हैं,यह स्थिति प्राप्त करना आवश्यक हैऔर तब आपके मस्तिष्क में
आने वाले मूर्खता पूर्ण एवं व्यर्थ विचार समाप्त हो जाते है, इन विचारोंके समाप्त होने पर ही आपका उत्थान सम्भव है तभी
हम आप आप उन्नत होते हैं।

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