नि:स्वार्थ सेवा के फल को पुण्य कहा जाता


 

             अठारह पुराणों के रचनाकार
महर्षि व्यास  का यह कहना  था  कि यदि
आप कुछ अच्छा कार्य करते हैं तो इस स्थिति
में आपको कुछ प्रतिकर्म मिलते हैं। प्रत्येक कार्य
का एक समान और विपरीत प्रतिकर्म मिलता है,
बशर्ते तीन आपेक्षिक तत्व अर्थात देश, काल और
पात्र अपरिवर्तित रहें। यही नियम है। यदि आप कुछ
अच्छा करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से वहां एक अच्छा
प्रतिकर्म प्राप्त होगा।

                      जब कहीं आप किसी
मनुष्य की सेवा करते हैं, और विशेषकर
नि:स्वार्थ सेवा तो उसके प्रतिकर्म स्वरूप आप
कुछ पाएंगे। आप चाहें या न चाहें, किंतु उसका
प्रतिकर्म प्राप्त होगा और प्रतिकर्म के फल को पुण्य
कहा जाता है। यदि आपने कुछ बुरा किया, किसी को
क्षति पहुंचाई या कर्म के द्वारा अधोगति तक पहुंच गए
तो इस प्रतिकर्म को पाप कहा जाता है। आप पुण्य कर्म में
दिन-रात व्यस्त रहे। इसलिए आपको इन चौबीस घंटों को किस
कार्य में व्यतीत करना है? स्पष्ट है, ‘पुण्य’ में और पुण्य क्या है?
अब कोई कह सकता है कि दिन के समय पुण्य कर्म किया जा सकता
है, लेकिन रात्रि में सोते समय पुण्य कर्म कैसे किए जा सकते हैं? इसका
उत्तर है कि पुण्य कर्म करते समय आपको मानसिक, आध्यात्मिक शक्ति
की आवश्यकता होती है।

                     कोई बुरा कार्य करते
समय आपको किसी नैतिक साहस या
किसी आध्यात्मिक शक्ति की आवश्यकता
नहीं पड़ती है, लेकिन कुछ अच्छा कार्य करने
के लिए आपको नैतिक साहस और आध्यात्मिक
शक्ति की आवश्यकता पड़ सकती है। वह शक्ति
आपको ध्यान और जप के माध्यम से प्राप्त हो सकती
है। अर्थात मानसिक जप के द्वारा। यद्यपि आप सो रहे
हैं तो भी स्वचालित, श्वास-प्रश्वास के साथ आपकी यह
जप क्रिया स्वचालित रूप से चलती रहेगी, जिसे ‘अजपा’
जप कहते हैं। वहां आपको कोई विशेष प्रयत्‍‌न अपनी ओर
से नहीं करना है। जप अपने आप स्वचालित रूप से चलता
रहेगा। इस प्रकार रात्रि के समय भी आप पुण्य कर सकते हैं।
आप 24 घंटे पुण्य कर सकते हैं। आप हमेशा याद रखें कि आप
यहां अल्प समय के लिए आए हैं। आप इस पृथ्वी पर दीर्घ समय
तक नहीं रहेंगे।

 

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