विपत्ति में धैर्य सबसे बडा साथी होता है-1


जीवन में विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं तथा
कर्तव्यों से हमारी शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों
पर प्रभाव पडता है जिससे हम व्याकुल तथा तनाव युक्त
हो जाते हैं , जबकि परमात्मा का मत है कि आप इस प्रकार
अपना स्वभाव बनाइये कि कठोर परिश्रम वाले कार्यों में भी आप
सदैव विश्राम का अनुभव करते रहें, यह धैर्य से ही सम्भव है, धैर्य
चरित्र का उज्वल अलंकार है । प्रत्येक मनुष्य का यह धर्म है कि वह यह
जानें कि जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण समस्याओं और अपने से मतभेद रखने
वाले लोगों के साथ किस प्रकार शॉतिपूर्वक रहा जा सकता है,झगडा-फसाद तो विकृति
पैदा करता है। धैर्यवान व्यक्ति अपने विपक्षियों के समक्ष भी विजयी रहता है। धैर्य धारण
करने के लिए अपने कार्यों को सम्पन्न करते समय एक दो मिनट का समय निकालकर यह
ध्यान कीजिए कि परमात्मा शक्तिमानहै उसी का अंश मेरी आत्मा है,यह शरीर तो साक्षी मात्र है
मुझे कार्य के फल की चिन्ता नहीं करनी चाहिए, इस तरह चिंतन करते- करतेआंखें बन्द कीजिए,
अपने शरीर को शिथिल छोडकर देह को पूरा विश्राम लेने दीजिए,विचारों का बोझ मस्तिष्क से निकाल
फेंकिए चिंता का बोझ उतारने में आपको जितनी सफलता मिलती है, उतना ही आप स्वयं को समर्थवान
व शक्तिवान महशूष करेंगे। चिंता मुक्ति के लिए निम्न बातों को ध्यान में रखें ः-

1-परेशानियों का मुकाबला करने के लिए धैर्य का सहारा लीजिए ।
2-स्वयं में धैर्य का गुंण विकसित करने के लिए उतावलेपन को त्यागना
होगा ।
3-अपने विचारों में से असम्भव शब्द को को हटा दें ।
4-किसी परेशानी पर शॉत चित्त से चिंतन करें ।
5-चिंतन सार्थक होना चाहिए ।
6- विना पूर्ण रूप से सोचे विचारे किसी कार्य को प्रारम्भ न करें ।
7-मन में यदि चिंता होती है तो अपने शुभ चिंतकों से इसकी चर्चा करें ।
8-परेशानी की स्थिति में अपने इषट मित्रों त था परिवार वालों तथा पडोसियों से सहायता लें ।
9-किसी अनजान के सामने अपनी समस्या न रखें .
10-किसी भी कार्य को क्रमवद्ध , स्पष्टतया तथा तसल्ली से करने पर स्वयं में धैर्य का गुंण विकसित होता है ।

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