पाप कर्म अभिशाप है-5


1-पाप क्या है-

                        पाप एक दुर्भाव है,जिसके कारण हमारे
आन्तरिक मन तथा अन्तरात्मा पर ग्लानि का भाव आता है ।
जब हम कभी गन्दा कार्य करते हैं तो ह्दय में एक गुप-चुप पीडा
का अनुभव होता रहता है,हारे मन का दिव्य भाग हमें प्रताडित करता
रहता है,बुरा-बुरा कहता रहता है ।इसी आत्मभर्त्सना से मनुष्य पश्चाताप
करने की बात सोचता है ।यह पाप पानी की तरह होता है,यह हमें नीचे की
ओर खींचता है ।आप चाहे कितने ही प्रयत्न करें,आन्तरिक पाप से कलुषित मन
स्पस्ट प्रकट हो जाता है।अवगुंण से तो मनुष्य की उच्च सृजनात्मक शक्तियॉ पंगु हो
जाती हैं,बुद्धि और प्रतिभा कुण्ठित हो जाती है ।किसी भी स्थिति में पाप और द्वेष की
प्रवृत्ति बुरी और त्यागने योग्य है ।।

 

2-गुनाह या पाप वह अग्नि है जो सुलगती रहती है-

               हम जो पाप या गुनाह करते हैं वे जलते हुये
वे वस्त्र हैं जिन्हैं यदि छिपाकर रखा जाता है तो वह अग्नि
अन्दर ही अन्दर सुलगती रहती है, और धीरे-धीरे समीप के वस्त्रों
तथा अन्य वस्तुओं को भी जला डालती है ।सम्भवतः उस अग्नि का धुआं
उस समय न दिखाई दे,लेकिन अदृश्य रूप में वह वातावरण में सदा मौजूद
रहता है ।पाप या गुनाह की अग्नि ऐसी अग्नि है,जो अन्दर ही अन्दर मनुष्य में
विकार उत्पन्न करती है,इस आन्तरिक पाप की काली छाया अपराधी के मुख,हाव-भाव,
नेत्र,चाल-ढाल इत्यादि द्वारा अभिव्यक्त होती रहती है ।अपराधी या पापी चाहे कुछ भी समझता
रहे वह अपराध को छिपाना चाहता है,परन्तु वास्तव में पाप छिपता नहीं है।मनुष्य का अपराधी मन
उसे सदा व्यग्र,अशॉत और चिंतित रखता है ।।

 

3-पाप में प्रवृत्त मनुष्य के अंग-

                       प्रायः मनुष्य के तीन अंग पाप में प्रवृत्त होते हैं ।
शरीर,वॉणी,और मन ,इनके द्वारा किये गये पाप-कर्मों के नाना रूप
होते हैं,इनसे बचे रहें।अर्थात शरीर वॉणी और मन का उपभोग करते हुये
सचेत रहें ।कहीं ऐसा न हो कि आत्मसंयम में शिथिलता आ जाय और पाप पथ
पग बढ जाय ।कभी-कभी हमें विदित नहीं होता कि हम कब गलत रास्ते पर चले
जा रहे हैं । गुप-चुप पाप हमें बहा ले जाता है और हमें अपनी सोचनीय अवस्था का ज्ञान
तब होता है जब हम पतित हो जाते हैं ।

 

4- पाप कर्म मनुष्य जीवन के लिए अभिशाप है-

            अपने शरीर के द्वारा अनुचित कार्य करना शारीरिक
पाप है।इसमेंवे समस्त कुकृत्य हैं,जिन्हैं करने से ईश्वर के मंदिर
रूपी इस मानव शरीर का क्षय होता है ।परिणॉम स्वरूप इस काया में
नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं, जिससे जीवित अवस्था में ही मनुष्य
को कुत्सित कर्म की यन्त्रणॉयें भोगनीं होती हैं ।शरीर के पाप में हिंसा पहला
पाप है ।इसमें इस शरीर का अनुचित प्रयोग किया जाता है ।उसे उचित अनुचित
का विवेक नहीं रहता है,उसकी मुख मुद्रा में दानव जैसे क्रोध,घृणॉ और द्वैष की अग्नि
निकलती है । इस प्रकार के लोगों में मानवोचित्त गुंण क्षय होकर राक्षसी प्रवृत्तियॉ उत्तेजित
हो उठती हैं, मरणोंपरान्त भी उसकी आत्मा अशॉत रहती है ।

 

5- पाप कर्म कई रूपों में मनुष्य पर आक्रमण करता है-

                  पाप कर्म ऐसी घृणित दुष्प्रवृत्ति है जो कई रूपों में
और वस्थाओं में मनुष्य पर आक्रमण किया करती है,इसलिए इससे
सावधान रहने की आवश्यकता है ।कहते हैं मनुष्य के मन के एक अज्ञात
कोने में शैतान का निवास होता है,मनुष्य उस पाप की ओर अज्ञानतावशः खिचता
जाता है क्षणिक वासना या थोडे लाभ के अन्धकार में उसे उचित-अनुचित का विवेक
नहीं रहता है ,वह अपना स्थाई लाभ नहीं देख पाता है और किसी न किसी पतन के ढालू
मार्ग पर आरूढ हो जाता है ।।

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