प्रार्थना ऐसी हो जिसकी अनुभूति की जा सके-9


DSC002401-प्रार्थना करने की कोई विधि नहीं है-

                   जी हॉ कुछ लोग
प्रार्थना की विधियों का उल्लेख
करते हैं, मगर प्रार्थना की कोई भी
विधि नहीं हो सकती है। क्योंकि यह न
कोई     संस्कार है और न   कोई औपचारिकता
बस प्रार्थना  ह्दय से निकलने वाला सहज स्वाभाविक
उमडता हुआ एक भाव है। लेकिन इसमें पूछने वाली बात
नहीं है कि कैसे?क्योंकि? यहॉ कैसे, जैसा कुछ भी नहीं है,
कैसे जैसा कुछ भी हो सकता है। उस क्षण जो भी घटता है,
वही ठीक है। अगर आंसू निकलते हैं तो अच्छा है,कोई गीत
गाने लगता है तो भी ठीक है,अगर अन्दर से कुछ भी नहीं
निकलता है तो शॉत खडे रहते हो,यह भी ठीक है।क्योंकि
प्रार्थना कोई अभिव्यक्ति नहीं है,या किसी आवरण में भी
वन्द नहीं है। प्रार्थना तो कभी मौन है,तो कभी गीत
गाना प्रार्थना बन जाती है। यह तो सबकुछ तुम
और तुम्हारे ह्दय पर निर्भर करता है।इसलिए
अगर मैं तुमसे गीत गाने के लिए कहता हूं
तो तुम गीत इसलिए गाते हो कि ऐसा
करने के लिए मैंने तुमसे कहा,इसलिए
यह प्रार्थना झूठी है।इसलिए प्रार्थना में
अपने ह्दय की सुनो,और उस क्षण
को महसूस करो और उसे होने दो।
फिर जो कुछ भी होता है वह
ठीक ही होता है।

2-प्रार्थना में अपने पर किसी की इच्छा मत लादो-

             प्रार्थना में कोई योजना
बनाने की कोशिश कर रहे हो तो
तुम प्रार्थना से चूक जाते हो।प्रार्थना
पर अपनी इच्छा मत लादो,इसीलिए तो
धार्मिक स्थल और धर्म संस्कार और कर्मकाण्ड
बनकर रह गये हैं।    उनकी तो पहले से ही तय की
गई प्रार्थना होती है,   उसका एक निश्चित रूप है,एक
ही स्वीकृत किया गया है। जबकि प्रार्थना तुम्हारे अन्दर
से उठती और उमगती है,प्रत्येक क्षण प्रत्येक चित्तवृत्त
में उसकी अपनी निजी प्रार्थना होती है।इसे कोई नहीं जान
सकता है कि तुम्हारे अन्दर के संसार में कल क्या घटने
वाला है?

3-परमात्मा की अनुभूति-

         वैसे प्रार्थना में प्रशन्नता
की अनुभूति होती है लेकिन हमेशा
प्रशन्न रहना भी जरूरी नहीं है कभी तुम
उदासी अनुभव कर सकते हो,यह उदासी दिव्य
होती है,यही तुम्हारी प्रार्थना होगी। उस स्थिति में
तुम अपने ह्दय को रोने और विलखने दो,आंखों में
आंसू वरसने दो।तब उस उदासी को ही परमात्मॉ को
अर्पित कर दो।जो कुछ भी तुम्हारे ह्दय में है उस
परमात्मां के चरणों में अर्पित कर दो-प्रशन्नता
है या उदासी और कभी-कभी क्रोध या आक्रोश
भी हो सकता है।

4-परमात्मा से नाराजी प्रेम का प्रतीक है-

            कभी तुम परमात्मा से
नाराज भी हो सकते हो,  यदि तुम
कभी परमात्मां से नाराज नहीं हुये तो
इसका मतलब तुमने परमात्मां को जाना
ही नहीं।अगर कभी  तुम उन्माद में होते हो
तो तो उस समय उस   क्रोध को ही प्रार्थना बन
जाने दो।परमात्मा तुम्हारा है,और तुम परमात्मा
के हो, इसलिए परमात्मा से लडो!  प्रेम में तो सभी
प्रकार के संघर्ष बने रह सकते हैं। यदि इसमें लडाई
और संघर्ष का अस्तित्व न हो   तो वह प्रेम है ही नहीं।
इसलिए जब कभी प्रार्थना करना जैसा कुछ भी अनुभव
न हो,तो तुम  परमात्मा से कह सकते हो   कि-सुनो जरा
ठहरो, देखो मेरा मूढ ठीक नहीं है,     और तुम जिस तरह
से यह सबकुछ कर रहे हो,   यह तुम्हारी प्रार्थना करने योग्य
नहीं है!तुम अपने ह्दय का सहज स्वाभाविक भावोद्वेग बनने
दो।

5-परमात्मा के साथ अप्रमाणिक बनकर मत रहो-

                  परमात्मा के साथ
अप्रमाणिक बनकर रहना उचित
नहीं है क्योंकि अस्तित्व में बने रहने
के लिए ईमानदार या प्रमाणिकता का होना
जरूरी है,तभी हम परमात्मा के साथ स्तित्व में
बने रह सकते हैं।तभी परमात्मा हमारी शिकायत की
ओर देखेगा, नकि प्रार्थना की ओर। अप्रमाणिकता झूठ
है, हम किसे धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं?     हमारे चेहरे
की मुस्कान परमात्मा को धोखा नहीं दे सकती,वास्तविक सत्य
वह जान ही लेता है।  केवल वही तो हमारे सत्य को जान सकता
है,उसके सामने तो   झूठ ठहर ही नहीं सकता है। इसलिए सत्य
को बने रहने देना चाहिए।  परमात्मा को केवल अपना सत्य ही
भेंट   करें और कह सकते हो कि-   आज में तुमसे नाराज हूं,   मैं
तुमसे घृणॉ करता हूं,   और तुम्हारी प्रार्थना भी नहीं कर सकता,
इसलिए आज तुम्हैं मेरी प्रार्थना के विना ही रहना होगा। मैं आज
तक बहुत सह चुका हूं,अब तुम सहो। परमात्मा से वैसी बात कर
सकते हो जैसे तुम अपने प्रेमी या    मित्र या मां के साथ बातचीत
करते हो। उससे ऐसे बात करो जैसे किसी छोटे बच्चे के साथ बात
करते हैं।

6-सभी धर्मों में परमात्मा को परम् पिता कहा गया है-

       परमात्मा के सामने
तो हर मनुष्य     एक बच्चे की
भॉति है। इसलिए कि हम परमात्मा
को परमपिता कहते हैं।लेकिन हम इस
बात को भूल जाते हैं कि परमात्मा परमपिता
है। हमें यह भूल जाना है कि वह तुम्हारा पिता है
या नहीं है,बस तुम्हें उसके सामने एक बच्चे की भॉ़ति
ही जाना होगा-सहज,सच्चे,स्वाभाविक और प्रामाणिक।
किसी सी पूछो ही नहीं कि प्रार्थना कैसे की जाय?      उस
क्षण सत्य ही तुम्हारी प्रार्थना होनी चाहिए। उस क्षण का
सत्य चाह् जैसा भी हो,     बिना सर्त तुम्हारी प्रार्थना बन
जानी चाहिए।   और एक बार उस क्षण का सत्य तुम्हारी
सम्पत्ति बन जाती है।तुम विकसित होना शुरू हो जाते हो।

7-प्रार्थना एक प्रेमी की भक्ति का मार्ग है-

      एक प्रेमी प्रेम के बन्धन
में प्रेम करता है,किसी भी प्रकार
से वह उससे बाहर नहीं आना चाहता
है।    उसकी केवल यही प्रार्थना रहती है कि
उसे इस योग्य समझा जाना चाहिए कि परमात्मा
उसे निरन्तर अपनी लीला में स्थान देता रहे।यह बहुत
सुन्दर खेल है वह इससे मुक्त नहीं होना चाहता है।

8-ध्यान मार्ग बुद्धत्व से सम्बन्ध रखता है-

        ध्यान के मार्ग पर चलने
वाले व्यक्ति के लिए प्रार्थना तो
एक बन्धन है। अगर देखें तो महॉवीर
ने कभी प्रार्थना नहीं की।    बुद्ध ने भी कभी
प्रार्थना नहीं की। बुद्ध के लिए तो प्रार्थना अर्थहीन
थी।इसलिए यदि तुम बुद्ध बनना चाहते हो तो प्रार्थना
करना ही नहीं,क्योंकि प्रार्थना एक बन्धन को निर्मित
करता है। लेकिन यह बन्धन शुद्ध प्रेम का रूप है।यदि
तुम उस मार्ग का चयन करते हैं तो ठीक है मगर इसके
लिए बुद्धत्व का प्रयोग सही नहीं होगा।

9-सहायता लेना बन्धन है-

              एक बार एक लडका
अपनी मॉ से मछली मारने के
लिए जाने हेतु पूछता है,मॉ का
कहना था कि,यदि तुम जाना ही
चाहते हो तो पूछते क्यों?      हो जाओ!
क्योंकि पूछने   से सहायता नहीं मिल सकती
है,बल्कि बन्धन मिलेगा,तुम बँध जाओगे। इसलिए
बुद्धत्व को उपलव्ध होना है तो  तुम्हें बिल्कुल अकेले
रहना होगा।तो फिर वहॉ कोई भी परमात्मॉ नहीं होगा।
कोई भी ऐसा नहीं कि जो तुम्हारी    सहायता कर सके।
क्योंकि अगर तुम किसी की सहायता चाहते हो तो वह
बन्धन बन जायेगा। अर्थात यदि मैं तुम्हें मुक्त होने में
सहायता  करता हूं तो तुम   मुझपर  आश्रित होने  लग
जाओगे, तब बिना  मेरे  मुक्त  किये  तुम  समर्थ न हो
सकोगे।और ध्यान के मार्ग पर सहायता करना सम्भव
नहीं होगा। केवल संकेत मिल सकते हैं। बुद्ध तो केवल
मार्ग दिखाता है,बुद्ध की विधि में तो कोई सहायता नहीं
कर सकता है। तुम्हें स्वयं अपने पथ पर आगे बढना
होगा।अपना प्रकाश स्वयं बनना होगा।
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