प्रेममय जीवन-4


1- स्वयं पर विजय प्राप्त करें तो तत्वज्ञानी बन सकते हो

 जिस मनुष्य ने स्वयं के ऊपर अधिकार प्राप्त कर लिया,उसके ऊपर
संसार की कोई भी चीज अपना प्रभाव नहीं डाल सकती,उसके लिए तो
किसी भी प्रकार का बन्धन शेष नहीं रह जाता ।उसका मन स्वतंत्र हो जाता
है ।और वही पुरुष संसार में रहने योगय है। सामान्यतः देखा जाता है कि संसार
के सम्बंध में दो प्रकार की धारणॉएं होती हैं।कुछ लोग निराशावादी होते हैं ।वे कहते
हैं-संसार कैसा भयानक है,कैसे दुष्ट है।और करछ लोग आशावादी होते हैं और कहते हैं-
अहा संसार कितना सुंदर है,कितना आंनंद है ।जिन लोगों ने अपने पर विजय प्राप्त नहीं
की है,उनके लिए यह संसार या तो बुराइयों से भरा है,या अधिक से अधिक,अच्छाइयोंऔर
बुराइयों का एक मिश्रण है ।और यदि हम अपने मन पर विजय प्राप्त कर लेंते हैं,तो यही संसार
सुखमय हो जाता है ।फिर हमारे ऊपर किसी बात के अच्छे या बुरे भाव का असर न होगा ।इसके लिए
अभ्यास जरूरी है।पहले श्रवण करें,फिर मनन करें,फिर अमल करें।प्रत्येक योग के लिए यही बात सत्य है।
सब बातों को एकदम समक्ष लेना बडा कठिन है।इसमें हमें स्वयं को सिखाना होता है।बाहर के गुरु तो केवल
उद्दीपन कारण मात्र हैं,जो कि हमारे अंदर के गुरु कोसब विषयों का मर्म समझने के लिए प्रेरित करते हैं, बहुत
सी बातें स्वयं की विचारशक्ति से स्पष्ट हो जाती है और उनका अनुभव हम अपनी ही आत्मा में करने लगते हैं,
और यह अनुभूति ही अपनी प्रवल इच्छा में परिवर्तित हो जाती है।पहले भाव फिर इच्छाशक्ति ।इससे कर्म करने की
जबरदस्त इच्छा शक्ति पैदा होती है,जो हमारे प्रत्येक नस,प्रत्येक शिरा और प्रत्येक पेशी में कार्य करती है,जबतक कि
हमारा समस्त शरीर इस निष्काम कर्मयोग का एक यंत्र ही नहीं बन जाता,तबतक निरंतर अभ्यास जरूरी है ।फिर सुकदेव
जैसे योगी बन सकते हो ।

2-प्रेम की पहचान

     प्रेम की बात सब जगह सुनाई देती है,हर कोई कहता है,
प्रेम हो गया ,ईश्वर से प्रेम करो ।लेकिन मनुष्यों को पता नहीं
कि प्रेम है क्या ।यदि वे जानते तो इसके सम्बंध में ऐसी खोखली
बातें नहीं करते ।प्रेम करने वाले के बारे में शीघ्र पता चल जाता है कि
उसके स्वभाव में प्रेम है कि नहीं।एक स्त्री प्रेम की बात करती है लेकिन तीन
मिनट में पता चल जाता है कि वह प्रेम नहीं कर सकती है।इस संसार में प्रेम की
बातें तो भरी पडीं हैं ,लेकिन प्रेम करना कठिन है।प्रेम कहॉ है?और प्रेम है, यह तुम
कैसे जानते हो ?प्रेम का पहला लक्षण तो यह है कि इसमें व्यापार या शौदागरी नहीं होती
है।तब तक तुम किसी मनुष्य से कुछ पाने की इच्छा से प्रेम करते हो तो,जान लो बह प्रेम
नहीं है। वहॉ कोई प्रेम नहीं रहता ।जब कोई मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करता है,मुझे यह दो,मुझे
वह दो,तो वह प्रेम नहीं है।वह प्रेम कैसे हो सकता है?मैं तुम्हें एक प्रार्थना सुनाता हूं और तुम मुझे
उसके बदले कुछ दो,यह तो वही दुकानदारी की बात हो गई ।प्रेम का पहला लक्षण है वह शौदा करना
नहीं जानता,वह तो सदा देता है।प्रेम सदा देने वाला होता है,लेने वाला कभी नहीं ।भगवान से प्रेम करने
वाला कहता है कि ,यदि भगवान चाहे तो मैं अपना सर्वस्व उन्हैं दे दूं,पर मुझे उनसे कोई चीज नहीं चाहिए।
मुझे इस दुनियॉ में किसी चीज की चाह नहीं है।मैं उनसे प्रेम करता हूं,बदले में मैं कुछ नहीं मॉगता।
मुझे न उनकी शक्ति चाहिए ,न उनकी शक्ति का प्रदर्शन । वे तो प्रेम स्वरूप भगवान हैं।

3-प्रेम में कोई भय नहीं रहता है

         जब प्रेम होता है तो भय नहीं रहता ।क्या कभी बकरी शेर पर,चूहा बिल्ली पर या गुलाम अपने
मालिक पर प्रेम करता है?गुलाम लोग कभी-कभी प्रेम दिखाया करते हैं,पर क्या वह प्रेम है? क्या डर में
तुमने प्रेम देखा है? ऐसा प्रेम तो सदा बनावटी होता है।जबतक मनुष्य की ऐसी भावना है कि ईश्वर आकाश
में बादलों के ऊपर बैठा है,एक हाथ में पुरुष्कार और दूसरे हाथ में दण्ड,तब तक प्रेम नहीं हो सकता ।प्रेम के
साथ भय या किसी भयदायक वस्तु का विचार नहीं आता ।मान लो ,एक युवती माता सडक से जा रही है और
एक कुत्ता उसकी ओर भौंकने लगा,तो वह पास वाली मकान में जायेगी ।और दूसरे दिन उसके साथ उसका बच्चा
भी है और एक सिंह उस बच्चे पर झपटता है,तब वह माता कहॉ जायेगी? तब तो वह अपने बालक की रक्षा करके
सिंह के मुख में प्रवेश कर जायेगी।प्रेम तो सारे भय को जीत लेता है।उसी प्रकार ईश्वर का प्रेम है वह चाहे दण्डदाता है
या वर दाता है इसकी किसे परवाह है ?जिन्होंने ईश्वर के प्रेम का स्वाद कभी नहीं लिया,वे ही उससे डरते हैं और जीवन
भर उसके सामने भय से कॉपते हैं।अतः डर को दूर करें ।

4-प्रेम तो एक सर्वोच्च आदर्श है

                  प्रेम करने वाला जब सौदागरी छोड देता है और समस्त भय दूर भगा देता है ,
तब वह ऐसा अनुभव करने लगता है कि प्रेम ही सर्वोच्च आदर्श है।कितनी ही बार एक रूपवती
स्त्री कुरूप पुरुष से प्यार करते देखी गई है ।कितनी बार एक सुन्दर पुरुष किसी कुरूप स्त्री से प्रेम
करते देखा गया है ,ऐसे प्रसंगों में आकर्षक वस्तु कौनसी है? बाहर से देखने वालों को तो कुरूप पुरुष या
कुरूप स्त्री ही दिख पडती है,लेकिन वह प्रेम तो नहीं देखता।प्रेमी की दृष्टि में उससे बढकर सुन्दरता और कहीं
नहीं दिखाई देती ।ऐसे कैसे होता है ?जो स्त्री कुरूप पुरुष को प्यार करती है,उसका अपने मन में जो सौंदर्य का
आदर्श है,उसे लेकर उस कुरूप पुरुष पर आरोपित करती है,वह जो अपासना या प्यार करती है ,वह उस पुरुष को
नहीं बल्कि अपने आदर्श को डालकर उसे आच्छादित कर देती है। यही वात सभी प्रेम पर लागू होती है।जैसे भाई या
बहिन साधारण रूप के हैं तो भाई या बहिन होने का भाव ही उन्हैं हमारे लिए सुन्दर बना देता है ।

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