प्रेम तथा कर्तव्य की दीवार


 

                    एक युवती थी। एक दुर्घटना
में उसकी आंखें चली गई थीं। वह हर समय
हताश-निराश रहती। उसे अपनी जिंदगी बोझ
लगने लगी। उसके मन में हर समय यही उलझन
रहती कि आंखें न होने के कारण उसे कोई प्यार नहीं
करता। अपने जीवन से गिलेशिकवों के बीच ही उसे एक
युवक मिला। वह युवक उस युवती का बड़ा ही ख्याल रखता।

                       उस युवक के जिंदगी में
आने से युवती के अंदर जीने की इच्छा पैदा
हुई। उसे युवक की आवाज, उसकी बातें बहुत
अच्छी लगतीं। युवक ने उस लड़की से कहा-कुछ
भी हो जाए, मैं तुम्हारी आंखें वापस लाकर रहूंगा।
मेरा वादा है कि तुम दुनिया को अपनी आंखों से देख
सकोगी। युवक ने उस युवती की आंखों का ऑपरेशन
किसी नामी सर्जन से करवाया। युवती की आंखों पर
पट्टी बांध दी गई। युवती ने इच्छा जताई कि जब पट्टी
खुलेगी तो मैं सबसे पहले युवक को ही देखना चाहूंगी।
जिस दिन युवती की आंखों की पट्टी खुली, उसने सबसे
पहले युवक को देखा और वह आश्चर्यचकित रह गई,
क्योंकि युवक नेत्रहीन था। उसके सारे सपने धरे रह गए।
उसने कहा- मैं एक नेत्रहीन से शादी नहीं कर सकती।

                         युवक ने इस पर कोई दुख
या निराशा व्यक्त नहीं की। उसने कहा –     अब
तुम दुनिया को देख सकती हो, उसे भरपूर जी सकती
हो। मेरा उद्देश्य पूरा हुआ, मैं चलता हूं। हां, मेरी आंखों
का ख्याल रखना।

 

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